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साधु, सत्ता और संविधान: एक महान भारतीय तमाशा

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-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          किसी भी देश की असली पहचान उसके झंडे, नारों या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिए गए भाषणों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करता है। भारत, जो स्वयं को सभ्यता, संस्कृति और नैतिक मूल्यों का प्राचीन ध्वजवाहक बताता है, आज उसी कसौटी पर सबसे अधिक असहज दिखाई देता है। यहाँ प्रश्न अब यह नहीं रह गया कि अपराध हो रहे हैं या नहीं—अपराध हर समाज में होते हैं—प्रश्न यह है कि अपराध के बाद समाज, सत्ता और व्यवस्था किसके साथ खड़ी होती है।

          यह समय संयोगों का नहीं, संकेतों का है। संकेत इस बात के कि कैसे आस्था को ढाल बनाकर अपराध को वैध ठहराया जा रहा है, कैसे धर्म का इस्तेमाल सत्ता की भाषा बोलने के लिए किया जा रहा है, और कैसे न्याय को धीरे-धीरे नैतिकता से अलग कर दिया गया है। बाबाओं का उभार, उनके प्रति सत्ता की उदारता, और पीड़ितों के प्रति व्यवस्था की कठोरता—ये अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि एक ही कथा के अलग अध्याय हैं।

          इस कथा में पीड़ित अकेला है, सवाल पूछने वाला संदिग्ध है, और अपराधी—यदि वह सही पहचान, सही प्रभाव और सही आस्था के साथ आता है—तो सम्मान का अधिकारी बन जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ लोकतंत्र केवल एक संवैधानिक शब्द रह जाता है और व्यवहार में एक चयनात्मक व्यवस्था में बदल जाता है। यह लेख उसी बदलाव की पड़ताल है—उस बदलाव की, जिसे सामान्य बनाने की कोशिश की जा रही है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इसे सवाल नहीं, नियति मान लें।

          आज का भारत एक ऐसे दृश्य में बदल चुका है जहाँ अपराध और आस्था के बीच की रेखा जानबूझकर धुंधली कर दी गई है। यहाँ बलात्कारियों के माथे पर चंदन है और पीड़ित के हाथों में तख्ती। यहाँ न्यायालयों की सीढ़ियां सत्ता की ओर चढ़ती हैं और सड़कों पर उतरने वाले पैरों को कुचला जाता है। यह कोई आकस्मिक अव्यवस्था नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित तमाशा है—जिसमें साधु, सत्ता और समाज तीनों अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं।

          बाबा अब वह नहीं रहा जो आत्मा की यात्रा की बात करता था। आज का बाबा रणनीतिक है, प्रबंधकीय है, चुनावी है। वह ध्यान में कम और डील में ज़्यादा बैठता है। उसके आश्रम साधना स्थल नहीं, राजनीतिक चौकियाँ हैं जहाँ से भीड़ संचालित होती है और सत्ता को वैधता मिलती है। उसके अपराध अपराध नहीं कहलाते, वे साजिश कहलाते हैं। पीड़ित का बयान चरित्र हनन बन जाता है और सवाल पूछने वाला समाज विरोधी घोषित कर दिया जाता है। आस्था का ऐसा इस्तेमाल शायद ही इतिहास में कभी इतनी निर्लज्जता से हुआ हो।

          सत्ता इस पूरे खेल में मासूम दर्शक नहीं है। वह जानती है कि बाबा वोट दिला सकता है, भीड़ को उन्माद में रख सकता है और सवालों को धर्म की आड़ में कुचल सकता है। इसलिए अपराध के बावजूद संरक्षण मिलता है, दोषसिद्धि के बावजूद रिहाई का रास्ता खोजा जाता है, और “मानवीय आधार” जैसे शब्द केवल एक खास वर्ग के लिए गढ़े जाते हैं। यह मानवीयता कभी जेल में बंद किसी छात्र, किसी वैज्ञानिक या किसी ईमानदार अधिकारी के लिए नहीं जागती, जो सिर्फ़ इसलिए भीतर डाल दिए जाते हैं क्योंकि उन्होंने सत्ता से असहज प्रश्न पूछ लिए।

          न्याय व्यवस्था यहाँ अंधी नहीं है, बल्कि चयनात्मक दृष्टि वाली है। वह देखती सब कुछ है, पर पहचानती वही है जो उसे पहचानना सिखाया गया है। गरीब, दलित, महिला पीड़ित के लिए कानून की गति शून्य के बराबर हो जाती है, जबकि रसूखदार अपराधी के लिए वही कानून लचीला, सहानुभूतिपूर्ण और दयालु हो उठता है। पीड़िता अगर सड़क पर उतर आए तो व्यवस्था उसे सुरक्षा नहीं देती, उसे सबक सिखाती है। यहाँ बलात्कार से बड़ा अपराध विरोध है, और अन्याय से बड़ा अपराध सवाल।

          मीडिया इस पूरी प्रक्रिया में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं, सत्ता का प्रवक्ता बन चुका है। स्टूडियो अब बहस के नहीं, अनुशासन के केंद्र हैं। यहाँ पीड़िता की चीख़ टीआरपी नहीं बनती, लेकिन बाबा की गिरफ्तारी पर “आस्था को ठेस” की चिंता ज़रूर पैदा हो जाती है। सवाल पूछने वाले पत्रकार गायब कर दिए जाते हैं और चिल्लाने वाले एंकर राष्ट्रवाद के प्रमाणपत्र बांटते फिरते हैं। सच अब खबर नहीं, खतरा है।

          लेकिन इस पतन की सबसे गहरी जड़ समाज में है। वही समाज जो व्हाट्सएप फ़ॉरवर्ड को इतिहास मान लेता है, जो पीड़िता से कपड़ों का हिसाब पूछता है और बाबा से आशीर्वाद की उम्मीद करता है। वही समाज जो कहता है—“सब जगह ऐसा ही होता है”—और इसी वाक्य से हर अपराध को सामान्य बना देता है। जब तक समाज खुद अपराध और आस्था के बीच फर्क करना नहीं सीखेगा, तब तक हर गिरे हुए बाबा के स्थान पर नया बाबा खड़ा होता रहेगा। कहा जाता है कि भारत बदल रहा है। सच है—भारत बदल रहा है। अब संविधान किताबों में है, व्यवहार में नहीं। न्याय तारीख़ों में उलझा है और पीड़ित सड़क पर। अपराधी मंच पर मुस्कुरा रहा है और सच्चाई जेल में सड़ रही है। यह बदलाव विकास का नहीं, चेतना के पतन का संकेत है।

          सबसे भयावह यह नहीं कि अपराधी आज़ाद हैं, सबसे भयावह यह है कि उनकी आज़ादी पर ताली बजाई जा रही है। जिस देश में पीड़ित डरने लगे और अपराधी सम्मानित होने लगे, वहाँ इमारतें तो खड़ी हो सकती हैं, लेकिन समाज नहीं। और जब समाज टूटता है, तब इतिहास किसी को माफ़ नहीं करता—न बाबाओं को, न सत्ता को, और न ही चुप रहने वालों को।

        इतिहास कभी एक दिन में नहीं टूटता। वह धीरे-धीरे दरकता है—हर उस क्षण में जब अन्याय को “व्यवहारिक मजबूरी” कहकर स्वीकार कर लिया जाता है, हर उस बहस में जहां पीड़ित से ज़्यादा अपराधी की सुविधा पर चर्चा होती है, और हर उस चुप्पी में जहाँ बोलना ज़रूरी होता है। आज भारत उसी धीमी दरार के दौर से गुजर रहा है, जहाँ लोकतंत्र औपचारिक रूप से जीवित है, लेकिन उसकी आत्मा थकी हुई है।

          बाबा, सत्ता और समाज के इस गठजोड़ में सबसे बड़ा नुकसान किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि सामूहिक विवेक का हुआ है। जब कानून आस्था से डरने लगे, जब न्याय लोकप्रियता से संचालित होने लगे, और जब नैतिकता को “एजेंडा” कहकर खारिज कर दिया जाए, तब कोई भी समाज लंबे समय तक स्थिर नहीं रह सकता। यह भ्रम कि केवल कुछ लोगों के साथ अन्याय हो रहा है, बहुत जल्द टूटता है—क्योंकि जब न्याय चयनात्मक होता है, तो असुरक्षा सार्वभौमिक हो जाती है।

          इस देश को किसी नए नायक, किसी नए बाबा या किसी नए नारे की ज़रूरत नहीं है। इसे ज़रूरत है स्मृति की—संविधान की स्मृति, संघर्षों की स्मृति, और उस मूल विचार की स्मृति कि सत्ता का उद्देश्य संरक्षण नहीं, उत्तरदायित्व होता है। जब तक हम आस्था और अंधविश्वास, श्रद्धा और समर्पण, और धर्म व राजनीति के बीच फर्क नहीं करेंगे, तब तक हर प्रश्न को कुचलने के लिए कोई न कोई पवित्र बहाना मौजूद रहेगा।

अंततः सवाल यह नहीं है कि देश बदल रहा है या नहीं। सवाल यह है कि क्या हम उस बदलाव को पहचान रहे हैं, या फिर उसे तालियों की आवाज़ में दबा रहे हैं। क्योंकि इतिहास यह नहीं पूछता कि उस समय सत्ता में कौन था—वह केवल यह दर्ज करता है कि अन्याय के समय कौन चुप था, और कौन खड़ा हुआ।

Ramswaroop Mantri

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