अग्नि आलोक
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भिखारी नहीं लाभार्थी कहो?

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शशिकांत गुप्ते

सुबह सीतारामजी से भेंट हो गई।
सम्भवतः मॉर्निंग वॉक के लिए निकले होंगे। लेकिन अभी तो सुबह के लगभग आठ बजे गए हैं?
मैने सीधे सीधे पूछ लिया,क्या आप मॉर्निंग वॉक कर रहें हैं?
सीतारामजी ने कहा नहीं मॉर्निंग वॉक तो सुबह ही हो गया है,अभी तो मैं देश के लाभार्थियों के दर्शन करने निकला हूँ।
मै (सीतारामजी) प्रतिदिन ही लाभार्थियों के दर्शन करने निकलता हूँ। विभिन्न मंदिरों, धार्मिक स्थानों, इबाददगाहों, पुण्यात्माओं की समाधियों, और दरगाहों पर असंख्य लाभार्थियों के दर्शन हो जातें हैं।
मैने कहा यह तो सब भिखारी हैं?
इनमें तो कईं सर्वांगसम्पन्न हैं। भिखारियों को निट्ठल्ले कहना चाहिए। इन्हें आप लाभार्थी कह रहें हैं।
सीतारामजी एकदम क्रोधित हो गए। आज एकदम विपरीत मानसिकता में दिखाई दिए।
आज सीतारामजी ने मुझसे कहा वो व्यंग्यकार,खबरदार जो लाभार्थियों को भिखारी कहा?
जानते नहीं हो कितने गर्व की बात है,अपने देश की आबादी लगभग एक सौ पैंतीस करोड़ है। पचास करोड़ को छोड़ कर शेष पिच्यासी करोड़ लाभार्थी हैं।
लाभार्थियों के महत्व को समझों, देश में बेरोजगारी महंगाई,कुपोषण,और अन्य बुनियादी समस्याओं को ताक़ में रखकर लाभार्थियों ने अपनी ताकत का उत्तरप्रदेश के चुनाव में कैसा करिश्मा कर दिखाया सभी विरोधी मुँह ताक़तें रह गएं।
मैने कहा यह तो अर्कमण्यता है!
सीतारामजी ने कहा आप जैसे कथित चंद बुद्धिजीवियों में यही कमी है। आप जैसे लोग हरएक मुद्दे की आलोचना ही करतें हैं।
मैने पूछा महंगाई पर आप क्या कहना है?
शायद आप जातने नहीं हो,देश चलाने के लिए धन चाहिए। यदि जनता थोड़ी महंगाई बर्दाश्त कर लेती है तो देश की सरकार को कितना आर्थिक सहयोग मिल जाता है। यह कभी सोचा है आपने?
मैने पूछा क्या इसके पूर्व सरकारों को धन की आवश्यकता नहीं होती थी?
सीतारामजी क्रोध से तमतमाते हुए कहने लगे पूर्व की सरकार ने कुछ किया नहीं है।
मैने सोचा बहस को यही पूर्ण विराम देना चाहिए।
राम राम कहकर सीतारामजी से विदा ली।
घर की ओर दो चार कदम बढ़ा ही था,उसी समय लाभार्थियों के एक दम्पत्ति ने मेरे समक्ष हाथ फैलातें हुए,धनलाभ की गुहार की।
मुझे आश्चर्य हुआ, लाभार्थियों के पास जो थैला था,उसपर दानवीर जनसेवक के साथ लक्ष्मीजी को अर्पित करने वाले फूल का चित्र अंकित था।
वह लाभार्थ दम्पत्ति गाना गा रही थी यहाँ वहाँ मत पूछो कहाँ कहाँ
यह सुनते ही मुझे सर्वत्र लाभार्थियों को आजन्म लाभार्थी बनाने वाले दिखाई देने लग गए।
आगे कुछ सोचने समझने को छोड़ मैने अपनी लेखनी को यहीं पूर्णविराम दिया।
लेखनी बंद करते ही सन 1966 में प्रदर्शित फ़िल्म दस लाख का स्मरण हुआ। इसे लिखा है गीतकार प्रेम धवनजी ने।
यह गीत वर्तमान लाभार्थियों के लिए एकदम सटीक है।
गरीबो की सुनो
वो तुम्हारी सुनेगा
तुम एक पैसा दोगे

वह दस लाख देगा
इस गाने पैरोड़ी इस तरह बन सकती है।
गरीबो गरीब रहने दो
उन्हें लाभार्थी बनाओं
वह तुम्हे ही वोट देंगे
(भलेही उसे पन्द्रहलाख ना मिले)
वह तुम्हारी ही सुनेगा।
देश के लाभार्थियों आप की जय जयकार है।
राम जी जय हो
जय जय सियाराम

सिय राम मय सब जग जानी करहु प्रणाम जोरी जुग पानी

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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