अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*न्यूयॉर्क टाइम्स की दृष्टि में आरएसएस और भारतीय सत्ता संरचना*

Share

-तेजपाल सिंह ‘तेज’

छाया से सत्ता तक का सफ़र

          द न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित लगभग 4000 शब्दों के विस्तृत लेख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ऐतिहासिक, वैचारिक और संगठनात्मक संबंधों का विश्लेषण किया गया है। लेख का शीर्षक—“From the Shadows to Power: How Hindu Nationalism Remade India”—इस केंद्रीय तर्क को रेखांकित करता है कि किस प्रकार एक कैडर-आधारित सांस्कृतिक संगठन समय के साथ भारत की राजनीति और संस्थाओं में गहराई से प्रभाव स्थापित करता गया। लेख के अनुसार, आरएसएस की भूमिका केवल एक वैचारिक पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने राजनीतिक सत्ता, सामाजिक संगठनों और राज्य की विभिन्न संस्थाओं के साथ एक विस्तृत नेटवर्क विकसित किया है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वैचारिक जड़ें:

          न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख में आरएसएस की स्थापना को औपनिवेशिक काल की परिस्थितियों से जोड़कर देखा गया है। इसमें कहा गया है कि यह संगठन ब्रिटिश शासन और मध्यकालीन मुस्लिम शासकों के लंबे ऐतिहासिक संदर्भ में “हिंदू पहचान के पुनरुत्थान” के उद्देश्य से उभरा। लेख यह भी उल्लेख करता है कि 1930 और 1940 के दशकों में यूरोप में प्रचलित फासीवादी राष्ट्रवादी विचारधाराओं—विशेष रूप से हिटलर और मुसोलिनी—से प्रेरणा लेने के आरोप आरएसएस के शुरुआती वैचारिक लेखन पर लगाए जाते रहे हैं। इन संदर्भों को लेख में ऐतिहासिक आलोचना के रूप में प्रस्तुत किया गया है, न कि निर्विवाद तथ्य के रूप में।

प्रतिबंध, विवाद और गांधी हत्या का संदर्भ:

          लेख में यह भी रेखांकित किया गया है कि आरएसएस पर स्वतंत्रता के बाद विभिन्न समयों पर प्रतिबंध लगाए गए, जिनमें महात्मा गांधी की हत्या के बाद का प्रतिबंध भी शामिल है। न्यूयॉर्क टाइम्स यह स्पष्ट करता है कि यद्यपि गांधी हत्या में सीधे तौर पर संगठन की आधिकारिक भूमिका सिद्ध नहीं हुई, फिर भी इस घटना ने आरएसएस की सार्वजनिक छवि पर गहरा प्रभाव डाला। इन ऐतिहासिक प्रसंगों को लेख भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे और हिंदू राष्ट्रवाद के बीच चल रहे तनाव के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता है।

नरेंद्र मोदी और आरएसएस का संबंध:

          न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीतिक और वैचारिक प्रशिक्षण आरएसएस के भीतर हुआ। लेख में उनके लंबे समय तक संगठन से जुड़े रहने और बाद में भाजपा के माध्यम से सत्ता तक पहुंचने की प्रक्रिया को विस्तार से बताया गया है। लेख यह भी उल्लेख करता है कि मोदी द्वारा सार्वजनिक मंचों—जैसे लाल किले से दिए गए भाषणों—में आरएसएस के योगदान की सराहना करना, इस संगठन की वैधता और प्रभाव को और सुदृढ़ करता है। हालांकि, लेख यह भी संकेत देता है कि आरएसएस और सरकार के बीच कभी-कभी रणनीतिक मतभेद भी सामने आते रहे हैं।

संस्थाओं में प्रभाव और नेटवर्क का विस्तार:

          न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख का एक प्रमुख तर्क यह है कि आरएसएस ने दशकों में एक व्यापक सामाजिक नेटवर्क खड़ा किया है। इसमें शिक्षा, श्रमिक संगठन, किसान संघ, छात्र संगठन, धार्मिक और सेवा संस्थाएं शामिल हैं। लेख के अनुसार, इस नेटवर्क की मौजूदगी मीडिया, नौकरशाही, न्यायपालिका और विश्वविद्यालयों तक महसूस की जाती है। हालांकि, लेख यह भी स्वीकार करता है कि इन दावों पर विभिन्न विद्वानों और राजनीतिक धाराओं में गहरी असहमति है, और इन्हें लेकर भारत में व्यापक बहस चलती रही है।

अल्पसंख्यक प्रश्न और आलोचनाएं:

          न्यूयॉर्क टाइम्स लेख में हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति के संदर्भ में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर उठाई गई चिंताओं का भी उल्लेख करता है। लेख के अनुसार, आलोचक मानते हैं कि कुछ संगठनों और आंदोलनों की गतिविधियों से धार्मिक असुरक्षा और सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ा है।

इस संदर्भ में लेख राजनीतिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों के विचार प्रस्तुत करता है, जो इसे भारत के संवैधानिक धर्मनिरपेक्ष चरित्र के लिए चुनौती मानते हैं। साथ ही, लेख यह भी स्पष्ट करता है कि आरएसएस और उससे जुड़े संगठन इन आरोपों को खारिज करते हुए स्वयं को सांस्कृतिक और राष्ट्र निर्माण से जुड़ा संगठन बताते हैं।

पारदर्शिता और संगठनात्मक संरचना:

          लेख में आरएसएस की संगठनात्मक संरचना को अपेक्षाकृत अपारदर्शी बताया गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, संगठन स्वयं को एक स्वयंसेवी सांस्कृतिक संस्था के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसके पास औपचारिक सदस्यता और सार्वजनिक वित्तीय विवरण सीमित हैं। इसी अपारदर्शिता को लेकर आलोचक सवाल उठाते हैं, जबकि समर्थक इसे अनुशासन और आंतरिक संगठन का हिस्सा मानते हैं।

निष्कर्ष: एक जारी बहस:

          न्यूयॉर्क टाइम्स का यह लेख किसी अंतिम निर्णय की बजाय एक व्यापक राजनीतिक-सामाजिक बहस को सामने रखता है। इसमें आरएसएस को आधुनिक भारत की सबसे प्रभावशाली संगठनों में से एक के रूप में चित्रित किया गया है, जिसके प्रभाव को समर्थक “सांस्कृतिक पुनर्जागरण” और आलोचक “संस्थागत वर्चस्व” के रूप में देखते हैं। लेख का निष्कर्ष यह संकेत देता है कि चाहे सत्ता परिवर्तन हो या न हो, आरएसएस का सामाजिक और वैचारिक प्रभाव भारत की राजनीति और समाज में लंबे समय तक एक महत्वपूर्ण कारक बना रहेगा।

(दिनेश के. वोहरा, न्यूज़ टाइमhttps://www.youtube.com/live/j-xd_muRUAA?si=hm9dIDiL2pDbEc3a)

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें