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रसूख और ताकत में उलझे हैं साधु-संत,पीर-फकीर,बाबा,बापू और स्वामी

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सवाल के बगैर भक्ति कहां,कैसे !

हिदायतउल्लाह खान

साधु-संत,पीर-फकीर,बाबा,बापू और स्वामी को नेता,अभिनेता,व्यापारी और सेठों की जरूरत क्यों पड़ती है ? जिस तरफ नजर उठाइए सारे ही रसूख और ताकत में उलझे हैं और जिसके पास जितना बड़ा नेता,व्यापारी और अभिनेता है,वो उतना उत्तम साधु-संत,पीर-बाबा और स्वामी है,जबकि जिन्होंने दुनिया को राह दिखाई,लोगो को बुराई से रोका और अच्छाई की तरफ बुलाया,वो महलों में रहीं रहे।ना उनके पास पैसा था,न ही रहने को घर।बादशाह भी महल तक नहीं बुला पाया और सियासत से वास्ता नहीं रखा।भूखे रहकर काम किया।अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया।उनके जाने के बाद सिर्फ उनका काम,उनकी बातें ही विरासत रहीं है।ये वो हैं,जिनके आगे दुनिया सिर झुकाती है।महावीर के तो बदन पर कपड़े नहीं थे।अपने लिए कुछ नहीं रखा।ईसा के तन पर एक कपड़ा था और सच को ज़िंदा रखने के लिए सलीब पर चढ़ गए।पैगंबर मोहम्मद का कोई घर,जायदाद नहीं।इन सबको गए बरसों हो गए हैं,पर आज भी सारे साधु-पीर-बाबा उनके जैसा बनने की बात करते हैं,लेकिन रहन-सहन और चाल-चरित्र वैसा नहीं है। यही वजह है कि जब तक हैं,तब तक बात है और जाने के बाद कोई याद नहीं करता है।इंसान को भगवान बनाने का यही खतरा है कि वो इंसान भी नहीं रह पाता है।आज का हर साधु,संत,बाबा या योगी करोड़ों के महल में रह रहा है।सबके अपने डेरे हैं,अपने आश्रम हैं,जो महंगी होटलों से कम नहीं हैं।कई गाड़ियां इनके साथ चलती हैं।अपने जहाज है।रसूख है,ताकत है और भीड़ है। इनके पास इतना पैसा कहां से आता है और इन्हें रसूख,ताकत,शोहरत,सियासत की जरूरत क्यों पड़ती है,जबकि ये तो लोगों की इसी भूख को मिटाने के लिए बाबा बनते हैं,पर जिधर नजर डालिए,सब तरफ ताकतवर स्वामी खड़े हैं।कोई मुख्यमंत्री का बाबा है तो किसी को प्रधानमंत्री सलाम करते हैं।कोई किसी व्यापारी घराने का संत है तो कोई माफिया का पीर है।गरीबों का बाबा तो कोई बचा ही नहीं है।ना ही गरीबों की कोई सुनवाई है।अभी वही स्वामी उत्तम और बड़ा है,जिसके पास जितना बड़ा अफसर आता है और फिर अब के स्वामी सिर्फ भगवान की बात नहीं करते,बल्कि सरकार से काम करवाते हैं।बात सब गरीबों की करते हैं और उनको ही उलझा रखा है।जो इनके नाम पर मरने,मारने को तैयार हैं,लेकिन इनसे पूछते नहीं हैं कि इतनी शोहरत,दौलत और ऐश की क्या जरूरत है?क्यों आपके पास सेकड़ों गाड़ियां हैं? क्यों महल में रहते हैं? राहत इंदौरी का शेर है-*झूठी बुलंदियों का धुंआ पार कर के आ/क़द नापना है मेरा तो छत से उतर के आ।सोने का रथ फ़क़ीर के घर तक न आयेगा/कुछ मांगना है हमसे तो पैदल उतर के आ।आज के बाबा सिर्फ अय्याशी,मस्ती में लगे हैं,बावजूद लोग उनके वहां हाथ जोड़े भीड़ खड़ी है और उनके लिए कुछ भी कर सकती है,मर सकती हैं,मार सकती हैं।भूखा रह सकती है,अपने आप को परेशान कर सकती हैं,पर उनकी जय-जयकार में कोई कमी नहीं आने देती।अवाम ये कहने से तो कभी नहीं चूकती कि नेता के पास पैसा कहां से आ रहा है। सियासत में भ्रष्टाचार है,पर उनकी मस्जिद का मौलाना,जिसे पांच हजार रुपए तनख्वाह मिलती है,अचानक करोड़पति हो जाता है।कोई उससे सवाल क्यों नहीं करता कि तुम्हारे पास माल कहां से आया,तुम जिन मकानों में रह रहे हो या तुम्हारे पास जो जायदाद है,कैसे आई है,तुम्हारा काम क्या है,उसका क्या पैमाना है,जबकि तुम मस्जिद के माइक से ईमानदारी का प्रवचन देते हो।साधु-संतों से क्यों नहीं पूछा जाता,उनके क्या कारोबार हैं,उनके पास पैसा कहां से आता है।क्यों तुम्हें नेताओं की जरूरत पड़ती है।क्यों अफसर तुम्हारे आगे-पीछे घूमते हैं और क्यों तुम्हारे दरबार में दलालों की भीड़ लगी रहती है,जो अपने काम लेकर खड़े रहते हैं।भक्त पूछ नहीं सकते हैं और यही खतरनाक भक्ति है।जब भक्ति सवाल ना कर सके,बोलने की ताकत छीन ली जाए या उस पर चश्मा लग जाए तो भक्ति नहीं गुनाह है और यही गुनाह तो बड़े-बड़े बाबाओं,बापू और स्वामी पैदा कर रहा है।असल में पाने की चाह और जो हासिल कर लिया है,उसे खोने के डर ने ही स्वामी खड़े कर दिए हैं।ऐसा नहीं है कि सारे एक जैसे हो गए हैं।कुछ हैं,जो सादा जीवन जी रहे हैं और काम में यकीन रखते हैं।लोगों को सही रहा दिखा रहे हैं,लेकिन चकाचौंध वालों को पार करना उनके लिए भी मुश्किल हो गया है।बाजार उतर गया है कि खूब प्रोपेगेंडा किया जाता है।तरह-तरह के तरीके अपनाए जाते हैं और पूरी टीम लगी होती है,जो अपने बाबा को सबसे अलग बताती है और जो ऐसा नहीं कर पा रहे हैं,पीछे रह गए हैं,जबकि उनके पास सोच,विचार और समझ है,लेकिन अभी चलत उनकी है,जिनका शोर है।यही वजह है कि कई ऐसे हैं,जिन्हें मैदान पकड़े चंद साल हुए हैं और पुरानों को ठिकाने लगा चुके हैं। फिर आपसी झगड़े कम नहीं है,कोई किसी को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है।प्रवचन और तकरीर में सब धैर्य,सब्र की बात करते हैं,लेकिन खुद जरा नहीं कर पाते हैं।लोगों के साथ कई तरह की दिक्कतें और परेशानियां हैं,जिससे निजात पाने के लिए उन्हें किसी ऐसे दरवाजे की जरूरत पड़ती है,जहां से सुकून मिल सके।बस,यही तलाश बाबा पैदा कर रही है !

Ramswaroop Mantri

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