शशिकांत गुप्ते
मुझे भी पुस्तक लिखना है। पुस्तक का विषय है खोज?
खोज भी ऐसी जो अविवादित हो।
मुझे इस मुहावरे का अनुसरण नहीं करना है,कि, बदनाम हुए तो क्या हुआ नाम तो हुआ।
मेरे पास कोई डस्टर(Duster) भी नहीं है।जिससे मैं अपनी लकीर बड़ी करने के लिए दूसरों की लकीर पोछ दूं।
जेहन में किसी दूसरे व्यक्ति,दूसरें धर्म,विरोधी विचारों के प्रति यदि कोई शंका भी पैदा होती है,तो मुझे क्रांतिकारी संत कबीर साहब का यह दोहा याद आ जाता है।
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।
इसी तारतम्य मै गांधीवादी विचारक,सर्वोदय आंदोलन के प्रेणता आचार्य विनोबा भावेजी का स्मरण करता हूँ। विनोबाजी के स्लोगन बहुत सरल होतें थे।
विनोबाजी ने कहा है।
हर गेंहू में कंकर होतें है अपन क्या करतें हैं, कंकर बिन कर फैंक देतें हैं।इस कथन का तात्पर्य है कि,कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है।
संत कबीरसाहब सभी लोगों को साधु संबोधित करतें थे।
कबीरसाहब का दोहा है।
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।
उक्त उपदेशक विचारों पर गम्भीरता से चिंतन मनन करने पर ज्ञात होता है कि, मेरी खोज अधूरी तो नहीं रहेगी?कारण मुझे समझदार इंसान को खोजना है?
मुझे मेरी खोज के अभियान के दौरान बहुत से लोग इस कहावत को चरितार्थ करते हुए दिखाई देतें हैं।
थोथा चना बाजे घणा
आधुनिक पीढ़ी को समझने के लिए
Empty vessels make the most noise
यह सब जानते हुए भी मैने खोज जारी रखी।
खोज का विषय बार बार जेहन में उपस्थित हो रहा है। समझदार को ढूंढना?
एक दार्शनिक यक्ति ने मेरी जिज्ञासा को सुनकर सलाह दी कि,इस में खोज व्यर्थ समय खराब होगा।
तुम्हे बहुत से विचारक मिल जाएंगे,विद्वान मिल जाएंगे, उच्च शिक्षा ग्रहण किए हुए मिल जाएंगे, विभिन्न विषयों के डॉक्टर मिल जाएंगे।यहाँ तक की ईमानदार भी बहुत मिल जाएंगे।
लेकिन समझदार मिलना नामुमकिन है। समझदार इंसान दुर्लभ है।
दार्शनिक व्यक्ति ने प्रख्यात व्यंग्यकार स्व. हरिशंकर परसाई के व्यंग्य का छोटा सा भाग सुनाकर अपना वक्तव्य समाप्त किया।
एक अस्पताल के जनरल वार्ड में लगभग दस से बारह मरीज भर्ती थे। एक मरीज की स्थिति गम्भीर होतें देख वार्ड में कार्यरत नर्स जोर से चिल्लाई डॉक्टर ,यह सुन उस वार्ड में भर्ती आठ दस मरीजे बोल उठे बोलो क्या कहना है।ये सभी हिंदी के डॉक्टर थे।( हिंदी में पीएचडी)
दार्शनिक व्यक्ति के इस कथन को मै बार बार दोहराता हूँ।ईमानदार भी बहुत मिल जाएंगे, लेकिन समझदार मिलना मुमकिन नहीं है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





