पुष्पा गुप्ता
ऋग्वेद को समझे बिना न हम बाद के इतिहास को समझ सकते हैं न इसके पीछे के कई हजार साल के प्रयोगों और आविष्कारों को, न एक नारीप्रधान समाज के पुरुषप्रधान समाज में रूपान्तरण को, यहाँ तक कि बाद उत्कर्ष के दौरों की वैचारिक, प्रौद्योगिक, साहित्यिक और कलात्मक उपलब्धियों और उनकी प्रेरणाओं को।
इस विचित्र सत्य पर ध्यान दें कि वैदिक समाज शून्य की अवधारणा ओर दाशमिक गणना से परिचित है, इसके लिए ठीक उसी चिन्ह का प्रयोग करता है जिसे हम आज प्रयोग करते हैं।
पुरातत्वविद एस आर राव को लोथल से हाथी दाँत का खंडित मान मिला था उसमें पाँच के लिए अर्धचंद्र अंकित था। हम सोच सकते हैं कि यदि अखंडित मान मिला होता तो उसमें दगस के लिए ‘0’ मिलता।
आकाश और पहिए के छेद के लिए ‘ख’ का प्रयोग होता आया है। शून्य की अवधारणा निकली ही चक्र के घूमने (प्रवर्तन) और नाभि के संकल्पनात्मक अंकन से है। पहिए के छेद में कुछ नहीं है, पर छेद होते हुए भी खाली है, वह नाम से है पर उसमें कुछ नहीं है।
पर उसमें यदि उसके साथ धुरा लग जाय तो यह चक्र वर्तन करता हुआ दसगुने की वृद्धि कर सकता था।
हम जिस बात को रेखांकित करना चाहते हैं यह वह कई लाख साल का प्राकृतिक विपर्यय है जिसे महाभारत में त्रेता और द्वापर के युगसंधि के रूप में कल्पित किया गया है और जिसमें पहले का बहुत कुछ नष्ट (लुप्त) हो जाता है।
उपशुष्कजलस्थाया विनिवृत्तसभाप्रपा। निवृत्त यज्ञ स्वाध्याया निर्वषट्कारमंगला।
उत्सन्नकृषिगोरक्ष्या निवृत्तविपणापणा। निवृत्त पूगसमया संप्रनष्ट महोत्सवा।।
अस्थिकंकालसंकीर्णा हाहाभूतजनाकुला। शून्यभूयिष्टनगरा दग्धग्रामनिवेशना।।
क्वचिच्चोरैः क्वचिच्छस्त्रै क्वचिद्राजभिरातुरैः। परस्परभयाच्चैव शून्यभूयिष्ठनिर्जनाः।।
( महा. 12.139.18-21)
हतविप्रा हतारक्षा प्रनष्टौषधि संचया।…बभ्रमुः क्षुधितामर्त्या खादन्तश्च परस्परम्।
(महा. 23 व 24)
कुछ का आंशिक उद्धार हुआ, जैसे वेद और पुराणों का पर इसे उस सरलीकृत प्रतीकात्मक कथा से नहीं समझा जा सकता जिसमें वेदव्यास अपने शिष्यों के माध्यम से देश देशांतर से इनका संकलन करते हैं और महाभारत की रचना करते हैं। जो कुछ जुट पाता है उसे, कम से कम वेदों को समझने की जी तोड़ कोशिश वेद के अंगों- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरूक्त- ब्राह्मण आदि में देखी जा सकती है और इसके बाद भी सहमति नहीं बन पाती है तो शाखाएँ बन जाती हैं और इसके बाद भी यह दावा नहीं किया जा सकता कि ऋग्वेद का संतोषजनक भाष्य या अनुवाद संभव हो पाया है।
खोया केवल वेद और पुराण ही था पीछे का समस्त ज्ञान जिसमें लेखन का ज्ञान भी था शून्य का चिन्ह भी था, तक्षणकला और धातुविद्या। इन सबका एक एक करके लंबे समय तक उसी तरह खोजा, संजोया और आत्मसात् किया जाता रहा। इस रहस्य को न समझ पाने के कारण हम प्रायः उद्धारकों को आविष्कारक मान लिया करते हैं।
जैसे आदिम अन्नसंकट से निस्तार पाने के लिए कुछ लोगों ने वन्य धान्यों को उपजाने का संकल्प लिया था, और कृषि का आरंभ हुआ था, और गोड़ने, खोदने, खरोंचने के प्रयोगों के साथ जोतने की विधि विकसित हुई थी जिससे हराई या सीता का जन्म हुआ था, उसी तरह सिंधु-सरस्वती सभ्यता के ह्रास काल में आए लंबे प्राकृतिक विपर्यय के कारण कृषि और गोपालन विलुप्त प्राय हो गया था (उत्सन्न कृषिगोरक्ष्या) उसके बाद राहत का दौर आने के साथ कृषि का भी पुनरुद्धार हुआ था और इस तरह सीता का दुबारा जन्म जनक के माध्यम से हुआ है।
उपनिषद काल के चरित्रों से रामायण की कथा का संबंध इसी के कारण जुड़ता है जिस पर पुरानी कहानी का आरोपण करने से एक बहुमिश्र कथा तैयार होती है।





