पुष्पा गुप्ता
संस्कृत पाणिनि व्याकरण से बंधी हुई भाषा है, लगभग 2600 वर्ष पहले व्याकरण का जो चौकठ पाणिनि ने इसके लिए तैयार कर दिया था उसी के भीतर चल रही है। यह फैली, खूब संपन्न हुई, भरी पूरी और अलंकृत बनी, लेकिन अपने मूल को पकड़े रही। संस्कृत साहित्य के ह्रास के जमाने में इसने अपनी कुछ शक्ति और शैली की सादगी खो दी और जटिल रूपो और उपमाओ और उत्प्रेक्षाओ में उलझ गयी।शब्दों को जोड़ने वाले समास के नियम पंडितों के हाथ में पड़ कर चतुराई दिखाने के साधन बन गए और ऐसे समास- पद बनाए जाने लगे, जो कई पंक्तियों में जाकर टूटते थे।
सर विलियम जोंस ने 1884 में ही कहा था-” संस्कृत भाषा चाहे जितनी पुरानी हो उस का गठन अद्भुत है; यूनानी भाषा के मुकाबले में ज्यादा मुकम्मिल, लातीनि के मुकाबले में यह ज्यादा संपन्न और दोनों को मुकाबले में यह ज्यादा परिष्कृत है ;लेकिन दोनों साथ धातु क्रियाओं और व्याकरण के रूपो में इतनी मिलती- जुलती है कि यह संयोग आकस्मिक नहीं हो सकता। यह मेल इतना गहरा है कि कोई भी भाषा शास्त्री इसकी जांच करने पर इस नतीजे पर पहुंचे बिना नहीं रह सकता कि यह भाषाएं किसी एक ही सोते से निकली है ,जो शायद अब नहीं रह गया है”।
विलियम जोंस के बाद और यूरोपीय विद्वान हुए हैं- अंग्रेज, फ्रांसीसी, जर्मन और दूसरे- जिन्होंने संस्कृत का अध्ययन किया और एक नए विज्ञान, यानी तुलनात्मक भाषा- विज्ञान,की नीव डाली। जर्मनी के विद्वान इस नये मैदान में आगे बढ़े और संस्कृत में खोज करने का सबसे ज्यादा श्रेय 19 वी सदी के इन्हीं जर्मन विद्वानों को मिलना चाहिए।
व्याकरण और भाषा के मुकाबले भाषा खुद बड़ी चीज है ।यह एक जाति और संस्कृति के प्रतिभा की कवित्वमय विरासत है और जिन विचारों और कल्पनाओं ने उन्हें ढाला है उनका जीता जागता रूप है। शब्द यूग-यूग में अपने अर्थ बदलते रहते हैं और पुराने विचार नए विचारों में तब्दील होते जाते हैं ,अगरचे अक्सर वे अपना पुराना भेस कायम रखते हैं। अंग्रेजी में या किसी विदेशी भाषा में संस्कृत से शायद ही कोई ऐसा अनुवाद हुआ हो जिसे हम मान्य और मूल के साथ न्याय करने वाला कह सकते हैं। इस काम में हिंदुस्तानी और विदेशी दोनों ही अलग-अलग कारणों से नाकामयाब रहे हैं ।
जर्मन विद्वान मैक्स मूलर ने कहा है- “प्राचीन और आज के हिंदुस्तान के बीच ऐसा अद्भुत सिलसिला चला आ रहा है कि बावजूद बार-बार के सामाजी उथल-पुथल के, धार्मिक सुधारो और विदेशी हमलों के ,संस्कृत आज भी अकेली भाषा है जो इस भरे देश में सब जगह बोली जाती है ।”
आज की किसी भी भारतीय आर्य भाषा- हिंदी ,बंगाली, मराठी, गुजराती आदि को अच्छी तरह जानते हैं ,आसान है। आजकल की उर्दू खुद एक भारतीय आर्य भाषा है, इसमें 80 फ़ीसदी लफ्ज संस्कृत के है ।अक्सर यह बताना मुश्किल हो जाता है कि कोई खास शब्द संस्कृत से आया है या फारसी से क्योंकि इन दोनों भाषाओं के मूल शब्द अक्सर एक से है।कुछ अचरज की बात है कि दक्षिण की द्रविड़ भाषाओ ने ,जो बिल्कुल अलग की भाषाएं हैं संस्कृत के ईतने शब्द अपने में ले लिए हैं कि करीब करीब उसका आधा शब्द कोष संस्कृत से मिलता है।
यह जानना दिलचस्प होगा कि आजकल के थाईलैंड में जब नए पारिभाषिक, वैज्ञानिक और प्रशासन संबंधी पारिभाषिक शब्दों की जरूरत हुई तो उनमें से बहुत से संस्कृत के आधार पर बना लिए गए। प्राचीन हिन्दुस्तानी ध्वनि पर ज्यादा जोर देते थे और इसलिए उनकी रचनाओं में चाहे वे गद्य में हो या पद में, एक लय और संगीत का गुण मिलता है। हिंदुस्तान के संस्कृत कवियों में ध्वनि के परिवर्तनों का जो एहसास है उसके बराबर की मिसाल दूसरे देशों के साहित्य में बहुत कम मिलेगी और उसके शब्द विन्यास में बड़ा ही आनंद आता है।
वेदो के पाठ में आज भी उच्चारण उन नियमों के अनुसार किए जाते हैं, जो पुराने जमाने में बनाए गए थे। मौजूदा जमाने की हिंदुस्तानी भाषाएं जो संस्कृत से निकली है और इसलिए भारतीय आर्य भाषा कहलाती आती है ,ये है- हिंदी, उर्दू,बंगाली, मराठी , गुजराती, उड़िया, आसामी,राजस्थानी, पंजाबी , सिंधी , पश्तो और कश्मीरी। द्रविड़ भाषाएं हैं- तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम। इन 15 भाषाओ में सारे हिंदुस्तान की भाषाएं आ जाती है और इनमें से हिंदी सबसे ज्यादा प्रचलित है और जहां यह बोली जाती है वहां समझ ली जाती है ।
पस्तो, जो संस्कृत से निकली हुई भरतीय आर्य भाषाओं में से एक है पश्चिमोत्तर के सरहदी सूबे की जुबान है और अफगानिस्तान की भी। लंका की भाषा सिंहली है यह भी संस्कृत से निकली हुई एक भारतीय आर्य भाषा है। स्लाव भाषा तक मे बहुत से मूल शब्द संस्कृत से मिलते है। सबसे निकट की यूरोपीय भाषा लिथुआनियन है।
(स्रोत~ हिंदुस्तान की कहानी : पंडित जवाहरलाल नेहरू)





