गाँव से शहर तक : ज़िंदगी हर दिन नया पाठ पढ़ाती है
तेजपाल सिंह ‘तेज’
उल्लेखनीय है कि मैंने अपने निरीक्षक सहायक के रूप में बहुत सी शाखाओं का निरीक्षण किया किंतु समय अंतराल के कारण उस दौर में घटित घटनाओं की धुंधली सी छवि तो आज भी याद हैं किंतु उस घटना का सरोकार किस शाखा विशेष से रहा है, वह पूरी तरह से याद नहीं रह गई है। खैर! उन घटनाओं का उल्लेख तो जस का तक करूगा। हाँ! जहाँ-जहाँ शाखा का स्थान/नगर याद होगा, उसका उल्लेख भी करता चलूंगा, अन्यथा नहीं।
लोग अच्छे हैं या बुरे?
ओशो कहते हैं कि इस बात की चिंता मत करो कि लोग अच्छे हैं या बुरे। बस इस बात की चिंता करो कि तुम कहाँ हो, क्या हो, कौन हो। इसका लोगों से क्या लेना-देना है? आज तुम हो, कल तुम नहीं होगे, दुनिया चलती रहेगी। कल तुम नहीं थे, तब भी दुनिया चलती रही। कल तुम नहीं रहोगे, तब भी दुनिया चलती रहेगी। तब लोगों को बदलना होगा। लोगों को अच्छा बनना पड़ेगा। अगर कोई आपको ऐसी जिम्मेदारी देता तो भी आपके लिए चिंता की कोई बात होती कि कौन अच्छा है, कौन बुरा है। इससे आपका क्या लेना-देना? लेकिन हम यही करते रहते हैं। कौन बुरा है? उसके कितने काम बुरे हैं? कौन अच्छा है? कौन अच्छा है? और फिर आपको अच्छा नहीं मिलता। क्योंकि आपको अच्छा नहीं मिल सकता। इसके पीछे वही अहंकार है कि जब भी आप किसी अच्छे व्यक्ति से मिलते हैं, तो आपके अहंकार को ठेस पहुंचती है कि कोई मुझसे भी बेहतर है। कोई मुझसे भी बड़ा है। कोई मुझसे श्रेष्ठ है। अपने आप को लोगों से बड़ा/सच्चा दिखाने के लिए बुरे लोग भी अच्छे व्यक्ति में बुराइयाँ ढूँढ़ने का उपक्रम करने लगते हैं । अपनी बुद्धिमत्ता दिखाने लगते हैं ताकि आप उसे अपने से नीचे के स्तर पर ला सकें।
इस उक्ति का उल्लेख करना महज इसलिए मुझे जरूरी लगा कि जब कोई अपनों से दूर किसी अन्य प्रदेश में अकेले रहते हैं तो व्यक्ति को अपने भीतर के अंहकार को भुलाना ही पड़ता है। हाँ! साफदिल इंसान को ऐसा कुछ भी करना नहीं पड़ता। मेरे सामने जो दिक्क्त थी, वह थी मेरा अधार्मिक होना जबकि निरीक्षक महोदय पूरे धार्मिक थे। ऐसे में दिन-रात साथ रहकर निभाव करना बहुत टेड़ी खीर था। लेकिन हम दोनों में एक अजीब सा तारतम्य था और वह था एक दूसरे की रुचियों को एक दूसरे पर न थोपना। शाखा से बाहर आते ही बाप-बेटे की तरह बिना किसी सामाजिक भेदभाव के रहते थे। अब आगे…
जब पहली ही रात मेरे कमरे में साँप आ गया…
अब हमें पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक शाखा का निरिक्षण करना था। शाखा का नाम इस समय याद नहीं आ रहा है। बस इतना याद है कि वह क्षेत्र तराई वाला था। ज्यादा बड़ा नगर नहीं था। शाखा में पहुँचने के बाद हमारे रहने के लिए नगर की मुख्य सड़क के पास ही एक दो-तीन मंजिले मकान में व्यवस्था कर दी गई। हमारे रहने के लिए मकान मालिक ने प्रथम तल को उचित समझा। मेरा और शर्मा जी ( निरिक्षक) के कमरे पास-पास ही थे। मकान मालिक भूतल पर सपरिवार रहता था।
पहली ही रात की बात है – हम खाना खाने के बाद अपने-अपने कमरे में सोने के लिए चले गए। बिस्तर आदि काम करने में थोड़ा समय लग गया। लाइट अभी जल ही रही थी कि देखा कमरे के फर्श पर एक साँप घूम रहा था। कमरे में साँप देखकर मेरी चीख निकल गई। खाट पर बैठे-बैठे मैंने कुछ खटखटाया भी किंतु साँप टस से मस नहीं हुआ। मेरी चीख सुनकर मकान मालिक दौड़ा-दौड़ा मेरे कमरे की तरफ आया। उन्हें देखकर मैंने इशारे-इशारे में साँप की ओर उंगली उठाई तो उन्होंने साँप को पकड़कर कमरे से बाहर वाली गली में फैंक दिया और बोले अब आप सो जाओ। और देखों – इन साँपों से डरने की जरूरत नहीं है। किंतु मेरे मन में डर समाया हुआ था। मकान मालिक ने बताया कि ये तराई वाला इलाका है। फलत: वहाँ साँपों काअक्सर सड़कों या फिर सूखे घरों में धूमते फिरने की साधारण सी बात है। यहाँ के लोग तो इस तरह रहने के आदी हो चुके है। उनका कहना था कि ये पानी के साँप होते हैं जिनमें जहर नहीं होता। किंतु मेरे मन का डर न गया। फिर हुआ यूँ कि उन्होंने मुझे मकान के दूसरे माले पर बने एक कमरे में सिफ्ट कर दिया। किंतु कैसा सोना। खाट पर पड़े-पड़े करवट दर करवट बदलते हुए रात बीती।
सर! यह तो मेरी पूजा का हिस्सा है…
सुबह होते ही मैं और शर्मा जी प्रात: भ्रमण पर निकले तो देखा कि सड़क के किनारे-किनारे भरे पानी में ही नहीं अपितु सड़क पर भी साँप घूमते देखे गए। खैर! हम मुख्य सड़क के साइड वाली छोटी सड़क पर घूमने चलते चले गए। थोड़ी दूर चलकर देखा कि सड़क के बीचोंबीच एक सामान्य लम्बाई का साँप कुचला हुआ पड़ा था। आने-जाने वाले वाहन और लोग उससे बचकर निकले चले जा रहे थे। शर्मा जी ने भी ऐसा ही किया। किंतु उसे देखकर मेरे कदम यक-ब-यक रुक गए। मन में आया कि उसे किसी लकड़ी के सहारे उठाकर किसी झाड़ी पर डाल दूँ। मैं इसी उलझन में शर्मा से काफी पीछे रह गया था। मैंने एक पेड़ से सूखी हुई डाल तोड़ी और साँप को उठाकर एक झाड़ी पर डाल दिया और आगे बढ़ गया। शर्मा जी रुककर मेरे आने का इंतजार कर रहे थे। मैंने सारी मामला उन्हें सुनाया तो उन्होंने कहा – तू भी किन पचड़ों पड़ा रहता है। मैंने कहा – सर! यही तो मेरी पूजा का हिस्सा है। शर्मा जी बोले – ठीक है, अब चलो। धूमफिर कर हम वापिस मकान पर आ गए। साँपों के जखीरे को देखकर शर्मा जी ने मन बनाया कि इस शाखा को जल्दी से निपटाकर यहाँ से निकलते हैं।
हाँ ! देखा है…मेरा नया है…
उसी दिन शाखा प्रबंधक ने अपने घर पर बुलाया। चाय-पानी पीकर उनके घर के सामने बने बैडमिंटन कोर्ट पर बैडमिंटन खेलने लगे। शर्मा जी के साथ रहते-रहते मैंने भी हाथ-पैर फैंकने शुरू कर दिए थे। कोर्ट के एक ओर मैं और शर्मा जी और दूसरे कोर्ट में शाखा प्रबंधक और उनका कमउम्री बेटा था। कुछ देर तक हम हंसी-ठट्ठा करते हुए खेलते रहे। शाखा प्रबंधक महोदय अचानक खड़े हो गए और अपने बेटे से बोले – ठीक से खेल नहीं तो देखा है ये जूता। उनका बेटा भी हाजिर जवाब निकला। उसने बिना कुछ देरी किए फौरन उनसे कहा – हाँ! देखा है…आपका पुराना है और मेरा नया। इतना सुनकर सारे सन्न रह गए और फिर खिलखिला कर हंस पड़े।
जब हम भारतीय स्टेट बैंक की रांझी रोड ( जबलपुर) पहुँचे…
जैसे ही हम भारतीय स्टेट बैंक की रांझी रोड (जबलपुर) शाखा पहुँचे तो देखा कि जबलपुर एक साफ-सुथरा शहर था। चौड़ी-चौड़ी साफ-सुथरी भीड़ भरी सड़कें शहर की रौकन बढ़ाने का काम कर रही थीं। भारतीय स्टेट बैंक की रांझी रोड शाखा आकार और काम के हिसाब से बहुत बड़ी शाखा था। वहाँ लगभग एक महीने का ठहराव था। शाखा भी साफ-सुथरी और फर्नीचर आदि का रख-रखाव वैल मेंटेंड था। शाखा प्रबंधक का केबिन भी आम शाखाओं से बड़ा था। शाखा के ऊपरी तल पर शाखा प्रबंधक की निवास था। हमारे रहने-सहने की व्यवस्था भी शाखा में ही कर दी गई। शर्मा जी का कमरा प्रथम तल पर तथा मेरा कमरा भूतल पर था। इस शाखा में हमें अलग-अलग तरह के ऐसे अनुभव हो हुए कि आज तक भी याद हैं।
जब लेखक लिखने पर आता है तो …
क्या लेखक उपद्रवी होता है? हाँ! लेखक उपद्रवी होता है। कारण कि जब वह लिखने पर आता है तो मेरे-तेरे का भाव ग़ायब हो जाता है । ऐसा समीक्षकों का मानना है, लेखकों की नहीं। लेखक तो केवल लिखता है। अब प्रेमचंद तो पुरुष थे, कोई कह सकता है कि कफ़न में प्रसव वेदना का ऐसा वर्णन वे कैसे कर सके । ऐसा थोड़े था कि प्रेमचंद ने कोई बच्चा पैदा किया था उस कहानी को लिखने के लिए । तो यह एक चीज़ हैं कि यक्ष अपना रूप बदलने में माहिर होता है। वह कुछ भी बन सकता है । लेखक का मन भी ऐसा ही होता है । वह कुछ भी लिख सकता है। इस अर्थे में लेखक उपद्रवी होता है। मैं अक्सर सुबह को शाखा के बाहर रांझी रोड़ पर खड़ा होकर सड़क पर आने जाने वालों का नजारा देखा करता था। एक दिन जब मैं रांझी रोड (जबलपुर) शाखा के बाहर रांझी रोड पर खड़ा था तो सड़क पर आती-जाती साईकिलों का इतना बड़ा काफिला मैंने कभी नहीं देखा था। सड़क के इस ओर से दूसरी ओर पार करना बहुत ही दूभर था। पूछने पर पता चला कि रांझी रोड के अन्तिम छोर पर ओर्डिनेंस फैक्ट्री है, ये सब उसमें काम करने वाले ही कर्मचारी होते हैं तो अक्सर फैक्ट्री आने-जाने के लिए साईकिलों का ही प्रयोग करते हैं। बस एक लेखक / कवि होने के कारण मेरा दिमाग घूम गया और सड़क पर दौड़ती हुई साईकिलों को एक कविता में ढालने का उपद्रव कर बैठा। रचनात्मकता का यही तो मर्म होता है।
कविता : साईकिलों पर बैठी भूख
“जबलपुर की रांझी रोड/ रांझी रोड के लगभग आखिरी छोर पर/ मिलिट्री की ओरडिनेंस फैक्ट्री / फैक्ट्री में काम करने वाले लोगों की/ शहर की घनी आबादी वाली / इस सड़क पर / लहराती-बलखाती / दौड़ती हुई साईकिलें / साईकिलों पर बैठी हुई भूख / प्रतिदिन / सुबह हो या शाम / रात हो या दिन / फर्रांटे भरती हुई / इधर से उधर / उधर से इधर / निर्बाध गति से आती-जाती है/ मानो / औलंपिक खेलों में / भाग लेकर लौटी हो / और / स्वर्ण पदक की प्राप्ति पर / सहर्ष सीना तानकर कुलांचें मारती है / सड़क को पार करना भी / जैसे कोई जंग जीतने से कम नहीं / लोग हैं कि स्वागत कलश लिए / सड़क के किनारे-किनारे / क्रम-बद्ध खड़े होते हैं।“
शाखा का बैंकर्स चैक अकाउंट बलेंसड नहीं था तो…
जब शाखा के कामकाज का परीक्षण करते हुए कुछ दिन बीत गया तो शर्मा जी ने एक दिन प्रात: भ्रमण करते हुए मुझसे कहा, ‘ इस शाखा के कामकाज को देखते हुए मेरा मन है कि इस शाखा को अच्छी रेटिंग दी जाए किंतु एक कमी है और वो है कि यहाँ का बैंकर्स चैक अकाउंट बलेंसड नहीं है। अब क्या करें? हम घूमते-फिरते बातचीत करते हुए शाखा को लौट आए। स्नान और नास्ता करने के बाद अपना का शुरू कर दिया। शर्मा जी ने इस बाबत शाखा प्रबंधक से बातचीत की होगी। किंतु शाखा प्रबंधक ने बैंकर्स चैक अकाउंट को बैलेंस कराने में की गई मस्सक्त के चलते लाचारी दिखाई होगी। फिर हुआ यूँ कि शर्मा जी ने अचानक मुझसे कहा कि आज से तुम शाखा के बैंकर्स चैक अकाउंट को बैलेंस करने के काम पर लग जाओ और तुम्हारा टाइपिंग का काम शाखा का टाइपिस्ट करेगा। इस बाबत मैंने शाखा प्रबंधक से बात करली है। इतना सुनकर मैं सकते में आ गया कि जिस शाखा के कर्मचारियों/अधिकारियों से काम नहीं हुआ, मैं कैसे कर पाऊँगा। मेरे लिए यह चुनौती से कम नहीं था। गनीमत ये थी कि अपनी पैत्रिक शाखा में लगभग सभी अकाउंट्स को बैलेंस करने का काम जहाँ अटक जाया करता था तो मुझे ही उस काम में झौंक दिया जाता था। इस कारण मैंने वो चुनौती स्वीकार कर ली।
मुझे उस एकाउंट में आ रहे अंतर (डिफरेंस) और उनके द्वारा किए गए प्रयासों के बारे में जानकारी दे दी गई। और मैं काम पर लग गया। संयोग की बात थी कि मैंने पाया कि वह गलती कुछ और नहीं, केवल रिवर्स एंट्री की थी। अब मेरा काम बहुत आसान हो गया था। मैंने पहले ही दिन जब बैलेंस बुक और खाता बही को इधर से उधर पल्टा और डिफाल्ट मेरी पकड़ में आ गया। और खाता बैलेंस हो गया लेकिन मैंने इस बात का खुलासा किसी से भी नहीं किया और उस काम को जब तक पकड़े रहा तब तक मेरा टाइपिंग का काम पूरा न हो गया। इसी बीच में एक दिन ऐसा भी आया था कि शाखा का एक कर्मचारी मुझे लंच टाइम में शाखा के करीबी बाजार में घुमाने ले गया और वहाँ उसने खुद भी एक बीयर पी और मुझे भी पी गया। लेकिन मैं अंदर ही अंदर डर भी रहा था कि कहीं शर्मा जी को इसका पता न चल जाए। खैर! बात समय के गर्त में दबकर रह गई। जब टाइपिंग का काम पूरा हो गया तो शर्मा जी ने खाता बैलेंसिंग के बारे में पूछा तो मैंने सारा सच शर्मा जी को बता दिया। बैलेंसिंग का काम पूरा हो जाने की बात सुनकर शर्मा जी बहुत ही खुश हुए। और शर्मा जी नें यह बात शाखा प्रबंधक को बताई तो शाखा प्रबंधक के खुशी के कोई ठिकाने नहीं थे। कारण कि शाखा की निरिक्षण/परीक्षण रेटिंग़ का शाखा प्रबंधक की सी आर पर बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ता है जो उसकी पदोन्न्ति में अहम भूमिका निभाता है।
जब हम भेड़ा घाट के देखने के लिए गए तो…
जबलपुर में नर्मदा नदी के किनारे कई प्रसिद्ध घाट हैं, जिनमें तिलवारा घाट, ग्वारी घाट और भेड़ाघाट शामिल हैं।
तिलवारा घाट: यह एक प्रसिद्ध घाट है, जिसे गंगा जितना ही पवित्र माना जाता है। यह जगह लोकमान्य तिलक से जुड़ी है, जिन्होंने 1939 में यहां एक विशाल जन समूह को संबोधित किया था, और इसे तिलक भूमि के नाम से भी जाना जाता है।
ग्वारी घाट: यह घाट साधना का केंद्र रहा है। ग्वारी घाट और इसके आसपास का क्षेत्र प्राचीन समय से साधु-संतों के ध्यान और तप का केंद्र रहा है।
भेड़ाघाट: भेड़ाघाट एक छोटा शहर है जो जबलपुर से 23 किलोमीटर दूर है। यह धुआंधार जलप्रपात और संगमरमर की चट्टानों के लिए प्रसिद्ध है।
गौरी घाट: गौरी घाट का नाम देवी गौरी के नाम पर पड़ा है। यह घाट भी ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण है। जबलपुर में नर्मदा नदी के किनारे और भी कई घाट हैं, जैसे कि जिलहरी घाट, उमा घाट, खारी घाट, लम्हेटा घाट और सिद्ध घाट।
शाखा निरीक्षण के दौरान एक दिन शाखा प्रबंधक ने हमें भेड़ा घाट दिखाने का मन बनाया। वह छुट्टी का दिन था। दो हम और तीन-चार शाखा के कर्मचारी स्कूटरों पर सवार होकर भेड़ा घाट देखने गए। एक स्कूटर पर दो-दो सवारी। सड़क काफी चौड़ी और उसके दोनों किनारे घने ।पेड़ों से घिरे थे। हमारा स्कूटर सबसे पीछे था। मैंने देखा कि पेड़ का एक तना टूटकर सड़क के बीचोंबीच पड़ा था। आने-जाने वाले सब लोग उस तने के इधर-उधर से निकले चले जा रहे थे किंतु किसी ने उस तने को उठाकर एक साइड लगाने का प्रयास नहीं किया। उसे देखकर मैंने अपने साथी से स्कूटर रोकने के लिए कहा। स्कूटर रुका तो मैंने अपने साथी से उस तने को उठाने के लिए मदद करने के लिए कहा तो उसने भी मुझे ही रोकने का प्रयास किया। किंतु जब मैं अकेला ही उस तने को खिसकार एक साइड में करने लगा तो मेरा साथी भी मेरा साथ देने के लिए आ ही गया। इस तरह हमने तने को हटाकर सड़क से व्यवधान दूर कर दिया। लेकिन हम अपने दूसरे साथियों से काफी पीछे रह गए थे लेकिन हमसे आगे चलने वाले साथी अपने-अपने स्कूटर बंद करके हमारा इंतजार कर रहे थे। मेरे साथी ने जब देर हो जाने का कारण दूसरे साथियों को बताया तो उन्होंने कहा – सिंह साहब आप भी किस पचड़े में पड़ गए। इससे पहले कि मैं उनकी इस बात का जवाब देता, शर्मा जी ने उनसे कहा – सिंह सहाब ने जो भी किया, ठीक किया। अब कोई और सवाल नहीं।।। ऐसे काम करना इनकी पूजा का हिस्सा है। इतना सुनकर सब चुप हो गए और हम कुछ ही देर में भेड़ा घाट पहुँच गए। घूमफिर कर थोड़ा समय वहाँ बिताया।।।बहुत अच्छा लगा।
उल्लेखनीय है कि भेड़ाघाट एक रमणीय पर्यटन स्थल है। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित चौसठ योगिनी मंदिर इसके समीप स्थित है। धुआंधार जलप्रपात, भेड़ाघाट के निकट एक आकर्षक पर्यटन स्थल है। नर्मदा नदी के दोनों तटों पर संगमरमर की सौ फुट तक ऊँची चट्टानें भेड़ाघाट की खासियत हैं। यह पर्यटन स्थल जबलपुर से महज 23 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ कई प्रसिद्ध् हिन्दी फिल्मो का चित्रान्कन भी हुआ है। बताते है कि संगरमर की चट्टानों के बीच चाँद की रोशनी में भेड़ाघाट की सैर एक अलग ही तरह का अनुभव रहता है। भेड़ाघाट के पास नर्मदा नदी के पानी का धुआँधार जलप्रपात एक बड़े झरने के रूप में गिरता है। यह स्पॉट धुआँधार फॉल्स कहलाता है। भेड़ाघाट के पास ही एक पहाड़ी पर चौंसठ योगिनी मंदिर स्थित है।
अब शाखा का काम निपटाने के लिए हमारे पास कुछ ही दिन शेष थे। वो भी बीत गए और शाखा को ‘Efficiently Run’ रेटिंग दी गई तो शाखा के सारे कर्मचारी और अधिकारीगण खुशी से झूम उठे। उनके द्वारा हमें एक होटल में भव्य फेयर वैल दी गयी। और इस तरह रांझी शाखा का काम सम्पन्न हुआ और हम आगे के सफर को रवाना हो गए। 0000
लेखक : वरिष्ठ कवि/लेखक/आलोचक तेजपाल सिंह तेज एक बैंकर रहे हैं। वे साहित्यिक क्षेत्र में एक प्रमुख लेखक, कवि और ग़ज़लकार के रूप ख्यातिलब्ध हैं। उनके जीवन में ऐसी अनेक कहानियां हैं जिन्होंने उनको जीना सिखाया। उनके जीवन में अनेक यादगार पल थे, जिनको शब्द देने का उनका ये एक अनूठा प्रयास है। उन्होंने एक दलित के रूप में समाज में व्याप्त गैर-बराबरी और भेदभाव को भी महसूस किया और उसे अपने साहित्य में भी उकेरा है। वह अपनी प्रोफेशनल मान्यताओं और सामाजिक दायित्व के प्रति हमेशा सजग रहे हैं। इस लेख में उन्होंने अपने जीवन के कुछ उन दिनों को याद किया है, जब वो दिल्ली में नौकरी के लिए संघर्षरत थे। अब तक उनकी दो दर्जन से भी ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार (1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से भी आप सम्मानित किए जा चुके हैं। अगस्त 2009 में भारतीय स्टेट बैंक से उपप्रबंधक पद से सेवा निवृत्त होकर आजकल स्वतंत्र लेखन में रत





