अग्नि आलोक
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*हिदुत्व के नाम पर सनातनी सियासी षड्यंत्र* 

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       डॉ. विकास मानव 

     मुख्य बिंदु :

~ रामचरित मानस काल्पनिक पोथी
~वास्तविक राम के नाम पर बिना दसरथ के जन्मे, दसरथपुत्र का नामकरण
~भारत में मूलतः कभी हिन्दू थे ही नहीं
~रावण ईश्वर के अर्थ में भाषित चरित्र
~नवमी-विजयदशमी का संबंध सम्राट अशोक से
~ शकुंतलापुत्र भरत के नाम पर नहीं हुआ भारत का नामकरण

कुछ महीने पहले दिल्ली में एक सज्जन मुझे मिलने आए. औपचारिक बातचीत के बाद बड़ी ही गंभीर मुद्रा में महाज्ञानी की तरह विष्णु के अवतार की महिमा में तर्क दिया :

   “विष्णु जीवन है जो बदलता रहता है. अवतरित करता रहता है अपने आप को. शिव मृत्यु है. अटल है. बदलता नहीं है. इसलिए शिव अवतार नहीं लेता है. यही बात ब्रम्हा पर भी लागू होती है, क्योंकि वह सृजन है जो बदलता नहीं है. तो अवतार का मतलब भी नहीं बनता है।”

   फिर आगे बताया कि विष्णु के कुल चौबीस अवतार हैं जिसमे दस प्रमुख है। 

प्रश्न उठता है कि सचराचर के सारे जीव जड़ किस के अवतार हैं? क्या उनमें जो जीवन है वह विष्णु नहीं है? 

    यही हिन्दू धर्म है। विडंबनाओं से भरा हुआ. प्रश्नों से घिरा हुआ. जीव को ईश्वर से अलग करता हुआ. सनातन के कम्बल में छिपता-छुपाता सर्व समावेशी विष्णुवत स्वरूप. ऐसे ही लोग विद्वान समझे जाते हैं। 

   निष्कर्ष मे हम यह कह सकते हैं कि जितना कम समझ उतना अधिक ज्ञान। 

याद आता है कि जब युवा हो रहा था और इंटर कॉलेज में पढ़ रहा था तब किसी किसी रविवार को चर्च चला जाता था। धीरे धीरे वहां के पादरी महाशय से परिचय बढ़ गया। वह कई बार मुझे रोक लेता था, बातचीत करने के लिए। 

एक बार उसने कहा :

“ओनली क्राइस्ट इज द सन ऑफ गॉड।” 

हमने भी मुस्करा के कहा :

“क्राइस्ट इज द ओनली सन ऑफ गॉड।” 

वह बोला, “येस, येस।” 

हम मुस्कुराते रहे। तब उसने असहज होकर पूछा :

” बट व्हाट मेक्स यू स्माइल?” 

  हमने हंसकर कहा :

” जस्ट थिंकिंग व्हूज सन वी ऑल आर?” 

वह मेरी बात का आश्य समझ गया और शर्मा कर बोला :

” यू द नॉटी वन।”

आज लगता है कि तथाकथित मंचों से सारे के सारे उसी प्रकार के पादरी हिन्दू धर्म समझ और समझा रहे हैं। हमारे देश में जगतगुरू और जगत मां की तो भरमार ही है। तभी तो वास्तविक सनातन इतना अधिक सिकुड़ गया है। यही विडंबना है। वह पादरी तो खैर मेरी बात समझ गया था किन्तु इन भगवा रंग में रंगे पादरियों को कौन समझाए?

     यह भूमिका इसलिए भी जरूरी थी कि जब हम कुछ भी पढ़ते हैं मात्र हरि कृपा या प्रभु लीला समझ के, तो बहुत सारी वो बातें छूट जाती हैं जो किसी लेखक ने धर्म की आड़ में छुपाने का प्रयास किया है।

    हम मे भक्ति भावना जगा के धर्म के व्यापारी अपना कौन- सा उल्लू सीधा करना चाहते हैं, इस तरफ हमारा ध्यान जा ही नहीं पाता है। मंच पर बैठे तथाकथित जगतगुरू, कथावाचक, बाबा, सद्गुरु, महाराजा, स्वामी ये नहीं बता सकते कारण कि उनका खुद का क्या है? खुद वे क्या हैं, यह इन्हें नहीं मालूम होता है।

    वे खुद ही किसी बड़े षडयंत्र के शिकार होकर उस व्यवस्था के मजबूर मोहरे बने रहते हैं। मतलब सिर्फ़ दौलत बटोरना है, ये मतलब सधता है. रामायण, भागवत, शिव की कथित कथा में भी हम यह स्पष्ट रूप से देख सकते हैं, बशर्ते कि हम अपना दिमाग थोड़ा खोलकर रखें। 

महा पण्डित राहुल सांकृत्यायन रावन के स्वरुप को मौर्य वंश के नौ राजा और चाणक्य का एक समालित व्यक्तित्व से जोड़ते हैं। राम जन्म मे नौ मौर्य राजा ही नवमी तिथि के प्रतीक हैं। अशोक के तेरहवें अभिलेख के अनुसार राज्याभिषेक के आठ वर्ष बाद अर्थात् नौवें वर्ष में कलिंग का युद्ध लड़ा गया था। 

    यह भी राम के जन्म मे नवमी तिथि के जुड़े होने का एक कारण माना जाता है। गिरनार के आठवें शिला अभिलेख के अनुसार वह दसवें वर्ष संघ में शामिल हो गया था। अशोक से श्रद्धा रखने वाले इसलिए अशोक दशमी भी मनाते हैं।

     एक मान्यता के अनुसार कलिंग की लड़ाई चैत्र कृष्ण पक्ष में हुआ था और अशोक विजया दशमी के दिन संघ में शामिल हुआ था। चैत्र शुक्ल पक्ष में जन्म, नवमी तिथि, चैत्र दशहरा, विजया दशमी के दिन अशोक दशमी का मनाया जाना यह सब कुछ किसी नष्ट कर दिए गए इतिहास के वे पन्ने हैं जो कहीं न कहीं से रामायण की कहानी को अशोक से बहुत प्रगाढ़ता से जोड़ते हैं। 

     तुलसी ने भी इशारों इशारों में साफ कर दिया है कि रामायण एक काल्पनिक कथा है जिसकी रचना किसी शिव ने अपने मन में किया। इस कथा के महानायक राम भी काल्पनिक हैं क्योंकि भारद्वाज ऋषि ने याज्ञवल्क से दसरथ के बेटे राम से अलग राम को जानने की प्रार्थना की है, उस राम की जिसके नाम पर वशिष्ठ ने कौशल्या के बच्चे का नाम राम रखा था।

    तब अगर भक्ति और साधना की बात है तो यह रोम रोम मे बसने वाले उस राम की होनी चाहिए न कि बिना दसरथ के पैदा किये गए दसरथपुत्र राम की। 

     भारद्वाज की जिज्ञासा से स्पष्ट ही है कि दशरथ के बेटे रोम रोम में रमण करने वाले वह राम नहीं हैं जिसकी स्तुति वेदों में आत्मा के रूप में है और जिस पर ऋषिकुल के लघु रहस्य कथा सब बने हैं। 

    इसलिए इसको तुलसी ने रामायण नहीं कह के “राम चरित मानस” कहा है। मानस (मन) से रचा हुआ राम का चरित्र। 

   यह चरित्र वास्तविक नहीं है बल्कि मन से रचित चरित्र है। फिर इस पुस्तक को धर्म ग्रंथ कहना और बनाना एक बहुत बड़ा राष्ट्रीय षडयंत्र ही कहा जा सकता है, जिसके विषय में ये तथाकथित सन्त महन्त लोग भी कुछ नहीं जानते। 

मगर यह षडयंत्र है किस का? 

   यह किसी एक व्यक्ति का नहीं हो सकता है और अगर यह षडयंत्र है तो बहुत बड़ा, गहरा और पुराना है क्योंकि यह बाल्मिकी के समय से चला आ रहा है। 

    अगर पाणिनी संस्कृत को ध्यान में रखकर देखें तो यह शालीवाहन काल के बाद और गुप्त काल के आस पास जाकर ही ठहरता है.

   कारण किसी खुदाई में अभिलेखों अथवा अशोक के शिलालेखों में तो यह भाषा (संस्कृत) कहीं भी नहीं मिली है। तो यह अशोक के बहुत बाद ही अस्तित्व में आया होगा। तब से लेकर आज तक इस षडयंत्र को जारी रखने वाली कोई संस्था ही हो सकती है, कोई खास व्यक्ति नहीं।

     रामायण का सब से बड़ा चरित्र अगर गौर से देखें तो रावण ही है। दस सिर और बीस हाथ वाला कोई वास्तविक मनुष्य नहीं हो सकता है, यह तो अब सभी स्वीकारते हैं। 

    एक मान्यता यह भी है कि रावन शब्द तमिल भाषा के शब्द “ईरैवन” से लिया गया है जिसका अर्थ ईश्वर होता है। 

    यह भी एक गौड़ करने की बात है कि उत्तर भारत में दशहरे के दिन जब लोग रावण का पुतला जलाते हैं तो कहा जाता है कि उस में एक ऐसा समुदाय भी शामिल रहता है जिनके घरों में उस दिन सवेरे गोबर का रावण बना के पूजा जाता है।

     गुप्त पूजा की यह प्रथा उनके घरों में सदियों से पीढ़ी पीढ़ी दर से होती चली आ रही है। एक षडयंत्र जैसी बात के तरफ ईशारा इस से भी मिलता है।

    सत्य चाहे जो भी हो लेकिन इस चरित्र ने सदियों से बौद्धिक जगत में सब का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करके रखा है। 

    जो लोग रामायण को धर्म ग्रंथ नहीं मानते वे इसमें एक गुप्त षडयंत्र का सफल अभियान और युद्ध कला की कूटनीति ज्यादा देखते हैं। 

     कई विदेशी विद्वान रामायण को भारत वर्ष पर आर्यों के आक्रमण और उनके षडयंत्रपूर्ण विजय अभियान के रूप में ही देखते हैं जिसके दस्तावेज को धर्मग्रन्थ बना के इस देश के मूल निवासियों के गले में बलपूर्वक ठूंस दिया गया है। 

जब हम पूजा में संकल्प लेते समय बोलते हैं :

   जम्बू द्वीपे भरतखंडे (यहां तक तो ठीक है लेकिन) आर्यावर्ते या आर्यावर्ततांतरगते पढ़ते हैं (वह गलत है)। 

   आर्यावर्ते या आर्यावर्ततांतरगते कहने से इसमें वर्तमान भारत से बहुत दूर ईरान में चले जाते हैं। ईरान का सुल्तान अपने को आर्य मेहर (मिहिर) कहता था। ऐसी हालत में भरतखण्ड का विस्तार सुदूर तुर्किस्तान तक हो जायेगा। लेकिन ज्ञात इतिहास में ईरान ईराक या उस से आगे तुर्किस्तान तक भारत वर्ष का कभी हिस्सा रहा हो ऐसा नहीं मिलता है। 

    आज जब हम अपने देश में संकल्प ले रहे हैं तो ईरान (आर्यावर्त) को जोड़ना भी एकदम अनर्गल सा ही लगता है।”

     संकल्प के समय आर्यावर्ते या आर्यावर्ततांतरगते कहने के कारण ही विदेशी विद्वान इसको षडयंत्र कहते हैं और इस षडयंत्र मे वे ब्राह्मण समुदाय को भी बराबर का भागीदार मानते हैं। यह भी ब्राह्मणों को विदेशी समझे जाने की अवधारणा का एक कारण बन गया है। 

    लोग समझते हैं कि यहां के ब्राह्मण मुख्य रूप से आर्यावर्त मतलब ईरान की तरफ से से आए थे। 

    कुछ ऐसे भी विद्वान हैं जो कहते कि ब्राह्मण मनुष्य नहीं उस से ऊपर की कोई खास प्रजाति है। उनका तर्क है कि मनु के सन्तान मनुष्य हैं। लेकिन ब्राह्मण ब्रम्ह के मुख से उत्पन्न हुए हैं। इसलिए ब्राह्मण मनुष्य से ऊंचे हैं। 

     इस तरह के बकलोली से राम तो मनुष्य हो जायेंगे और ब्राह्मण उन से भी ऊपर। जो लोग मीडिया में ब्राह्मणों का बढ़ चढ़ कर वखान करते रहते हैं उनके मन भी शायद यही बात रहती है। इससे ब्राह्मणों का उल्टे नुक्सान ही होगा। 

     उनके बाहर से आने की अवधारणा को बल ही मिलेगा। इसलिए जो बाहर से मतलब ब्रम्ह के मुख से आए हैं वो अपना जानें लेकिन जिस प्रकार से भारत के सारे मुसलमान या सारे ईसाई विदेशी नहीं हैं उसी प्रकार से यहां के सभी ब्राह्मण लोग भी विदेशी नहीं हो सकते हैं। 

       इस देश को भारत इसलिए बोलते थे क्योंकि यहां के वासी खुद को भरत (सब का भरण पोषण करने वाले ईश्वर) का सन्तान भारत कहते थे। 

    गीता में अर्जुन को बार बार भारत पुकारा गया है। यहां का हर व्यक्ति ही भारत है। कुछ लोगों ने जबरदस्ती यह फैला रखा है इस देश का नाम शकुन्तला पुत्र भरत के नाम पर भारत पड़ा है।

      वास्तव मे राम के भाई भरत या शकुन्तला पुत्र भरत का नाम जिस पर रखा गया उसी भरत (विश्व भरण पोषण कर जोई) के नाम पर इस देश का नाम भारत है।

    आज कल कुछ लोग चेहरे का लंबोतरा होना, नाक का खड़ा नुकीला होना या आंखों के छोटे होने इतियादी के आधार पर देशी विदेशी होने का फर्क करना चाहते हैं। फिर कहते हैं कि शताब्दियों से यहां विभिन्न प्रजातियों में आपसी शादी विवाह, दास प्रथा, बलात्कार, महिलाओं का भिन्न भिन्न प्रकार से यौन शोषण और तदुपरान्त संतानोत्पति आदि के परिणाम स्वरूप बहुत सारे प्रजातियों के नस्लीय गुण बुरी तरह से मिश्रित हो चुके हैं। 

     इसलिए इस प्रकार विभाजन सही और तार्किक नहीं है। यह बात बहुत हद तक सही भी है। इसके बाद वे जातीय विभाजन के लिए अंग्रेजो को दोष देना चाहते हैं कि जन गणना के बाद भारत में जाति बना, वरना सभी पहले हिन्दू ही थे। यह सरासर झूठ है। 

       यहां के लोग हिन्दू कभी भी नहीं थे। राज काज के भाषा में हिन्दू शब्द का इस्तेमाल पहली बार मुगल काल में मिलता है। हिन्दू शब्द का उल्लेख मुख्य रूप से मन्दिरों, मठों और तीर्थों के लिए दान में धन और जमीन लेने वाले के लिए किया गया है, टोडरमल द्वारा। 

    इसी के आधार पर अंग्रेज़ों ने यहां के सभी मन्दिर जाने वालों और मूर्ति पूजने वाले को हिन्दू कह दिया। लेकिन अंग्रेजों पर जाति बनाने का दोष नहीं दिया जा सकता है कारण कि जन्म से ही जाति प्रथा तो यहां अंग्रेज़ों से बहुत पहले से लागू हो गया था। 

    मनुस्मृति में इसका विवरण है। तुलसी ने कुछ स्थानीय जातियों के नाम का भी जिक्र किया है जो मनुस्मृति के हिसाब से शुद्र ही हैं। लेकिन नोट करने वाली बात यह भी है कि तुलसी ने खुद हिन्दू शब्द का प्रयोग कहीं नहीं किया है। 

फिर ये हिन्दू लोग कौन थे?

अकबर के समय चार तरह के बख्सीस थे :

नजराना, फकीराना, चौधराना और ब्रम्होत्तर। 

    मन्दिरों मठों और तीर्थों को दिया जाने वाला जमीन ब्रम्होत्तर कहलाता था। इस प्रकार से दान पाने वाले सभी ब्राह्मण तो इस मे थे नही? 

    तब बड़ा प्रश्न यह है कि हिन्दू बने मुगलों के समय वे दान प्राप्त कर्ता कौन थे जिनको हिन्दू कह के दर्ज किया गया? 

     निश्चित रुप से ये मन्दिरों, मठों और तीर्थों से जुडे लोग ही रहे होंगे। लेकिन असल में वे कौन लोग थे जिन्होने ने हिन्दू कह के अपना नाम दर्ज करवाया? 

     क्या वे मन्दिरों, मठों और तीर्थों से जुडे लोग ही थे या इस के बाहर से भी थे अथवा एक समूह था जो अंदर और बाहर दोनों ही जगह था। कौन सब थे किसी भी ऐसे समूह में जो आज प्रगट नहीं हो रहे है? 

क्या यह सब कुछ ही अति षडयंत्रपूर्ण नहीं लगता है?

    एक मत यह भी है कि जब यह स्पष्ट होने लगा कि भारत को आजादी मिल जायेगी और आजादी के बाद यहां लोकतन्त्र की सरकार होगी तो ब्राह्मण अल्प मत मे आ जायेंगे। फिर ब्राह्मणों का वह इज्जत और रुतबा नहीं रहेगा जो मुसलमानो और अंग्रेजों से पहले था। 

    इसी कारण से, जैसा कि सभी जानते हैं, कुछ विशिष्ट लोग और संस्था आजादी के प्रबल पक्षधर नहीं थे। लेकिन आजादी मिलना लगभग तय था। तब कहा जाता है कि बालगंगाधर तिलक ने सुझाव दिया कि अब ब्राह्मण खुद को और बाकि सब को भी हिन्दू कहेंगे और अपना धर्म अब हिन्दू धर्म न बोलकर सनातन धर्म बोलेंगे। 

    तभी से जानकार बताते हैं कि वही विशिष्ट लोग और संस्था ने यह कहना शुरु किया कि हिन्दू धर्म जैसी कोई चीज नहीं होती है। हम सब की जाति हिन्दू और धर्म सनातन है। उससे से पहले ये लोग सब का धर्म हिन्दू धर्म ही बताते थे। परन्तु समझ में नहीं आता है कि इतना भयभीत होने का कारण क्या था और यह सब करने की आखिर जरूरत ही क्या थी?

       इन सब तथ्यों के प्रकाश में रामायण के रावण का स्वरूप बहुत हद तक सुस्पष्ट होने लगता है। मतलब कि रावण कोई एक व्यक्ति का नाम नहीं बल्कि एक ऐसा समूह या संस्था का नाम है जिसकी अनेक उपसमूह अथवा शाखाएं हैं।

       ये सब शाखाएं उसके अनेक मुंह और भुजाओं की तरह काम करते हैं। ये बाहर से अलग और अन्दर एक (रावण) हैं। ये शाखाएं दस अलग अलग तरह की बात करते हैं लेकिन लक्ष्य और उद्देश्य एक ही रहता है। उदाहरण के लिए, एक कहेगा कि गाय नहीं कटनी चाहिए। 

    दूसरा कहेगा हम किसी के आहार व्यवहार के विरोधी नहीं है। जिसको जो रुचे खा सकता है। तीसरा गौ मांस निर्यात जरूरी बताएगा क्योंकि बूढ़ी सुखी विसुखी गाएं और बछड़े किसी काम के नहीं होते। 

     कोई कहेगा गाय काटोगे तो गाय के ही तरह काटे भी जाओगे। कोई इस मे धर्म की बात ठोक देगा। कोई राष्ट्र का मुद्दा जोड़ देगा। रावण के दस मुंह से दस तरह का बात निकलता रहता है। उसके बीस हाथ हमेशा बीस तरह के अच्छे बुरे कामों में लगे रहते हैं। 

     लोगों को जान बूझकर प्रायोजित तरीके से भ्रमित रखा जाता है। मायावी रावन स्पष्ट रुप से कभी नहीं दिखता है। दिखता भी है तो महा पण्डित के रुप में। 

     सभी देश में रावण है। भारत में शायद यह अशोक के समय से ही विद्यमान है। यह रक्तबीज के तरह है। यह मरता नहीं है। बस हर युग में नाम और स्वरूप बदल लेता है।

Ramswaroop Mantri

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