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आत्म-संवाद:मैं अपने आप से ही सवाल पूछता हूँ;क्या मैंने सचमुच कुछ सार्थक लिखा है?

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शैलेन्द्र चौहान ;

पत्रिकाओं में रचनाएं आ रही हैं, कुछ किताबें भी छप चुकी हैं, सोशल मीडिया पर सूचना डालने के बाद मित्रों के फोन और औपचारिक बधाइयाँ भी मिल गई हैं फिर भी भीतर कहीं एक खालीपन है। वह उल्लास नहीं है जिसकी कल्पना लिखते समय की थी। यह खालीपन क्यों है? क्या मेरी संवेदना कुंद हो गई है, या समय ही ऐसा आ गया है जहाँ साहित्य का छप जाना अपने-आप में किसी उपलब्धि का संकेत नहीं रहा?

मैं खुद से कहता हूँ—शायद समस्या मुझमें नहीं, समय में है। लेकिन यह उत्तर मुझे संतुष्ट नहीं करता। हर समय में लेखक ने अपने समय को दोषी ठहराया है। फिर आज का समय ही क्यों अलग हो? क्या यह सच नहीं कि पहले भी लेखक अकेला था, उपेक्षित था फिर भी उसे लिखने और छपने के बाद एक गहरी तृप्ति मिलती थी? फर्क कहाँ पड़ा है?

मैं पलटकर अपने भीतर झाँकता हूँ।

लिखते समय जो बेचैनी थी—वह अब भी है। शब्द आज भी भीतर से उठते हैं, अनुभव आज भी चोट करते हैं, सामाजिक अन्याय, सांस्कृतिक पतन, मनुष्य का अकेलापन—ये सब अब भी मुझे लिखने के लिए विवश करते हैं। तो फिर लिख देने और छप जाने के बाद वह संतोष क्यों नहीं आता? क्या इसलिए कि अब छपना बहुत आसान हो गया है? या इसलिए कि छपने का अर्थ बदल गया है?

मैं खुद से पूछता हूँ-

क्या आज छपना संवाद है या सिर्फ उपस्थिति?

कभी छपना एक घटना होता था। रचना पाठक तक पहुँचती थी, बहस जन्म लेती थी, असहमति होती थी, लेखक को लगता था कि उसका कहा किसी के जीवन में हस्तक्षेप कर रहा है। आज छपना अक्सर सिर्फ सूचना बनकर रह गया है—एक और पोस्ट, एक और किताब, एक और लिंक। पढ़ा गया या नहीं, समझा गया या नहीं—इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। प्रतिक्रिया की जगह ‘लाइक’ ने ले ली है, आलोचना की जगह मौन ने।

मैं खुद को समझाने की कोशिश करता हूँ—शायद यह मेरी अपेक्षाओं का संकट है।

क्या मैं अब भी साहित्य से वही चाहता हूँ जो पहले चाहता था? समाज को बदलने की भूमिका? चेतना को झकझोरने की क्षमता? या सिर्फ इतना कि कोई मुझे गंभीरता से पढ़ ले, मुझे सुने?

मैं मानता हूँ—मैं पढ़े जाने की अपेक्षा रखता हूँ।

और यह पढ़ गलत नहीं है। लेखक संवाद चाहता है, अकेले बोलते रहना नहीं। लेकिन समय की विडंबना यही है कि शोर बहुत है, सुनने का धैर्य नहीं। हर कोई बोल रहा है—तेज़, ऊँचा, लगातार। ऐसे में साहित्य की धीमी आवाज़ दब जाती है। शायद इसीलिए छपने के बाद भी अनुभूति सार्थक नहीं लगती—क्योंकि वह आवाज़ लौटकर नहीं आती।

तो क्या साहित्य अब हाशिये पर है?

उत्तर उतना सरल भी नहीं। साहित्य मौजूद है, पहले से ज़्यादा मात्रा में। कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास, आलोचना, कथेतर तथा विभिन्न अनुशासनों की किताबें— सब कुछ है। लेकिन उसकी सामाजिक हैसियत बदल गई है। वह अब केंद्रीय सांस्कृतिक शक्ति नहीं रहा। राजनीति, बाजार, कॉर्पोरेट और तकनीक ने मिलकर सार्वजनिक चेतना पर कब्ज़ा कर लिया है। साहित्य उस तेज़ रफ्तार संसार में धीमा पड़ जाता है। छपना इसलिए पर्याप्त नहीं लगता, क्योंकि छपने से कोई हलचल पैदा नहीं होती।

मैं खुद से सवाल पूछता हूँ

क्या मेरी बेचैनी सचमुच सामाजिक है, या वह सिर्फ आत्मसंतोष की चाह है?

यह सवाल मुझे असहज करता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं उस पुराने लेखक-मिथक से चिपका हूँ, जहाँ लेखक को ‘महत्वपूर्ण’ महसूस होना चाहिए? अगर रचना लिखना भर पर्याप्त है तो फिर छपने के बाद की अनुभूति पर इतना जोर क्यों? नहीं, सिर्फ लिखना पर्याप्त नहीं है। साहित्य हमेशा संबंधों का काम है—लेखक और पाठक के बीच, रचना और समाज के बीच। अगर वह संबंध कमजोर पड़ जाए, तो लिखना एकांत साधना बनकर रह जाता है। साधना महत्वपूर्ण है लेकिन लेखक केवल साधक नहीं होता; वह साक्षी भी होता है, हस्तक्षेपकर्ता भी।

देखता हूँ कि आज का पाठक भी संकट में है।

उसके पास समय कम है, धैर्य कम है और विकल्प बहुत हैं। वह भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है जिसने साहित्य को ‘अप्रासंगिक’ बना दिया है। ऐसे में लेखक और पाठक दोनों एक-दूसरे से छूटते जा रहे हैं। छपने के बाद अनुभूति इसलिए भी सार्थक नहीं लगती, क्योंकि सामने कोई ठोस ‘दूसरा’ कर्म नहीं दिखता।

तो क्या लिखना छोड़ देना चाहिए?

उत्तर तुरंत आता है—नहीं।

लिखना छोड़ना समाधान नहीं है। यह समय से पलायन होगा। शायद इस समय में सार्थकता की परिभाषा बदलनी होगी। पहले सार्थकता का अर्थ था—प्रभाव, चर्चा, मान्यता। आज शायद सार्थकता का अर्थ है—जिद, निरंतरता और ईमानदारी।

खुद को समझाता हूँ—हो सकता है कि मेरी रचना आज नहीं, कल पढ़ी जाए।

हो सकता है कि वह भीड़ में गुम हो जाए, लेकिन किसी एक व्यक्ति तक चुपचाप पहुँच जाए। साहित्य का काम हमेशा तात्कालिक परिणाम देना नहीं रहा है। कई बार वह समय के भीतर बीज की तरह पड़ा रहता है।

फिर भी मैं यह स्वीकार करता हूँ—

इस समय में लेखक का अकेलापन बढ़ा है।

छपने के बाद जो रिक्तता महसूस होती है, वह इसी अकेलेपन का नाम है। यह अनुभूति बताती है कि लेखक अब सिर्फ रचनाकार नहीं, बल्कि हाशिये पर खड़ा साक्षी है। इसीलिए साहित्य लिखने और छपने के बाद बहुत सार्थक किए जाने की अनुभूति नहीं होती।

लेकिन शायद यही असंतोष, यही अधूरापन, मुझे फिर लिखने को मजबूर करता है।

और संभव है कि इस समय में साहित्य की सार्थकता यही हो।

शैलेन्द्र चौहान ;  

34/242, सेक्टर-3, प्रतापनगर, जयपुर – 302033

मो. 7838897877

Ramswaroop Mantri

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