डॉ. विकास मानव
(मनोचिकित्सक, निदेशक : चेतना विकास मिशन)
_प्रायः लोग प्रश्न करते हैं कि आध्यात्मिक जीवन अपनाकर स्वयं की खोज-वृत्ति से क्या लाभ होता है? सिवाय समय की बरबादी के और नाकारापन की जिंदगी व्यतीत करने के और मिलता ही क्या है ?_
इस प्रश्न के उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि चाहे कुछ दिखाई देने वाली वस्तु प्राप्त हो या न हो, ऐसा कुछ अवश्य प्राप्त हो जाता है या हो सकता है जिसे केवल वही जान-समझ सकता है जिसने अध्यात्म को अपना जीवन बना लिया है।
_कुछ मिलता नहीं, हाँ, ऐसा पल कभी भी आ जाता है कि जो भीतर होता है, वह प्रकट हो जाता है। जो व्यक्ति के पास है और जिससे वह अनभिज्ञ है, वह प्रकट हो जाता है। व्यक्ति जो होता है, उसके प्रति सोया रहता है, वह जाग जाता है। सच बात तो यह है कि जो अज्ञान, जो नासमझी होती है, वह खो जाती है।_
अब वह कह सकता है कि वह तो उसके पास था ही पहले से, लेकिन उससे अपरिचित था।
जब व्यक्ति योग-तांत्रिक साधना में प्रवेश करता है तो उसके सामने दो महत्वपूर्ण प्रश्न होते हैं। पहला--"हम क्या-क्या हैं और हम क्या-क्या नहीं हैं ?" व्यक्ति को इन दोनों जीवन से गुजरना पड़ता है।
_योग-तांत्रिक साधना के दो भाग हैं--एक वह भाग है जिसमें जो असार है, उसे छोड़ना पड़ता है और तोड़ना पड़ता है उससे तादात्म्य और दूसरा भाग वह है जिसमें सार है, उसके साथ तादात्म्य स्थापित करना पड़ता है। पहला भाग है-- निषेध और दूसरा भाग है--विधेय।_
असत्य को असत्य की तरह ही जानना पड़ता है साधक को। तभी वह सत्य को सत्य की तरह जान पाता है। प्रकाश को जानने के लिए पहले अंधकार को जानना पड़ेगा, तभी वह जान पायेगा प्रकाश के मूल्य को। जीवन को पहचानने के लिए मृत्यु को आवश्यक है जानना।
_तभी जीवन के मूल्य को समझ सकेंगे हम। क्योंकि जो भी हमारे विचार में आता है, उसे आने देने के लिए उसके विपरीत के प्रति भी होनी चाहिए हमारी दृष्टि। जिन वस्तुओं को विपरीत कहते हैं, वे विपरीत कहने से हो जाती हैं--सहयोगी। उनसे स्थापित हो जाती है --आतंरिक मैत्री।_
फिर तो मृत्यु भी दुश्मन नहीं जीवन की, जीवन की मित्र है--मृत्यु। इसलिए कहा जा सकता है कि जीवन कभी भी नहीं उपलब्ध हो सकता है मृत्यु के बिना। यदि हम विचार करें तो यह समझ में आएगा कि जिसे हम शत्रु समझते हैं, वह भी हमारी मूर्खता ही है, नासमझी है।आशय यह है कि इस संसार में जो भी विपरीत है, वह अन्त में सहयोगी सिद्ध होता है। जैसे राम बिना रावण नहीं, वैसे ही रावण बिना राम नहीं क्योंकि जो रावण है, वह राम नहीं है और जो राम है वह रावण नहीं है।
*अल्प~ विराम :*इस पोस्ट को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है क्योंकि इसमें लिखी हुई बातें विचित्र प्रतीत होंगी. पर जब हम उस पर गहराई से सोचने पर मजबूर होंगे तो यथार्थ की झलक मिलने लग जायेगी।
जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति के जीवन के संस्कार-परमाणु हमारे सूक्ष्म शरीर से युगों-युगों से लिपटे हुए हैं जिन्हें सहज मिटाया नहीं जा सकता।
इन्हीं युगों-युगों के लिपटे हुए कर्म-संस्कार और विचार-संस्कार सदा-सदा के लिये मिटाने का प्रयास ही सच्चे अर्थों में योग है और उसे क्रिया रूप में बदलना ही सच्चे अर्थों में ध्यान-तंत्र है.
हम शब्दों तक सीमित नहीं हैं. लेखन, भाषण, प्रवचन के पाखंड का पर्याय नहीं, हम आचरण के प्रतिरुप हैं और सुलभ भी पूर्णत: निःशुल्क हैं. व्हाट्सप्प 9997741245 पर विमर्श करने के बाद मात्र 15 दिवसीय साधना से आप वह सब कुछ अर्जित कर सकते हैं, जो हम अभिव्यक्त करते हैं.
मनुष्य की एक वास्तविकता होती है जिसे उसका सत्य और यथार्थ कहते हैं। आखिर मनुष्य क्या-क्या है और क्या-क्या नहीं ? मनुष्य न तो जागृत है, न स्वप्न है और न है सुषुप्ति। जो माया है और जो है प्रपंच--वह भी नहीं है वह।
_जितना पाप गहरा नहीं होता ,जितना पुण्य गहरा नहीं होता, जितना अज्ञान गहरा नहीं होता, उससे कहीं अधिक गहरा होता है मनुष्य का आतंरिक रूप से सम्बन्ध। क्या-क्या हम नहीं हैं--यह सर्वाधिक गहरा है। योग की गहनतम प्रक्रियाएं और धर्म की आधार बनी हुई प्रक्रियाएं उसी गहराई से जुड़ी हुई हैं--जो हम नहीं हैं।_
योग का कहना है कि जागृत अवस्था में हमारे जीवन में जो कुछ हो रहा है, वह सब हम नहीं हैं और जो हम नहीं हैं उसके विस्तार में जाने की आवश्यकता है। योग ने एक शब्द में सब कुछ कह दिया। जागृत अवस्था में हमारे जीवन में जो-जो होता है-- हम जो कुछ भी करते हैं--अच्छा या बुरा, जो-जो सम्बन्ध बनाते हैं ,शत्रु बनाते हैं, मित्र बनाते हैं, सुख मिलता है, दुःख मिलता है, पद प्राप्त कर लेते हैं, यश प्राप्त कर लेते हैं, धन-वैभव प्राप्त कर लेते हैं, विवाह कर लेते हैं, बच्चों को जन्म देते हैं--जो कुछ भी हम करते हैं--जागृत अवस्था में हम वह सब नहीं हैं।उन सबसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं। जागृत अवस्था में हमारे साथ हर पल कुछ-न-कुछ होता ही रहता है ,होता रहा है और भविष्य में भी बराबर होता रहेगा। लेकिन हम वह नहीं हैं। धन, वैभव, पद ,यश, प्रतिष्ठा ,सुख-संपत्ति, राग, द्वैष, ईर्ष्या, क्रोध, रिश्ता, नाता आदि नहीं है हमारी जागृत अवस्था की संपत्ति।
जितनी भौतिक संपत्ति को हमने एकत्र किया है, वह हम नहीं हैं। वे सब-के-सब हमसे अलग हैं। उन पर हमारा अधिकार नहीं है। जब अपनी साँस पर, अपने ह्रदय की धड़कन पर, अपने शरीर पर हमारा कोई अधिकार नहीं है तो उन जड़ वस्तुओं पर कैसे होगा अधिकार ? जरा समझने की बात है ,बहुत दूर की छोड़ दें, सपने को ही ले लें।
सपने में भी जागृत अवस्था की ही तरह सब कुछ करते हैं–निर्माण करते हैं, संग्रह करते हैं, शादी करते हैं, व्यवसाय करते हैं,–जो भी करते हैं, वे सब सपना टूटते ही खो जाते हैं। जीवन में भिखारी थे, सपने में बन गए सम्राट। जब सम्राट बने हुए होते हैं सपने में, तब हम एक पल के लिए भी नहीं सोचते कि हम तो भिखारी थे, भीख मांगते थे, सम्राट कैसे बन गए ? जागने पर फिर बन जाते हैं भिखारी।
क्या लीला है ,क्या खेल है प्रकृति का ? आखिर समझने की बात है। सपने में कितनी शक्ति है कि वह एकबारगी मिटा देती है, पोंछ देती है जागृत अवस्था के सम्पूर्ण जीवन को पल भर में ! एक के अस्तित्व से दूसरे का अस्तित्व मिट जाय, उसकी बिलकुल भी याद न रहे तो क्या उस जाग्रत अवस्था के जीवन को हम सत्य कहेंगे और क्या कहेंगे हम उसे यथार्थ ? सोचने-समझने की बात है हमारे लिए।
जिस जाग्रत अवस्था की वास्तविकता को सपना एक पल में पोंछ दे, मिटा दे तो क्या वह सत्य हो सकता है, यथार्थ हो सकता है भला ?
यही कारण है कि योग-तंत्र जागृत से अधिक महत्व देता है स्वप्न को। लेकिन हम हैं कि जागृत को ही अधिक महत्व देते रहते हैं जीवन भर ! कितनी विचित्र बात है !
बेसिक प्रश्न : यथार्थ कौन है ?
योग ‘स्वप्न’ को ‘जागृत’ से अधिक गहरा इसलिए मानता है कि हम जागने पर सपने में घटी घटनाओं को थोडा बहुत याद तो करते हैं। लेकिन ठीक इसके विपरीत स्वप्नावस्था में तो जागृत अवस्था की स्मृति बिलकुल भी नहीं रहती।
स्वप्न ही हमारे लिये हो जाता है सब कुछ। तो कौन है अधिक गहरा–जागृत या स्वप्न ? सत्य कौन है, यथार्थ कौन है ? –यह समझने वाली बात है।
सवेेरे सोकर उठने पर यह तो याद रहता है कि स्वप्न में क्या-क्या देखा, क्या-क्या अनुभव किया ? लेकिन रात में सोने के बाद स्वप्न में क्या जागृत अवस्था में किये गए कार्यो का स्मरण रहता है ?
हमारा शरीर बिस्तर पर सोया हुआ है –क्या यह याद रहता है ? यही एक मात्र कारण है कि योग ने स्वप्न के सत्य को स्वीकार किया है।
जीवन का स्व~रुप
जागृत अवस्था हमारा जीवन है और स्वप्न हमारा स्वरुप है। हम दो जीवन एक साथ जीते हैं। इसीलिए परेशान भी हैं हम अपने आप में। हम बेचैन हैं, व्याकुल हैं–लेकिन क्यों?–यह पता नहीं चल पाता। हम तृप्त भी नहीं हो पाते हैं जीवन से।
इसी प्रकार हम किसी व्यक्ति के विषय में जो समझते हैं, वह उस व्यक्ति का होता है जागृत अवस्था का स्वरूप। हमारे विषय में कोई दूसरा जानता-समझता है –वह होता है हमारा जागृत स्वरूप।
जैसे हम अपने को बहुत अच्छा व्यक्ति समझते हैं लेकिन हमारी अच्छाई को कोई व्यक्ति जानता-समझता नहीं है। तब हम यह कहते हैं कि वह व्यक्ति नासमझ है, अज्ञानी है, मूर्ख है। समझ न सका हमें। कभी अवसर आएगा जब वह हमारा मूल्य समझेगा।
कहने की आवश्यकता नहीं–हर व्यक्ति के सामने यही परेशानी है। उसे ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जो उसकी इस परेशानी को समझे और उसे ठीक से जान सके। उसके यथार्थ को समझ सके।
सभी हमको गलत समझते हैं, हम कितने योग्य व्यक्ति हैं, प्रेम के अथाह सागर हैं, दया, करुणा से भरे हुए हैं हम। लेकिन हमें किसी ने छोटा-सा तालाब भी नहीं समझा। ठीक इसके विपरीत समझते हैं लोग–क्रोधी, कपटी, ईर्ष्यालु, मूर्ख और न जाने क्या-क्या ?–जो हम नहीं हैं।
सच पूछा जाय तो हम ही बनाते हैं अपना स्वरूप जिसका ज्ञान दूसरे किसी व्यक्ति को नहीं होता। होगा भी तो कैसे ? वह तो हमारी जागृत अवस्था के स्वरुप को ही सब कुछ समझता है।
हम एक शांत व्यक्ति हैं, हमारे शांत होने का जो स्वरूप है, वह है–हमारा स्वप्नावस्था का स्वरुप। और जब हम क्रोध में होते हैं तो वह है–हमारा जागृत अवस्था का स्वरुप। हमारी शांति से कोई परिचित नहीं होता। यदि परिचित होता है तो हमारे क्रोध से। क्योंकि वही दिखलाई देता है
योग का यह गंभीर विषय है। इसके लिए हमें अंतर्मुखी होना होगा। अपनी आत्मा की गहराई में उतरना होगा। यह अति कठिन प्रयास है। यदि हम इस प्रयत्न में सफल हो गए तो हम व्यक्ति के आतंरिक स्वरूप को समझ पाएंगे। प्रवेश कर पाएंगे दूसरे के अंतर्मन में।
वैसे योग इसके और आगे की बात करता है। वह कहता है कि स्वप्न की अवस्था में भी हमने जो-जो कार्य किये हैं, जो-जो हमने देखा-सुना और अनुभव किया–वह सब भी हम नहीं हैं। जब हम जागृत अवस्था में नहीं हो सकते तो स्वप्नावस्था में भी नहीं हो सकते।
जागृत, स्वप्न के बाद तीसरी अवस्था आती है–सुषुप्ति की। आत्मा की यह अत्यन्त महत्वपूर्ण अवस्था मानी जाती है और इसलिए जन्म-जन्मान्तर की संस्कार-जन्य जितनी भी वासनाएं हैं, वे सब बीज रूप में सुषुप्ति अवस्था में ही विद्यमान रहती हैं।
संस्कार-जन्य वासना के तीन रूप हैं–उर्जावस्था, तरलावस्था और ठोसावस्था। इन तीनों रूपों और तीनों अवस्थाओं का सम्बन्ध आत्मा की तीनों अवस्थाओं से होता है। वासना के बीजजन्य ऊर्जा के साथ सुषुप्ति अवस्था में मन भी अपने ऊर्जा रूप में विद्यमान रहता है।
वासना के तरल रूप के साथ मन भी स्वप्नावस्था में तरल अवस्था में रहता है और यही कारण है कि सपने अस्थिर होते हैं। उनमें कोई तारतम्य भी नहीं होता। इसी प्रकार जागृत अवस्था में वासना के ठोस रूप के साथ मन भी रहता है अपने ठोस रूप में। योग का उद्देश्य है कि आत्माओं की तीनों अवस्थाएं एक दूसरे में विलीन हो जानी चाहिए।
लेकिन यह कैसे सम्भव है ?
ज्ञान और कर्म के मिश्रण से। ज्ञान सांख्य है और कर्म है–योग।
जैसे हम जागृत में नहीं हैं, वैसे हम स्वप्न में भी नहीं हैं, उसी प्रकार सुषुप्ति में भी नहीं हैं। जब ज्ञान, कर्म, योग से आत्मा की तीनों अवस्थाएं वासना के तीनों रूप और मन की तीनों अवस्थाएं अपना- अपना अस्तित्व खो बैठती है तो शेष क्या रह जाता है हमारे पास ? इसके उत्तर में योग कहता है --'परमशून्य'।
_हम परमशून्य के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं रह जाते हैं। योग के अनुसार यह है आत्मा की 'परमअवस्था'। जाग्रत अवस्था में आत्मा रहती है अपनी 'परा' अवस्था में। स्वप्न में आत्मा रहती है अपनी 'अपरा' अवस्था में। इसी प्रकार सुषुप्ति में आत्मा रहती है अपनी 'परमा' अवस्था में।_
इस अवस्था में आत्मा अपने निज शरीर अर्थात् आत्म-शरीर में रहती है। यह आत्मा का पांचवां शरीर है।ध्यान योग की शिखर अवस्था है–परमावस्था
इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए साधक को समय की एक लंबी यात्रा करनी पड़ती है। कई जन्म बीत जाते हैं। न जाने कितने मानसिक, वैचारिक और आत्मिक संघर्ष करने पड़ते हैं। साधना-क्रम आगे बढ़ाने के लिए योग्य गर्भ का भी होना आवश्यक है। अन्यथा साधना-क्रम भंग होने की आशंका बनी रहती है।
फिर तो इधर-उधर भटकना पड़ता है और साधक को जाने कब और किस जन्म में ‘परमावस्था’ उपलब्ध होगी और किस जन्म में उपलब्ध होगा ‘आत्म साक्षात्कार’ ?
‘परमावस्था’ आत्मा की अद्वैत अवस्था मानी जाती है। इसी अवस्था में आत्मा को अपने निज स्वरुप का ज्ञान होता है। इसी अवस्था में आत्मा के सामने प्रकट होता है–एक दिव्य ज्योतिर्मय प्रकाश जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
क्योंकि वर्णन योग्य शब्द ही नहीं मिलते। वह प्रकाश शब्दातीत, भावातीत और वर्णनातीत है। आखिर ऐसा कौन है वह जो सबसे अतीत है ? कहने की आवश्यकता नहीं–वेदों ने, उपनिषदों ने दर्शन शास्त्रों ने, पुराणों ने उसी दिव्य ज्योतिर्मय को ‘परब्रह्म परमात्मा’ कहा है।
वह मूल अस्तित्व है सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड का जिसकी उपस्थित सदैव से रही है और आगे भी बराबर रहेगी। उसका न कभी निर्माण होता है और न होता है कभी नाश। वह आदि और अंत रहित है। वह साकार है और निराकार भी। वह संसार के समस्त कार्य-कारण का आधार भी है।
जो समस्त चराचर जगत में समान रूप से व्याप्त है, जिसका अंश मानव रूप में राम है, कृष्ण है, रावण है और है कंस भी। जिसका अंश समय-समय पर सिद्ध महात्माओं और सिद्ध योगियों के रूप में भी होता है प्रकट संसार में, उसी का अंश समस्त प्राणियों में विद्यमान है आत्मा के रूप में और वही हैं ‘हम’।
आत्मा के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं हम। आत्मा का अनुभव या परमात्मा का अनुभव कह तो देते हैं हम लेकिन वह अनुभव भी नहीं हैं हम। ऎसे कब तक? कितने जन्मों तक? इस बार तो ‘बस’ कर लें.
{चेतना विकास मिशन}





