सरकारी स्कूल बंदी लोकतंत्र पर मंडराता खतरा,हमें राशन नहीं, स्कूल चाहिए : हमें मधुशाला नहीं, स्कूल चाहिए
–तेजपाल सिंह ‘तेज’
लोकतंत्र की जड़ें और शिक्षा का प्रश्न : भारत का संविधान शिक्षा को एक मौलिक अधिकार मानता है, और डॉ. भीमराव अंबेडकर के शब्दों में — “शिक्षा वह शस्त्र है जिससे समाज के वंचित तबके अपनी दासता की जंजीरें तोड़ सकते हैं”। किन्तु वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जो हो रहा है, वह न केवल इस विचारधारा के विरुद्ध है, बल्कि लोकतंत्र की नींव पर सीधा प्रहार है।
भारत को यदि एक संवेदनशील, न्यायसंगत और समतामूलक राष्ट्र बनाना है, तो उसकी नींव शिक्षा से ही रखी जा सकती है। यह शिक्षा केवल पुस्तक और कलम का सौदा नहीं, बल्कि समाज की चेतना, स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की कुंजी है। परंतु विडंबना यह है कि जिस देश ने शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित किया, उसी देश में आज सरकारी प्राथमिक विद्यालय — विशेषतः दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों के क्षेत्रों में — बड़ी तेजी से बंद किए जा रहे हैं।

यह कोई प्रशासनिक संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित सांस्थानिक रणनीति है, जो गरीबों को फिर से उसी सामाजिक बंधन में बाँध देना चाहती है जिससे वे पीढ़ियों की लड़ाई के बाद छूटे थे। भारत में जब कोई दलित बच्चा पहली बार स्कूल जाता है, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत यात्रा नहीं होती — यह एक ऐतिहासिक आंदोलन की निरंतरता होती है। ऐसे में स्कूलों को बंद करना, उस आंदोलन को बीच रास्ते में कुचल देना है।
आज जब गांवों की गरीब जनता कहती है — “हमें राशन नहीं चाहिए, हमें स्कूल चाहिए” — तो यह केवल भूख के विरुद्ध एक तात्कालिक क्रंदन नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक वैचारिक घोषणा है कि उन्हें भी संविधान में बराबरी चाहिए, उन्हें भी इंसान बनने का हक चाहिए। यह नारा, भारत के लोकतंत्र की असली कसौटी बन चुका है। आज जब भारत विश्वगुरु बनने के स्वप्न देख रहा है, उसी भारत में सरकारी प्राथमिक स्कूल, विशेषकर दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यक क्षेत्रों में, चुपचाप बंद किए जा रहे हैं। यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक जो गंभीर राजनीतिक षड्यंत्र है — वो है समाज को पुनः अशिक्षा, भुखमरी और दमन के अंधकार में ढकेलने का।
1. स्कूलों की बंदी: क्या सिर्फ़ कम नामांकन का सवाल है?
सरकार अक्सर स्कूल बंदी के पीछे कम छात्रों की संख्या, संसाधनों की कमी, या समेकन (merging) का बहाना देती है। परंतु यदि वास्तविकता देखें तो इन स्कूलों के बंद होने से सबसे अधिक नुकसान उन समुदायों को हो रहा है जो पहले से ही हाशिये पर हैं। उदाहरणार्थ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और बंगाल जैसे राज्यों में हजारों स्कूल या तो बंद किए जा चुके हैं या बंद होने की कगार पर हैं।
2022 में उत्तर प्रदेश में ही 18,000 से अधिक सरकारी स्कूलों में “0” से 30 के बीच छात्र रह गए — सरकार ने कई जिलों में ऐसे स्कूलों को बंद कर दिया। क्या यह एक सामान्य नीति है? नहीं…यह एक सुनियोजित सामाजिक–सांस्कृतिक हमला है — शिक्षा को केवल “वेलफेयर” समझना और गरीबों को इससे वंचित करना।
2. सबसे पहले कौन प्रभावित हुआ?
जिन्हें सबसे पहले शिक्षा मिली, वे सबसे पहले आगे बढ़े। और जिन्हें शिक्षा से वंचित रखा गया, वे आज भी सबसे पीछे हैं।
इन स्कूलों के बंद होने का सबसे बड़ा प्रभाव पड़ा है —
· दलित समुदायों पर
· आदिवासी बच्चों पर
· मुस्लिम बस्तियों में रहने वाली लड़कियों पर
· ग्रामीण, विशेषकर महिला शिक्षकों पर
इन स्कूलों ने दशकों तक “पहली पीढ़ी के शिक्षार्थियों” को शिक्षित किया। इन्हीं स्कूलों से निकलकर गांवों के दलित लड़के-लड़कियां नौकरी तक पहुंचे, शिक्षक बने, और समाज में अपनी जगह बनाई। अब उन्हीं स्कूलों को बंद कर देना, एक पीढ़ी के उदय को रोक देना है।
3. “हमें राशन नहीं चाहिए, हमें स्कूल चाहिए”: यह नारा क्यों उठा?
उत्तर प्रदेश के ललितपुर, झांसी, सोनभद्र, और मिर्ज़ापुर जैसे जिलों में जब सरकारी स्कूल बंद किए गए, तब वहां के लोगों ने रोषपूर्ण स्वर में कहा — “हमें राशन नहीं चाहिए, हमें स्कूल चाहिए।” यह कथन केवल क्रोध या भावुकता नहीं, बल्कि एक चेतन राजनीतिक-सामाजिक बयान है। यह इस बात की घोषणा है कि समाज अब ‘भीख नहीं अधिकार’ मांग रहा है। सरकार यदि 5 किलो राशन देकर स्कूल छीन लेगी, तो आने वाली पीढ़ियाँ फिर से उसी गरीबी के चक्र में लौट जाएंगी। यह नारा बताता है कि जनता अब समझ चुकी है कि —
· राशन पेट भरता है, पर शिक्षा भविष्य बनाती है।
· राशन से जिंदा रह सकते हैं, पर स्कूल से ज़िन्दगी बदल सकती है।
4. क्या यह भारत को फिर से 1930 के भारत में बदलने की साजिश है?
ब्रिटिश काल में भी शिक्षा को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया था। अंग्रेज़ों ने जानबूझकर ग्रामीण भारत और निम्न जातियों की शिक्षा को हतोत्साहित किया। क्यों? क्योंकि शिक्षित जनता को नियंत्रित करना कठिन होता है। आज भारत की सत्ता व्यवस्था जिस दिशा में बढ़ रही है, वह भी उसी उपनिवेशवादी सोच का पुनरावृत्तिकरण है —
· सरकारी स्कूल बंद कर दो
· शिक्षा को निजी हाथों में सौंप दो
· शिक्षा को इतना महंगा बना दो कि गरीब बच्चा दाखिला लेने की हिम्मत न करे
· गरीब और वंचित वर्ग फिर से खेत, खदान और फैक्ट्रियों तक सीमित हो जाए
इस प्रक्रिया का अंतिम लक्ष्य है — “Elected Autocracy”, यानी लोकतंत्र की छाया में तानाशाही।
5. निजी स्कूलों के हित में सरकारी स्कूलों की बलि:
आज शिक्षा एक उद्योग बन चुकी है। देश के अनेक सांसद, विधायक, और मंत्री खुद के या अपने परिवार के निजी स्कूल/कॉलेज के मालिक हैं। यदि सरकारी स्कूल चलते रहेंगे तो इनका धंधा कैसे चलेगा? इसीलिए —
· सरकारी स्कूलों की छवि ख़राब की जाती है;
· वहाँ शिक्षकों की नियुक्ति नहीं होती;
· बुनियादी ढांचे को सुधारा नहीं जाता;
· और फिर कहा जाता है — “ये स्कूल तो बेकार हैं, बंद कर दो”।
यह सब एक धोखा है। सरकारें अपने ही स्कूलों को जानबूझकर असफल बनाकर, एक “बाजार” तैयार कर रही हैं। एक ऐसा बाजार जिसमें शिक्षा सेवा नहीं, उत्पाद है।
6. क्या राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 एक रास्ता या बहाना है?
NEP 2020 को शिक्षा की क्रांति के रूप में प्रस्तुत किया गया, परंतु इसकी असलियत देखें तो —
· यह बहुभाषी और बहुस्तरीय शिक्षा प्रणाली की बात करके एकरूपता समाप्त कर देती है
· इसमें सरकारी स्कूलों के लिए कोई मजबूत पुनरुद्धार योजना नहीं है
· यह शिक्षा को निजीकरण और केन्द्रीयकरण की दिशा में ले जाती है
इसके चलते स्थानीय स्तर पर कार्यरत छोटे सरकारी स्कूल प्रासंगिकता खोने लगे हैं, और सरकार उन्हें बंद कर अपने हाथ खींच रही है।
7. डॉ. अंबेडकर और दलित चेतना की रोशनी में सवाल:
डॉ. अंबेडकर ने 1930 के दशक में ही चेताया था — “अगर हमें समानता चाहिए, तो हमें शिक्षा को मुफ्त और सार्वभौमिक बनाना होगा।” आज जब दलित-बस्ती के बच्चे स्कूल जाना शुरू कर ही रहे थे, उन्हें बीच रास्ते में स्कूल से बाहर निकाल देना, एक तरह से अंबेडकर के आंदोलन के प्राणों पर प्रहार है। वास्तव में यह सवाल केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व का है। जो लोग पहले कभी स्कूल नहीं गए, उनके बच्चों को स्कूल से बाहर करना मनुस्मृति के युग की वापसी है।
8. शिक्षा बंद, मदरसा बंद, पाठशालाएं बंद – फिर खुले क्या?
जब सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं, तो उनके स्थान पर क्या खुल रहे हैं?
· संघ और धार्मिक संगठनों के विद्यालय;
· गोरक्षा केंद्र और कथित वेद-प्रशिक्षण संस्थान;
· मंदिर, आश्रम, और पूजा स्थल खुलें।
इनमें न तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, न आधुनिक शिक्षा। फिर भी उन्हें प्रोत्साहन मिल रहा है, जबकि सरकारी स्कूल जो संविधान आधारित शिक्षा दे रहे थे, वे बंद किए जा रहे हैं। यह एक धार्मिक राष्ट्र के निर्माण का औजार बन चुका है। शिक्षा की जगह भक्ति और अंधविश्वास भरना, जनता को दिमाग से गुलाम बनाने की परियोजना है।
9. विकल्प क्या है? समाधान की राह:
इस संकट का समाधान महज प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक पुनर्गठन से जुड़ा है। कुछ आवश्यक कदम —
· सरकारी स्कूलों के लिए विशेष बजट आवंटन
· स्थानीय समुदाय की भागीदारी से स्कूलों का प्रबंधन
· प्रत्येक दलित/आदिवासी बस्ती में प्राथमिक विद्यालय अनिवार्य किया जाए
· निजी स्कूलों पर अंकुश और सरकारी स्कूलों को प्राथमिकता
· शिक्षा को जन आंदोलन बनाना — ‘स्कूल बचाओ’ जैसे राष्ट्रव्यापी अभियान
10. निष्कर्ष: स्कूलों की हत्या, लोकतंत्र की हत्या है:
जब हम सरकारी स्कूलों को बंद करते हैं, हम केवल एक इमारत नहीं गिराते —
हम बच्चियों से उनका सपना छीन लेते हैं,
कि ग्रामीण शिक्षकों की रोज़ी मार देते हैं,
लोकतंत्र के भविष्य को गर्त में धकेल देते हैं।
और जब गांव का बच्चा कहता है —“हमें राशन नहीं चाहिए, हमें स्कूल चाहिए।” तो वह केवल अपना हक ही नहीं मांग रहा है, बल्कि वह भारत के भविष्य की पुकार भी कर रहा है। यदि हम इस पुकार को अनसुना करते हैं, तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। क्योंकि जो समाज अपने सबसे कमजोर वर्ग के बच्चों की शिक्षा छीनता है, वह कभी भी स्वतंत्र, समता-युक्त और न्यायप्रिय राष्ट्र नहीं बन सकता। “स्कूल बचाओ, संविधान बचाओ” — यही आज का सबसे बड़ा जन–आंदोलन होना चाहिए।
यदि आज हम चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी — “जब हमारे स्कूल छीने जा रहे थे, तब आप कहाँ थे?” इसलिए आज आवश्यकता है एक व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन की — “शिक्षा बचाओ, संविधान बचाओ”, जो हर गांव, हर गली, हर बस्ती में यह उद्घोष करें — “हमें भी स्कूल चाहिए, ताकि हमें भी जीवन में आगे बढ़ने का अधिकार मिले।” यही लोकतंत्र का सच्चा मतलब है। यही भारत के भविष्य की अंतिम उम्मीद। विश्लेषण, तर्क और सुझाव —
· हमें राशन नहीं चाहिए, हमें स्कूल चाहिए
· भारत के गरीब और वंचित समाज से सरकारी शिक्षा के छीने जाने का दस्तावेज़
लेख का संक्षिप्त परिचय:
भारत में सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था, विशेषकर सरकारी प्राथमिक विद्यालय, केवल शैक्षणिक संस्थान नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा औजार रहे हैं। परंतु आज जिन इलाकों में शिक्षा सबसे ज़रूरी है — यानी दलित, आदिवासी, मुस्लिम और पिछड़े वर्गों के गांव और बस्तियाँ — वहीं सबसे अधिक सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं। सरकारें कह रही हैं: छात्र कम हैं, शिक्षक अनुपस्थित हैं, संसाधन नहीं हैं। परंतु जनता कह रही है — “हमें राशन नहीं चाहिए, हमें स्कूल चाहिए।” यह लेख बताता है कि कैसे यह माँग सिर्फ़ शिक्षा की नहीं, लोकतंत्र और बराबरी की ज़िंदगी की माँग बन चुकी है।
1. स्कूल से वंचित भारत का सपना : शिक्षा वह नींव है जिस पर किसी लोकतंत्र की दीवार टिकती है। भारत जैसे विशाल, विविध और विषमताग्रस्त देश में, सरकारी स्कूल न केवल सस्ती शिक्षा का स्रोत रहे, बल्कि उन्होंने पीढ़ियों तक सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाया। परंतु आज के भारत में ये स्कूल निशाने पर हैं। “शिक्षा वह शस्त्र है जिससे आप अपनी दासता को तोड़ सकते हैं।” — डॉ. भीमराव अंबेडकर
2. क्या सरकारी स्कूल सचमुच विफल हैं? सरकारें यह तर्क देती हैं कि सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या गिर गई है, परिणाम अच्छे नहीं हैं, और वे ‘अप्रासंगिक’ हो चुके हैं। पर सच्चाई यह है कि:
· इन स्कूलों में वर्षों से शिक्षकों की नियुक्तियाँ नहीं हुईं।
· बुनियादी सुविधाएँ नहीं दी गईं (टॉयलेट, पीने का पानी, बिजली)।
· प्रचार के माध्यम से सरकारी स्कूलों की छवि धूमिल की गई ताकि लोग निजी स्कूलों की ओर मुड़ें।
यह ‘फेल कराने की नीति’ थी — और अब उसके बाद ‘बंद करने की नीति’ चलाई जा रही है।
3. राज्यवार स्थिति: कहाँ कितने स्कूल बंद हुए?
| राज्य | बंद स्कूलों की संख्या 2020-2024 | विशेष रूप से प्रभावित क्षेत्र |
| उत्तर प्रदेश | 11,000+ | बुंदेलखंड, पूर्वांचल, दलित बस्तियाँ |
| मध्य प्रदेश | 7,000+ | आदिवासी क्षेत्र, SC/ST गांव |
| राजस्थान | 6,000+ | पिछड़े और रेगिस्तानी जिले |
| बिहार | 4,400+ | मुस्लिम बहुल क्षेत्र, कोसी ज़ोन |
| झारखंड | 3,200+ | आदिवासी गांव, पहाड़ी क्षेत्र |
| ओडिशा | 2,800+ | अनुसूचित / जनजाति क्षेत्र |
| छत्तीसगढ़ | 2,2500+ | बस्तर, दंतेवाड़ा, नक्सल प्रभावित |
नोट: GPT – ये आँकड़े विभिन्न सामाजिक संगठनों, शिक्षा रिपोर्टों और मीडिया स्रोतों पर आधारित हैं।
4. किन्हें सबसे ज़्यादा नुकसान?
दलित और पिछड़े समुदाय:
· ये स्कूल ही उनके बच्चों की पहली पीढ़ी के शिक्षालय थे।
· अब निजी स्कूल की फीस उनकी पहुँच से बाहर है।
आदिवासी समाज:
· जो स्कूल जंगल और पहाड़ी इलाकों में काम कर रहे थे, वही बंद हुए।
· परिणामस्वरूप बच्चे अब या तो घर पर रह जाते हैं या मज़दूरी करने लगते हैं।
ग्रामीण मुस्लिम बस्तियाँ:
· यहाँ सरकारी स्कूलों के बंद होने से लड़कियाँ विशेष रूप से शिक्षा से बाहर हुई हैं।
· मदरसे बंद हो रहे हैं, और नए स्कूल खुल नहीं रहे।
5. शिक्षा बनाम राशन: जनता का बयान:
जब लोगों से पूछा गया कि क्या आपको स्कूल की बजाय राशन चाहिए, उनका उत्तर था –“हम भूखे रह लेंगे, पर हमारे बच्चे अनपढ़ न रहें।” उत्तर प्रदेश के ललितपुर, झांसी और मिर्ज़ापुर के गांवों में यह नारा आम हो गया है –“हमें राशन नहीं चाहिए, हमें स्कूल चाहिए।” यह केवल एक आर्थिक माँग नहीं — यह लोकतांत्रिक चेतना का संकेत है।
6. निजीकरण, पूंजी और नव–मनुवाद:
· सरकारी स्कूलों के बंद होने के पीछे शिक्षा के बाजारीकरण का हाथ है।
· देश के 45% सांसद और विधायक निजी स्कूलों या कॉलेजों के मालिक हैं।
· जैसे ही सरकारी स्कूल कमजोर होते हैं, उनके संस्थान फलते-फूलते हैं।
इसी बहाने अब गुरुकुल, वेद विद्यालय, संघ से जुड़े शिक्षा केंद्रों को बढ़ावा मिल रहा है — जो मनुवादी मूल्यों को पुनर्स्थापित कर रहे हैं। यह शिक्षा की वर्गीय और सांस्कृतिक पुनरसंरचना है — जिसमें ब्राह्मणवादी विचारधारा फिर से मुख्यधारा में लाई जा रही है।
7. अंबेडकर, संविधान और शिक्षा:
“अगर हमें सच्चा लोकतंत्र चाहिए तो हमें शिक्षा, संगठन और संघर्ष की त्रयी (“त्रिविध ज्ञान”) अपनानी होगी।” — डॉ. बी. आर. अंबेडकर
डॉ. अंबेडकर का मानना था कि शिक्षा ही समाज के वंचित वर्गों को मुक्त कर सकती है। परंतु आज उन्हीं वर्गों के बच्चों से शिक्षा छीनना, संविधान की आत्मा के विरुद्ध है। संविधान की धारा 21-A के अंतर्गत 6-14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है। क्या स्कूल बंद करके यह अधिकार छीनना असंवैधानिक नहीं है?
8. समाधान और सुझाव:
हर दलित, आदिवासी, मुस्लिम बस्ती में कम से कम एक प्राथमिक विद्यालय अनिवार्य किया जाए।
· शिक्षकों की नियमित नियुक्ति और प्रशिक्षण की व्यवस्था हो।
· बजट का कम से कम 6% हिस्सा शिक्षा पर खर्च हो — जैसा कि कई आयोगों ने सिफारिश की है।
· निजी स्कूलों पर शुल्क नियंत्रण कानून लागू हो।
· शिक्षा में सामाजिक सहभागिता बढ़े — पंचायत, महिला समूह, एससी/एसटी संगठनों की भागीदारी से।
“स्कूल बचाओ – संविधान बचाओ” जैसे जनांदोलनों की आवश्यकता।
9. लोकतंत्र की परीक्षा:
भारत का लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलेगा — उसे जागरूक नागरिकों, शिक्षित समाज और समान अवसरों की आवश्यकता है।
10. ऐतिहासिक दृष्टिकोण: कौन पढ़ा, कौन नहीं पढ़ पाया?
· ब्राह्मणों और उच्च जातियों को वेद, संस्कृत और शिक्षा प्राप्त करने का जन्मसिद्ध अधिकार था।
· शूद्रों, अति-शूद्रों, स्त्रियों और दलितों को शिक्षा से वंचित रखा गया। मनुस्मृति में स्पष्ट निर्देश था कि अगर कोई शूद्र वेद सुनेगा, तो उसके कानों में पिघला सीसा डाल देना चाहिए।
इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखें, तो आज सरकारी स्कूलों का बंद होना मनुवाद के आधुनिक संस्करण की पुनर्प्राप्ति है।
11. भारत की शिक्षा व्यवस्था में बजट में गिरावट (2014 के बाद):
· 2013–14 में शिक्षा पर कुल खर्च GDP का 4.14% था।
· 2021–22 तक यह गिरकर लगभग 2.8% रह गया।
जबकि कठारि आयोग (1966) और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) दोनों ही 6% खर्च की सिफारिश करते हैं। यह गिरावट राजनीतिक प्राथमिकताओं की पोल खोलती है — जहाँ शिक्षा कम और धार्मिक आयोजन ज़्यादा फंड पा रहे हैं।
12. नव–साम्राज्यवाद और डिजिटल विभाजन: ‘ऑनलाइन शिक्षा‘ के छलावे:
· कोविड के दौरान सरकार ने कहा कि “ऑनलाइन शिक्षा से कोई नुकसान नहीं होगा”।
परंतु ग्रामीण भारत में 75% से अधिक बच्चों के पास स्मार्टफोन, इंटरनेट या लैपटॉप नहीं थे। स्कूल बंदी और डिजिटल शिक्षा का जोर — दोनों मिलकर एक नई तरह की ‘शैक्षिक छूत-अछूत व्यवस्था’ बना रहे हैं।
परिणामस्वरूप: गरीब बच्चे स्कूल से बाहर हो गए, जबकि निजी स्कूलों के बच्चे आगे बढ़ते रहे।
13. शिक्षकों की कमी: केवल स्कूल नहीं, शिक्षक भी गायब हैं
राज्य शिक्षक की कमी (%)
बिहार 39%
उत्तर प्रदेश 31%
झारखंड 35%
मध्य प्रदेश 28%
राजस्थान 27%
इन राज्यों में सबसे अधिक दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदाय रहते हैं। यानी जहाँ शिक्षा की ज़रूरत सबसे ज़्यादा है, वहाँ शिक्षक सबसे कम हैं।
14. महिला शिक्षा पर प्रभाव:
जब नज़दीकी स्कूल बंद होते हैं, तो लड़कियाँ पढ़ाई छोड़ देती हैं। विशेषकर मुस्लिम, दलित और आदिवासी लड़कियाँ जो दूर नहीं जा सकतीं — उनकी “Dropout Rate” 50% तक पहुँच चुकी है। यह केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण, लैंगिक समानता और सुरक्षा का भी गंभीर प्रश्न है।
15. सामाजिक आंदोलनों से जुड़ी पहलें (प्रासंगिक उदाहरण):
“Right to Education Forum”, ASER और India Literacy Project जैसे संगठन लगातार कह रहे हैं कि सरकारी स्कूलों की बंदी संवैधानिक मूल्यों का हनन है। राजस्थान में बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने “स्कूल बचाओ” अभियान चलाया और 200 बंद स्कूलों को दोबारा खुलवाया। झारखंड के ग्रामीण इलाकों में आदिवासी महिलाओं ने प्रदर्शन कर कहा –“हमारे पास ज़मीन नहीं, घर नहीं, रोज़गार नहीं — अब क्या हमारे बच्चों को शिक्षा का हक भी नहीं?”
16. सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की टिप्पणियाँ:
· सुप्रीम कोर्ट (2012) ने स्पष्ट कहा था — “शिक्षा मौलिक अधिकार है, और राज्य की यह ज़िम्मेदारी है कि वह इसे सुनिश्चित करे, न कि इससे भागे।”
· इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2015 में कहा –“सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर गिराना, गरीबों को समान अवसरों से वंचित करना है।”
यहाँ सवाल उठता है —क्या सरकारें इन टिप्पणियों का सम्मान कर रही हैं?
17. संघ और धार्मिक शिक्षा संस्थानों का प्रसार:
RSS और अन्य धार्मिक संगठनों द्वारा चलाए जा रहे ‘सरस्वती शिशु मंदिर’, ‘वेद पाठीशालाएँ’, ‘गौशाला-विद्यालय’ को सरकारी सहायता दी जा रही है, जबकि सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं। इनमें जातिगत पदक्रम, वर्ण आधारित गौरव, और धार्मिक राष्ट्रवाद पढ़ाया जा रहा है — जो संविधान विरोधी है। जब संविधानिक शिक्षा हटाई जाती है और धार्मिक शिक्षा बढ़ाई जाती है, तो एक लोकतंत्र, धीरे–धीरे धर्मतंत्र में बदलता है।
18. अंततः:
लोकतंत्र की परीक्षा यह नहीं कि हम क्या पढ़ाते हैं, बल्कि किसे पढ़ने देते हैं —
“हर वह बच्चा जो स्कूल जाने से वंचित हो, एक वोटर नहीं, एक बंधुआ मज़दूर बनता है।”
इसलिए सरकारी स्कूलों की बंदी का प्रश्न सिर्फ़ शिक्षा का नहीं —यह प्रश्न है —
· प्रतिनिधित्व का,
· लोकतांत्रिक अवसरों का, और
· संविधान की आत्मा की रक्षा का।
जब स्कूल बंद होते हैं तो कल के डॉक्टर नहीं बनते, शिक्षक गायब हो जाते हैं और समाज फिर से भेदभाव और दासता की ओर लौट जाता है। “हमें राशन नहीं चाहिए, हमें स्कूल चाहिए” — यह केवल एक नारा नहीं, यह भारत की अंतेर्मन की पुकार है। इसे सुनना और उस पर कार्य करना — यही हमारी लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी है।
आज भारत दो रास्तों के द्वार पर खड़ा है — एक ओर शिक्षा और चेतना का मार्ग है, जो समता, स्वतंत्रता और न्याय की ओर ले जाता है; दूसरी ओर अंधकार, अशिक्षा और भक्ति में लिपटी गुलामी का मार्ग है, जो सत्ता के अधिनायकवादी रूप को मजबूत करता है। दुर्भाग्यवश, सरकारें आज उस दूसरे मार्ग को प्रशस्त कर रही हैं — सरकारी स्कूलों को बंद कर, शिक्षा को पूंजीपतियों और धार्मिक संस्थाओं के हवाले कर।
यह समय मात्र नीतियों की समीक्षा का नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा की रक्षा का है। एक भी सरकारी स्कूल बंद होना केवल एक इमारत का गिरना नहीं है — वह दलित सपनों का चूर होना है, एक लड़की का भविष्य बुझ जाना है, और सबसे बढ़कर लोकतंत्र की सांसों का रुक जाना है।
तेजपाल सिंह तेज की गजल, कविता, और विचार की तीन दर्जन से ज्यादा किताबें प्रकाशित चुकी हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल- में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), ग्यारह प्रतिक्रियात्मक निबन्ध संग्रह और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं। और भी कई सामाजिक/नागरिक सम्मां। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन में रत हैं।





