अंतरिक्ष में इंसानी आवाज 119 सालों से रोशनी की रफ्तार से सफर कर रही है. इसे रेडियो बबल कहते हैं. 1906 में शुरू हुआ यह सफर अब 119 प्रकाश वर्ष दूर तक पहुंच चुका है. इसमें करीब 75 तारा प्रणालियां शामिल हैं. हालांकि दूरी बढ़ने के साथ ये सिग्नल बेहद कमजोर होकर शोर में बदल रहे हैं.
धरती से निकलने वाली रेडियो लहरें एक सदी से ज्यादा समय से अंतरिक्ष में सफर कर रही हैं. यह किसी बड़े मिशन का हिस्सा नहीं था. इसकी शुरुआत बहुत ही साधारण तरीके से हुई थी. हमने तो बस समुद्र पार बात करने की एक नई तकनीक खोजी थी. लेकिन ये लहरें धरती की सीमाओं में नहीं रुकीं. ये लहरें रोशनी की रफ्तार से अंतरिक्ष की गहराइयों में फैलती चली गईं. वैज्ञानिक इस फैलते हुए क्षेत्र को ‘अर्थ रेडियो बबल’ कहते हैं. यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप देख सकें. यह सिर्फ हमारे शुरुआती ब्रॉडकास्ट की पहुंच का दायरा है. जैसे-जैसे समय बीत रहा है, यह बबल बड़ा होता जा रहा है. लेकिन इसके साथ ही यह पतला और धुंधला भी होता जा रहा है. इसने वैज्ञानिकों के मन में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. आखिर हमारी आवाज अंतरिक्ष में कितनी दूर तक जा चुकी है? क्या कोई और भी हमें वहां सुन रहा है?
आखिर कैसे हुई थी अंतरिक्ष में इंसानी आवाज भेजने की पहली शुरुआत?
इस कहानी की शुरुआत साल 1906 में हुई थी. रेजिनल्ड ऑब्रे फेसेंडेन ने एक बड़ा प्रयोग किया था. 24 दिसंबर को उन्होंने पहला रेडियो ब्रॉडकास्ट किया. यह आम लोगों के लिए पहला प्रसारण था. इसमें मोर्स कोड का इस्तेमाल नहीं हुआ था. लोगों ने पहली बार संगीत और आवाजें सुनीं. उन्होंने वायलिन बजाया और बाइबिल पढ़ी. समुद्र में मौजूद जहाजों ने इसे सुना. उन्हें अंदाजा नहीं था कि यह कितनी बड़ी शुरुआत है. यह ब्रॉडकास्ट आवाज खत्म होने के साथ रुका नहीं. रेडियो लहरें अंतरिक्ष की ओर बढ़ती चली गईं. इसके बाद अनगिनत सिग्नल अंतरिक्ष में भेजे गए. ये सभी लहरें मिलकर रेडियो बबल बनाने लगीं.
धरती से निकलने वाली रेडियो लहरें एक सदी से ज्यादा समय से अंतरिक्ष में सफर कर रही हैं. यह किसी बड़े मिशन का हिस्सा नहीं था. इसकी शुरुआत बहुत ही साधारण तरीके से हुई थी. हमने तो बस समुद्र पार बात करने की एक नई तकनीक खोजी थी. लेकिन ये लहरें धरती की सीमाओं में नहीं रुकीं. ये लहरें रोशनी की रफ्तार से अंतरिक्ष की गहराइयों में फैलती चली गईं. वैज्ञानिक इस फैलते हुए क्षेत्र को ‘अर्थ रेडियो बबल’ कहते हैं. यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप देख सकें. यह सिर्फ हमारे शुरुआती ब्रॉडकास्ट की पहुंच का दायरा है. जैसे-जैसे समय बीत रहा है, यह बबल बड़ा होता जा रहा है. लेकिन इसके साथ ही यह पतला और धुंधला भी होता जा रहा है. इसने वैज्ञानिकों के मन में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. आखिर हमारी आवाज अंतरिक्ष में कितनी दूर तक जा चुकी है? क्या कोई और भी हमें वहां सुन रहा है?
आखिर कैसे हुई थी अंतरिक्ष में इंसानी आवाज भेजने की पहली शुरुआत?
इस कहानी की शुरुआत साल 1906 में हुई थी. रेजिनल्ड ऑब्रे फेसेंडेन ने एक बड़ा प्रयोग किया था. 24 दिसंबर को उन्होंने पहला रेडियो ब्रॉडकास्ट किया. यह आम लोगों के लिए पहला प्रसारण था. इसमें मोर्स कोड का इस्तेमाल नहीं हुआ था. लोगों ने पहली बार संगीत और आवाजें सुनीं. उन्होंने वायलिन बजाया और बाइबिल पढ़ी. समुद्र में मौजूद जहाजों ने इसे सुना. उन्हें अंदाजा नहीं था कि यह कितनी बड़ी शुरुआत है. यह ब्रॉडकास्ट आवाज खत्म होने के साथ रुका नहीं. रेडियो लहरें अंतरिक्ष की ओर बढ़ती चली गईं. इसके बाद अनगिनत सिग्नल अंतरिक्ष में भेजे गए. ये सभी लहरें मिलकर रेडियो बबल बनाने लगीं.
रेडियो तरंगें इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन का एक रूप हैं. इनकी फ्रीक्वेंसी सबसे कम और वेवलेंथ सबसे लंबी होती है. अंतरिक्ष में ये बिना किसी माध्यम के यात्रा कर सकती हैं. यही वजह है कि हमारे सिग्नल वैक्यूम में भी आगे बढ़ रहे हैं.
क्या है धरती का यह रहस्यमयी रेडियो बबल और यह कितना बड़ा है?
रेडियो बबल वह क्षेत्र है जहां हमारी लहरें पहुंची हैं. रेडियो लहरें रोशनी की गति से यात्रा करती हैं. हमने 119 साल पहले सिग्नल भेजना शुरू किया था. इसलिए इस बबल का रेडियस 119 प्रकाश वर्ष है. इसका मतलब यह नहीं कि सिग्नल बहुत साफ हैं. यह बबल एक पतली परत की तरह है. जैसे-जैसे लहरें फैलती हैं, वे कमजोर हो जाती हैं. वे अंतरिक्ष के बैकग्राउंड शोर में मिल जाती हैं. इस बबल का कोई ठोस किनारा नहीं है. यह बस दूरी और समय का एक बढ़ता हुआ दायरा है. यह ऊर्जा लगातार कम होती जा रही है.

119 साल और 119 प्रकाश वर्ष का सफर. (AI की मदद से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर)
विशाल मिल्की वे गैलेक्सी के सामने कितना छोटा है हमारा अस्तित्व?
हमारी गैलेक्सी मिल्की वे बहुत ही विशाल है. यह करीब एक लाख प्रकाश वर्ष में फैली हुई है. इसके मुकाबले हमारा रेडियो बबल बहुत छोटा है. हमारे सिग्नलों ने अभी पड़ोस का सफर ही किया है. अगर पहला ब्रॉडकास्ट आज भी सही सलामत हो. तो भी उसे गैलेक्सी पार करने में हजारों साल लगेंगे. यह पैमाना हमें ब्रह्मांड की विशालता समझाता है. अंतरिक्ष अक्सर हमें इसीलिए शांत लगता है. यहां दूरियां हमारी सोच से बहुत ज्यादा बड़ी हैं. हम अभी सिर्फ अपने घर के पास ही पहुंच पाए हैं.
क्या हमारी आवाज 75 पड़ोसी तारा प्रणालियों तक सच में पहुंच गई है?
कुछ पड़ोसी तारे अब हमारे रेडियो बबल के अंदर हैं. प्रॉक्सिमा सेंटॉरी हमसे 4 प्रकाश वर्ष दूर है. हमारे शुरुआती सिग्नल इसे बहुत पहले पार कर चुके हैं. कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च की है. उन्होंने 75 ऐसी तारा प्रणालियों की पहचान की है. ये सभी प्रणालियां हमारे रेडियो बबल के दायरे में हैं. ये सिस्टम न सिर्फ हमारे सिग्नल ले सकते हैं. बल्कि वे धरती को सूरज के सामने से गुजरते देख सकते हैं. सैद्धांतिक रूप से उन्हें हमारे बारे में पता हो सकता है. वे हमें एक तकनीकी सभ्यता के रूप में देख सकते हैं.
क्या वाकई कोई एलियन हमारी रेडियो तरंगों को सुन सकता है?
अगर हम व्यवहारिक तौर पर देखें तो जवाब ‘ना’ है. रेडियो लहरें फैलते ही अपनी ताकत खो देती हैं. दूर के तारों तक पहुंचते ही ये शोर बन जाती हैं. वहां मौजूद किसी भी सभ्यता को बहुत मुश्किल होगी. वे इन्हें प्राकृतिक कॉस्मिक शोर से अलग नहीं कर पाएंगे. एडवांस तकनीक भी इस आवाज को पहचान नहीं पाएगी. ये सिग्नल बस तकनीक की एक हल्की सी झलक देंगे. इनमें संगीत या शब्दों का कोई मतलब नहीं रह जाएगा. हमारे संदेश वहां जाकर अपना अर्थ खो देते हैं.
क्या भविष्य में हम ब्रह्मांड के लिए पूरी तरह खामोश हो जाएंगे?
हैरानी की बात यह है कि ऐसा हो सकता है. पुराने समय के ब्रॉडकास्ट बहुत ऊर्जा छोड़ते थे. वे अंतरिक्ष में बहुत ज्यादा लीक होते थे. अब हमारी आधुनिक संचार तकनीक बदल गई है. हम अब फाइबर ऑप्टिक्स और केबल का इस्तेमाल करते हैं. हमारे डिजिटल सिस्टम सिग्नल को धरती के पास रखते हैं. इसका मतलब है कि नया रेडियो बबल बहुत पतला होगा. आने वाले समय में धरती से कम सिग्नल बाहर जाएंगे. हम बाकी गैलेक्सी के लिए और शांत होते जाएंगे. हमारी चमक समय के साथ धुंधली पड़ रही है.





