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*नदियों का पारस्परिक संवाद*

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             ~ नीलम ज्योति 

परिवेश के साथ प्रकृति की प्रवृत्तियों में भी परिवर्तन सम्भव है। होली हो गई, रेन डांस व बसन्त पंचमी आकर चले गए। वेलेंटाइन डे भी आ गया तो नदियाँ अपनी जीवन शैली क्यूँ न बदले भला ? आज की इस डिजिटल दुनिया में नदियाँ भला कैसे पीछे रहती ?

       वर्तमान आभासी संसार की देखादेखी नदी परिवार की मुखिया  गंगा ने एक कॉन्फ्रेंस काल मीट में आदेश निकाल दिया : सभी नदियाँ अपनी खुशियाँ व गम परस्पर साँझा किया करें। जब तक समस्याएँ पता नही होगी, समाधान कैसे ढूंढेंगे ? आज से हमारी ऑनलाइन सेवाओं का श्रीगणेश करते हैं।

       ब्रह्मपुत्र व्यथित है अपनी बदनामियों से, “क्या बताऊँ  दीदी ? बहती तो आपके अंग संग हूँ किन्तु आपके जितना सम्मान नहीं पाती हूँ। मैं क्या करूँ ? देखो न, इन्द्रदेव की कृपा मुझ पर कुछ ज़्यादा ही होती है। लोग बाढ़ से परेशान होते हैं। मेरे जल भंडार को उपयोगी बनाओ न दीदी।”

ब्रह्मपुत्र आगे जोड़ती है, “हाँ, भूपेन जी हजारिका ने मेरा गुणगान करके जग में प्रख्यात कर दिया है। किंतु कोरी सराहना करने से बस वाहवाही मिलती है, उद्धार नहीं होता है।”

        जान्हवी दिलासा देती है, ” क्यूँ नहीं बहना। अभी प्लानिंग चल रही है। तुम्हारे व्यर्थ बहते जल का उपयोग सूखे मरुथलों में किया जाएगा। नदियों को जोड़ने की प्रक्रिया भी चल रही है। तुम ज़रा धीरज धरो। अच्छा सोचो तो अच्छा होगा।”

अपनी बारी का इंतज़ार करती महानदी और दामोदर बोल पड़ती हैं, “गंगे माँ ! आप तो कोशिशें करने में पीछे नहीं रहती हो। किन्तु आप कितना भी करो, वही ढाक के तीन पात। हमें प्रदूषित करने के लिए यह मानव हाथ धोकर पीछे पड़ा रहता है। किन्तु हमारी तलहटी में जमी गाद इसे दिखाई नहीं देती है। आख़िर हम कब तक सहन करती रहेंगी।”

      दामोदर दुखी होकर कहती है, “मुझे तो बंगाल का शोक नाम देकर बदनाम ही कर रखा है। इसमें मेरी क्या गलती है।”

    माँ आश्वासन देती है, ” धीरे-धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय। शांति रखो। सरकार अपनी तरफ़ से प्रयत्नशील है। जन सामान्य में जागृति आ रही है। आने वाले समय में जो भी होगा अच्छा ही होगा बस तुम निर्बाध बहती रहो।”

नर्मदे तो मानो भरी हुई बैठी थी। क्या क्या बताए ? अतीत की वो भयावह स्मृतियाँ भुला ही नहीं पा रही हैं। प्रेमी नद सोनभद्र, दासी जुहिला से प्रेम कर बैठा। तभी से चिरकुंआरी रहने का संकल्प कर चुकी है। यदा-कदा चट्टानों में विचरती ताप्ती को दिल का हाल सुना देती हैं, “बहना ! तुम जानती हो मुझमें आने वाली उफ़नती बाड़ों को।

उन विकराल लहरों को याद कर मेरी रूह काँप जाती है। होशंगाबाद जैसे कई इलाकों में घरों की छतों तक पानी पहुँच जाता था। कितना नुक्सान किया है मैंने जन धन का। अभी भी मैं यदा- कदा अपने तेवर दिखा ही देती हूँ। “

       ताप्ती फ़टाफ़ट चम्बल गम्भीर आदि बहनों को नर्मदा की दास्तां साँझा करती है। नटखट कहाने वाली रेवा को सखियाँ दिलासा देती हैं, ” देखो दीदी, अब आपका निर्मल जल व्यर्थ नहीं जा रहा है। अरे ! आप तो अब गुजरात की प्यास ही नहीं बुझाती, वहाँ की भूमि को भी तरबतर करती हो। हाँ, साबरमती का उद्धार करके उसका भी सहारा बन गई हो। तुम्हारी परोपकारिता के तो परचम लहरा रहे हैं।

     और भी कई पड़ोसियों की ललचाई नजरें तुम पर हैं। हमारी सिंधु बहन पर पहले ही पड़ोसी कब्ज़ा जमाए बैठे हैं।” 

गंगा मैया शाबाशी देती है, “अरे बहन ! तुम तो मेरा अभिमान हो। तुम्हारे चौड़े पाट व निर्मल जल पर मुझे फ़क्र है। तुम मध्यदेश की गंगा हो। तुम्हारा जल मेरे जल से भी पावन है।”

      तभी महाकाल की प्यारी नन्हीं क्षिप्रा आ टपकती है, ” मैं बहुत गुस्सा हूँ आपसे जान्हवी दीदी। ताप्ती दी ने सब बता दिया है मुझे। आप भले छुपाती रहो। अब तो आपने उज्जैनी आकर मेरा कायाकल्प कर दिया है। यूँ भी ये बेचारे धर्मप्राण कावड़िए नङ्गे पैर पैदल चल कर हमारा मिलन कराते रहे हैं। वैसे भी सिंहस्थ मेले के दौरान  आप मेरी लाज रख लेती हो। आपने तो बाहों में मुझे समाकर मेरा पुनः श्रृंगार कर दिया है।”   

      तभी महाकाल बाबा का फ़ोन आ जाता है, ” कहाँ हो बिटिया ? अभिषेक का समय हो गया है।”

    क्षिप्रा कहती है, ” बाबा मेरे ! आ रही हूँ अभी में आपातकालीन मीटिंग में हूँ।”

    रेवा सभी नदियों को सम्बोधित करते हुए अपनी व्यथा जताती है,  ” माना कि मैं अपनी  अनुजाओं का समय समय पर कल्याण करती हूँ। किन्तु मेरा अपना भी एक दायरा है। आखिर कब तक…?”

    क्षिप्रा टोंकती है, ” हाँ दीदी ! ऊँट की गर्दन लंबी है तो काटने के लिए नहीं है। हम सबको इसका पुख़्ता समाधान ढूंढना ही होगा। वरना ऐसे तो आप भी बीमार हो जाएंगी।”

रावी, सतलज, झेलम व चिनाव भी सिंधु दीदी की तरह परोपकार में ही मरी जा रही हैं। माँ गंगा को क्या सुनाए। माँ कहती हैं, “करती रहो सेवा। मैं देखती हूँ आगे क्या करना है। यूँ भी परोपकार तो हमारे खून में ही है। घबराओ नहीं, कोई न कोई रास्ता निकालती हूँ।”

    भागीरथी बीच में ही टोंकती हैं, “अरे उत्तरवालियों ! ख़ुद ही बोलती रहोगी। तुम्हें ही हैं सारी समस्याएँ। औरों को भी मौका दो भई। ज़रा दक्खनवालियों को अपनी बात रखने दो।”

       दक्षिण से कृश्णा, काँवेरी, गोदावरी एक साथ बोल पड़ी, ” ये जनमानस व पण्डे- पुजारी  पुण्य व पैसा कमाने में लगे हैं। मोक्ष व पाप धोने के नाम पर हमें कचरा पेटी ही बना कर रख दिया है।!” 

     तभी मोबाइल बजता है, ” दुख भरे दिन बीते रे भैया,,,” ताप्ती सबको शांत करती है, ” सुनो,  गंगा मैया क्या कह रही हैं। ” 

गंगा सबको सांत्वना देती 

है, ” सरकार द्वारा नई योजनाएँ भी बनाई जा रही हैं। हम सब को सुविधानुसार मिलाया जा रहा है। सफ़ाई अभियान भी चलाया जा रहा है। सरकार जाग गई है किन्तु जनता को भी सुधरना होगा। “

     नर्मदा आँसू पोछकर संयत हो सुनती है। माँ कहती है, ” बिटिया ! मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं थी। मैं तो तुम्हें सचिव पद का कार्यभार सौपने का सोच रही हूँ। मैं तो समझती थी, तुम ह्रदय प्रदेश को सम्भाल रही हो। अपनी मौसी ब्रह्मपुत्रा के बारे में सोचो ज़रा, कितनी जहालतें सहती हैं। हाँ, मैं मैली हो गई हूँ, राम देख रहे हैं ना मुझे। तुम्हारे सिर पर तो मेरे राम के इष्टदेव शम्भू का हाथ हैं। अच्छा सोचो तो सब अच्छा ही होगा। और हाँ, एक खुशखबरी ध्यान से सुनो तुम सब, अब मेरे कई उपासक, अरे,, टॉप फेन्स की पूरी फ़ौज जुटी है। एक दिन हमारे गम फुर्र हो जाएँगे व खुशियों में चार चाँद अवश्य लग जाएँगे।

      अच्छा, अब तुम सब सुकून से सो जाओ। ये रातें ही तो राहत की लोरी गाती है, हमारे लिए। इधर नेट भी ज़रा कमज़ोर हो रहा है।”    

    गंगा मैया ने सबको आश्वस्त किया और स्वयं व्यस्त हो गई चर्चाओं में। अमेझन व नील से बात करके मिसीसिपी कांगो व यांगटीसिक्यांग से भी चर्चा की। फ़िर सो गई यह सोचते सोचते कि सबके सहयोग से ही उद्धार होगा।

Ramswaroop Mantri

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