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*बदलाव असंभव लगे तो भी बच्चों को बचाएं*

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            सोनी कुमारी, वाराणसी

जब अत्याचार, अनाचार, शोषण और लूट और बर्बरता का अँधेरा इतना गहरा हो जाये कि हाथ को हाथ न सूझे और नज़र के दायरे के भीतर किसी भी ओर से उम्मीद की कोई किरण नज़र न आये, तो हम क्या कर सकते हैं?

हमारे सामने दो रास्ते हैं। पहला, हम इसी घुटन में, मौतों और अमानुषिकता से भरे इसी अँधेरे में जीने की आदत डाल लें! और दूसरा, इस अँधेरे के ख़िलाफ़ लड़ते रहने को ही अपने जीने का तरीक़ा बना लें, अपनी आदत बना लें!

 यह ज़िन्दगी रेंग-रेंगकर, घिसट-घिसटकर, काट देने के लिए नहीं मिली है। अगर अमानुष और कायर बनकर, माँदों में चूहों की तरह में दुबककर जीना हो, या कुत्ता-कमीना बनकर हत्यारों के दस्ताने चढ़े ख़ूनी हाथों को घुटनों के बल बैठकर चूमकर, कुछ सुविधाएँ और पद-प्रतिष्ठा हासिल करके कुछ आराम के साथ जीना हो, तो क्या लाख गुना बेहतर विकल्प यह नहीं है कि यंत्रणा-गृहों और मौत तक का जोखिम उठाकर, चाहे जितनी भी छोटी ज़िन्दगी हो, उसे शान से सिर उठाकर जिया जाये, एकदम बिंदास! असली इंसान की तरह! 

      कविता जैसा जीवन जिया जाये, न्याय के लिए सड़क पर जूझा जाये, मुक्ति के सपने देखे जायें और लोगों को सपने देखना और सपनों का पीछा करना सिखाया जाये! 

       फिर उसके बाद इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि एक दिन आप कहीं सड़कों पर बरसती गोलियों के शिकार हो जायें, भाड़े के हत्यारों के हाथों, क़ानून के हाथों, या किसी फर्जी एनकाउंटर में मारे जायें या पूरी ज़िन्दगी के लिए जेल की अँधेरी कोठरी में धकेल दिये जायें! 

     इतनी सिम्पल-सी तो बात है! पता नहीं, लोगों की समझ में क्यों नहीं आती है!

*बच्चों को बचाएँ इंसानियत सिखाएँ.*

      जो बच्चे साहित्य-कला, प्रकृति और दोस्तों की संगत में जीना पसन्द करने लगेंगे, वे ही बड़े होकर भावप्रवण बनेंगे और सच्चे लोगों से भरी एक सुंदर और न्यायपूर्ण दुनिया के सपने देखेंगे . 

      समस्या यह है कि यंत्र मानव बनाने वाली नीरस-बेजान शिक्षा व्यवस्था, अलगाव और हृदयहीनता से भरे समाज और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से परोसी जाने वाली बाल मनोरंजन की स्वार्थी, मनोरोगी, प्रतिस्पर्धावादी बनाने वाली सामग्री के घटाटोप में एक आम नागरिक बच्चों को ऐसा माहौल और ऐसी चीज़ें कैसे मुहैया कराये, जो ख़ुद ही परिवार के भरणपोषण के लिए ही दिन-रात हड्डियाँ गला रहा है और शोषण-उत्पीड़न की चक्की में पिस रहा है! 

     लेकिन कुछ न कुछ तो करना ही होगा! बच्चों को बचाना होगा! बच्चों को बचाना भविष्य को बचाना है! एक सुंदर दुनिया के सपनों और उम्मीदों को बचाना है! 

     हमें बच्चों के लिए भी तृणमूल स्तर से एक सांस्कृतिक-वैचारिक पुनर्जागरण और प्रबोधन की मुहिम संगठित करनी होगी! आम लोगों को जागृत और संगठित करके, उन्हींकी सामूहिक ऊर्जा और उन्हीं से जुटाये संसाधनों के भरोसे बाल शिक्षा और मनोरंजन का नया वैकल्पिक ढाँचा खड़ा करना होगा — मुहल्लों और मज़दूर बस्तियों में पुस्तकालय, सांस्कृतिक केंद्र, खेलकूद क्लब आदि. हमें बच्चों के साहित्य के और पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन, बाल फिल्मों के निर्माण व प्रदर्शन, नाटक एवं सांस्कृतिक प्रशिक्षण के केन्द्रों और कार्यशालाओं का नेटवर्क खड़ा करना होगा.

      काम लंबा और चुनौतीपूर्ण है, लेकिन असंभव नहीं है. इसके लिए हमें सैकड़ों नहीं, हज़ारों समर्पित सामाजिक व सांस्कृतिक संगठनकर्ताओं की ज़रूरत होगी. और समझाने पर मदद करने वाले मिल जायेंगे, क्योंकि समस्या घर-घर की है.

     बच्चों का मोर्चा भी सामाजिक मुक्ति का एक अनिवार्यतः ज़रूरी और बुनियादी मोर्चा है, आखिर इस बात को हम कब समझेंगे और कितने विनाशकारी नतीज़ों को भुगत कर समझेंगे?

Ramswaroop Mantri

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