
कनक तिवारी
(1) गांधी ने आइना दिखाया
(1) यह प्रचार चैनलों, अखबारों और सोशल मीडिया में सायास किया जा रहा है। गांधी और अंबेडकर जैसी हस्तियां भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों में गई हैं। नहीं बताया जाता कि गांधी वहां कब और क्यों गए थे। संघ ने गांधी के भाषण या मुलाकात का ठीक ठीक ब्यौरा प्रकाशित भी नहीं किया। जागरूक गांधी ने लेकिन सब कुछ लिखकर इतिहास बना दिया। 5 अप्रेल 1947 को नई दिल्ली की प्रार्थना सभा में गांधी ने चेतावनी बिखेरी कि पिछले तीन दिनों से उनकी सभा में हंगामा किया जा रहा था कि वे हिन्दू होकर कुरान शरीफ की आयतें क्यों पढ़ते हैं। ओज अबिल्ला का पाठ क्यों करते हैं।

(2) उन्होंने 16 सितम्बर 1947 में दिल्ली में संघ की रैली में ऐतिहासिक उद्बोधन दिया। ‘‘बरसों पहले (शायद 1934 में) मैं वर्धा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शिविर में गया था। उस समय इसके संस्थापक श्री हेगडेवार जीवित थे। स्व. श्री जमनालाल बजाज मुझे शिविर में ले गये थे। और वहां मैं उन लोगों का कड़ा अनुशासन, छुआछूत का तमाम खात्मा और कठोर सादगी देखकर प्रभावित हुआ था। लेकिन सच्चे रूप में उपयोगी होने के लिए त्यागभाव के साथ मकसद की पवित्रता और सच्चे ज्ञान का संयोजन जरूरी है। ऐसा त्याग, जिसमें इन दो चीजों की कमी हो, समाज के लिए घातक सिद्ध हुआ है।
फिर कहा कुछ दिन पहले ही आपके गुरुजी से मेरी मुलाकात हुई थी। मैंने उन्हें बताया था कलकत्ता और दिल्ली में संघ के बारे में क्या-क्या शिकायतें मेरे पास आई थीं। गुरुजी ने आश्वासन दिया ‘‘यद्यपि संघ के प्रत्येक सदस्य के सही व्यवहार की जिम्मेदारी नहीं ले सकते, फिर भी संघ की नीति हिन्दुओं और हिन्दू धर्म (हिन्दुइज़्म) की सेवा करना भर है और वह भी किसी दूसरे को नुकसान पहुंचाकर नहीं। संघ आक्रमण में यकीन नहीं रखता। अहिंसा में उसका विश्वास नहीं है। वह आत्म-रक्षा की कला सिखाता है। बदला लेना उसने कभी नहीं सिखाया।‘‘
(3) फिर कहा मुझसे कहा जाता है कि आप मुसलमानों के दोस्त हैं और हिन्दुओं और सिक्खों के दुश्मन। यह सच है कि मैं मुसलमानों का दोस्त हूं, लेकिन मैं पारसियों और दूसरे लोगों का भी हूं। ऐसा तो मैं बारह वर्ष की उम्र से ही हूं। लेकिन जो मुझे हिन्दुओं और सिक्खों का दुश्मन कहते हैं, वे मुझे जानते नहीं। मैं किसी का भी दुश्मन नहीं हो सकता, हिन्दुओं और सिक्खों का तो बिल्कुल ही नहीं।
अगर पाकिस्तान बुराई ही करता रहा तो आखिर हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में लड़ाई होनी ही है। अगर मेरी चले तो न तो मैं फौज रखूं और न पुलिस। मगर ये सब हवाई बातें हैं। मैं शासन नहीं चलाता। पाकिस्तान वाले हिन्दुओं और सिक्खों को क्यों नहीं मनाते कि यहीं रहो, अपना घर मत छोड़ो। वे उन्हें हर तरह की सुरक्षा क्यों नहीं देते। इसी तरह क्यों न वे आज भारतीय संघ एक एक मुसलमान की सुरक्षा सुनिश्चित करें? दोनों पक्ष आज पागल जैसे हो गये हैं। इसका नतीजा तो बरबादी और तबाही ही होगी। संघ के खिलाफ जो आरोप लगाये जाते हैं, उनमें कोई सच्चाई है या नहीं, यह मैं नहीं जानता। यह संघ का काम है कि वह अपने लगातार व्यवहार से इन आरोपों को झूठा साबित कर दे।‘‘
(4) 15 नवम्बर 1947 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में गांधी ने कहा ‘‘मैं एक कट्टर सनातनी होने का दावा करता हूं। मैं जानता हूं कि मेरा धर्म छुआछूत की ताईद नहीं करता। हिन्दू महासभा का मकसद हिन्दू समाज का सुधार करना है, जनता के नैतिक स्तर को ऊंचा उठाना है। तब फिर सभा सभी मुसलमानों को मुकम्मिल तौर पर हिन्दुस्तान से बाहर निकाल देने की बात कैसे कर सकती है। मुझे बताया गया है कि वह करती है। मैं जानता हूं कि कुछ लोग कह रहे हैं कि ‘‘कांग्रेस ने अपनी आत्मा मुसलमानों के हाथों बेच दी है। गांधी! जो बकता है, बकने दो। वह तो खत्म हो गया है। जवाहरलाल भी उससे कोई बेहतर नहीं है। बचे सरदार पटेल, सो उनमें कुछ है। उनका एक हिस्सा ठोस हिन्दू है, लेकिन आखिरकार वह भी कांग्रेसी हैं।‘‘
ऐसी बातों से हमारा भला नहीं होगा। हिन्दू महासभा में कौन है जो कांग्रेस के नेताओं की जगह ले सके? हिंसात्मक गुण्डागर्दी से हिन्दू धर्म या सिख धर्म की रक्षा नहीं होगी? मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में बहुत सी बातें सुनता हूं। मैंने ऐसा भी सुना है कि इस सारी शरारत के पीछे संघ है। हमें भूलना नहीं चाहिए कि लोकमत में हजारों तलवारों से भी ज्यादा प्रबल शक्ति है। हिन्दू धर्म की रक्षा खूनखराबे और हत्याओं से नहीं हो सकती।
(5) 16 नवम्बर 1947 को प्रार्थना सभा में गांधी ने कहा ‘‘रामपुर स्टेट के शासक मुसलमान हैं, मगर इसका यह मतलब नहीं कि वह मुस्लिम स्टेट है। पिछले इतवार को जो हिन्दू दोस्त वहां से मुझे मिलने के लिए आए थे, उन्होंने दूसरी ही कहानी सुनाई। उन्होंने कहा कि अगरचे वह स्टेट हिन्दुस्तानी संघ में शामिल हो गई है, तो उस पर आसानी से काबू पाया जा सकता था। मगर वहां हिन्दू महासभा भी है जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आदमियों से मदद मिलती है, जिनकी इच्छा यह है कि सारे मुसलमानों को हिन्दुस्तानी संघ से निकाल दिया जाये।‘‘
(6) गांधी का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में आखिरी भाषण नई दिल्ली की प्रार्थना सभा में 3 दिसम्बर 1947 को दिया गया। उन्होंने कहा ‘‘कांग्रेस वाले ऐसा करते ही नहीं हैं, हिन्दू महासभा वाले और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वाले करते हैं। हिन्दू महासभा वाले और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वाले कहते हैं कि हमने तो किसी का मकान जलाया ही नहीं है। मैं किसकी बात मानूं? कांग्रेस की या मुसलमानों की या हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की? हमारे मुल्क में ऐसा हो गया है कि ठीक-ठाक पता लगाना मुश्किल हो गया है। गलती हो गई तो मान लेना चाहिए। हिन्दुओं से गफलत हो गई, हिन्दुओं ने ज्यादतियां की तो कह देना चाहिए। इसमें क्या है? अगर नहीं हुआ है और मुसलमान अतिशयोक्ति करते हैं कि उनका मकान जला दिया गया है, उनको जबरदस्ती हिन्दू बनाया गया है, उनकी लड़की भगा ली गई है तो डंका पीटकर संसार को बता देना चाहिए कि बात क्या है।
(7) 1934 में गांधी का संघ के शिविर में जाना और आजादी के बाद हिन्दू मुसलमान के बीच अचानक फैले दंगों की पृष्ठभूमि में जाना दो अलग अलग सियासती इबारतें हैं। गांधी संघ की मजहबपरस्ती की आरोपित भूमिका को लेकर जिज्ञासु बने रहे। कभी नहीं कहा कि उनकी जांच पूरी हो गई है और वे संघ की भूमिका से संतुष्ट हैं। शब्द किफायती गांधी मारक भाषा के कीमियागर थे। बैरिस्टर रहे गांधी शब्दार्थ पर भावार्थ बल्कि निहितार्थ को बेहतर समझते थे। इसलिए उनका कथन इतिहास की पुख्ता ईंटों की तरह हमारे वक्त को आज भी बचाने की कोशिश कर रहा है। राहुल गांधी ने गांधी की हत्या को लेकर संघ पर आरोप लगाए हैं। उन पर मुकदमा चल रहा है। हिन्दू मुस्लिम इत्तहाद को कुछ सांप गांधी के वक्त डस रहे थे। वह जहरखुरानी कम तो नहीं हुई बल्कि सांपों को दूध पिलाया जा रहा है। गांधी की हत्या इस कारण भी हुई कि हिन्दू मुस्लिम इत्तहाद स्थापित हो जाता तो भविष्य नई बुनियाद पर तामीर हो सकता था। इसमें कहां विवाद है तथाकथित हिन्दुत्व परस्त ने गांधी को मारा है। वह हिन्दू धर्म के समावेशी चरित्र के खिलाफ है। हिन्दुत्व शब्द का आविष्कार 1925 में हिन्दू महासभा के विनायक दामोदर सावरकर ने किया था। सावरकर से कई मुद्दों पर असहमति के बावजूद हिन्दुत्व शब्द को संघ ने हथियार बना लिया है। संघ के साहित्य में गांधी की प्रशंसा नहीं है।





