~ प्रखर अरोड़ा
आत्मा की अनन्त यात्रा का अन्तिम सोपान है मानव शरीर। इसीलिए मानव शरीर को अति मूल्यवान माना गया है इस विश्व ब्रह्माण्ड में।
मानव योनि वास्तव में एक ऐसा स्थल है जहाँ से एक मार्ग संसार की ओर ,दूसरा मार्ग स्वर्ग की ओर ,तीसरा मार्ग नर्क की ओर और चौथा मार्ग जाता है मोक्ष की ओर।
आत्मा मोक्ष की कामना लेकर ही मानव शरीर स्वीकार करती है। मोक्ष का अर्थ है आत्म विश्राम।
लेकिन एक आश्चर्य की बात है और वह यह कि शरीर को स्वीकार करने के पूर्व नैसर्गिक रूप से आत्मा अपने आप दो खण्डों में विभक्त हो जाती है –पुरुषतत्व प्रधान खण्ड और स्त्रीतत्व प्रधान खण्ड।
काल के अन्तहीन प्रवाह में पड़कर पहला खण्ड पुरुष योनि में और दूसरा खण्ड स्त्री योनि में जन्म लेता है और यहीं से शुरू हो जाता है बार-बार जन्म और बार -बार मृत्यु का क्रम भी।
दोनों खण्डों का आत्मजन्य वियोग अत्यन्त असहनीय होता है।
वे दोनों खंड वियोग की पीड़ा, वेदना लिए इसलिए बार-बार जन्म लेते हैं कि कभी तो मिलेंगे। कभी तो पुनः एक होंगे।
लेकिन उनकी आशा कब साकार होगी–यह निश्चित रूप से नहीं बतलाया जा सकता।
मानव योनि को छोड़ कर किसी भी अन्य योनि द्वारा भले ही वह देव योनि हो, यक्ष योनि हो, गन्धर्भ योनि हो या हो अन्य कोई उच्च योनि ,मोक्ष संभव नहीं।
गुरुकृपा, ईश्वरकृपा से कार्यसिद्धि की बात करने वाले परजीवि धूर्त :
यदि कोई बाप किसी मक्कार बेटे को कुछ देना न चाहे, तो ये बाप की भी हत्या कर सकते है। मेरे दादा जी कहा करते थे, यदि घर में बेटा जन्म ले तो पिता बनने वाले व्यक्ति को खाने में ऐक रोटी कम कर देना चाहिये। और बेटी घर में जन्म ले तो खाने में ड़ेढ़ रोटी कम कर दे । उनका सीधा अर्थ था कि आज आप जिम्मेदारी लेंगे तो ६० की उम्र के बाद, पिता कहलाने के सही हकदार होंगे ।
हमारी संस्कृति में पिता को आकाश से बड़ा, और माता को धरती से भी बड़ा यूं ही नहीं कहा गया है। सनातन संस्कृति में पिता संतान के लिये मजदूरी करने में भी राजी है, मां दूसरे के घरों में जूठे वर्तन भी धो लेती है । एक व्यक्ति जो पिता बनने की जिम्मेदारी संतान के जन्म के समय लेता है, वही जिम्मेदारी उसी संतान के विवाह बाद यानि कि लगभग साठ की उम्र पहुंचते हुये पूरी कर पाता होगा । बच्चों का विवाह हो गया, सब व्यवस्थित है, तो वो व्यक्ति जिम्मेदारी से मुक्त कहलाता है।
कितनी संताने होंगी जिन्होंने पिता को पल पल संघर्ष करते हुये घर में देखा होगा, क्या उनके ये बात कभी दिमाग में आती होगी कि आखिर पिता की भी कोई आकांक्षा रही होगी । जो विगत तीस सालों हर रोज मरी है, और बाप के सीने के अंदर ही दफन हो गयी है। तो सनातनी पिता का सीना एक कब्रगाह की तरह होता है, जहां उसकी सारी खुसियां और सारी उम्मीदे दफन होती है।
भारत जैसे देशों में संतान पिता की सारे जीवन की पूंजी होती है । लेकिन अफसोस जब माता पिता को जब सबसे ज्यादा संतान की जरूरत होती है, वो उसके पास और उसके साथ नहीं होती है। लेकिन कुछ दुस्साहसी पिता होते हैं, जो अपने सपनों को मरने नहीं देते हैं। बल्कि संकल्प लेते है, कि मेरे सपने को अपने बेटे के अंदर प्रत्यारोपित करूंगा, इसे मैं सफल बनाकर रहूंगा। मैं जूतिया गांठ लूंगा, फल् बेच लूंगा, लेकिन बेटे को IAS बनाकर ही रहूंगा।
यहां से शुरुआत होती है, गुरु दीक्षा की, जब बेटा IAS बन जाता है, तो ये होती है, गुरु दक्षिणा। अब कोई बेटा ये कहे कि बाप की कृपा हो जाये, तो IAS बन जाऊं, तो जरा नजर उठा कर देख लीजिये, सभी बाप तो दिन रात काम से मरे जा रहे हैं, लेकिन IAS कितने बेटे बन रहे है?
जिस बाप ने अपने बेटे पर जितनी ज्यादा कृपा की है, बेटे ने दया नहीं की बाप की दुर्दशा करने में । गुरु मंत्र के बाद जो भी लेनदेन हुआ है, उसके परिणाम कभी अच्छे नहीं निकले हैं। जो शिष्य ये कहे कि गुरु कृपा होगी तब तो समझ लेना कि इसका गुरु धूर्त है। जो गुरु कहे कि सेवा करो दे ही देंगे, वो महाधूर्त होगा। जो गुरु ये कहे कि जब योग्य होगे तब दूंगा, तो समझ लेना ये महा ठग है। कोई बाप कभी ये नहीं कहता है, अपने बेटे से कि जब योग्य हो जाओगे तब स्कूल भेजूंगा।
वास्तविक गुरु ज्ञान की पराकाष्ठा है, और शिष्य गुरु का ही प्रतिरूप है। कोई पुत्र दिन भर पिता के पैर छुये, हाथ जोड़कर खड़ा रहे, इससे कोई पिता खुश होने वाला नहीं। जिस दिन पुत्र दुनियां से नजर मिलाने लग जाता है, बाप की छाती गर्व से अपने आप ही चौड़ी हो जाती है। श्रेष्ठ पिता वो जो खुद पार होने से पहिले पुत्र को पार लगा दे। जब कोई व्यक्ति किसी को किसी कार्य के लिये प्रोत्साहित करता है, मार्ग दर्शन देता है, तो वो विद्द्यार्थी और शिक्षक का संबध होता है।
गुरु एक ऐसा शब्द होता है, जो कभी भी व्याख्या के दायरे में नहीं आता है। जो भी लोग ये सोचते हैं, कि तुम्हीं हो माता, तुम्हीं हो पिता, मैं अज्ञानी बालक हूं, मुझे चम्मच से खिलाईये। ये सभी पापी है। ये लोग कुछ भी नहीं करना चाहते हैं। बस इन्हें गोद में बैठा लीजिये और स्पून फीडिंग देते रहिये। यदि गोद से नीचे उतार दिया तो तु काहे का गुरु है ?
बस सब कुछ गुरु ही कर दे, हमें कुछ करना ही न पड़े। ऐसे शिष्यों को गुरु भी ऐसे ही मिले हुये है, जो खूब एक दूसरे पर कृपा का ढोंग करते रहते है।





