डॉ. विकास मानव
(ध्यान प्रशिक्षक/मनोचिकित्सक)
जब से पश्चिम के भौतिकवाद से ऊबे, घबराये, परेशान और तनावग्रस्त लोगों का वास्तविक सुख-शांति की तलाश में भारत में आना अधिक हो गया है, तभी से भारत में साधू-सन्यासियों, योगियों, सिद्ध-साधकों की आधुनिक तथाकथित जमात भी तेजी से बढ़ने लगी है।_
इनकी अपनी-अपनी ऐश्वर्यमयी और सुख-सुविधा- संपन्न मंडलियां भी हैं जिनके सदस्य अधिकांश पश्चिमी देशों के पलायनवादी लोग हैं जो वास्तविक सुख-शांति की खोज में भटकते हुए भारत आते हैं।
प्रश्न यह है कि देश के हों या हों विदेश के लोग, क्या उनको उपलब्ध होता है सच्चे अर्थों में वह सुख, वह शांति ?
विचारणीय है यह प्रश्न।
प्रायः ऐसे भटके हुए लोग बहुत बड़ी संख्या में देखने को मिल जायेंगे जो इन और ऐसी मंडलियों से भटक कर तथाकथित महापुरुष के चंगुल से मुक्त होकर अपने को ठगे-से अनुभव करते हैं।
उनसे तरह-तरह की दीक्षा के नाम पर भारी धन ऐंठ कर उनको भरमाया जाता है। उन्हें बताया जाता है कि उनकी कुण्डलिनी जाग्रत करने के लिए उनके अंदर शक्तिपात किया जायेगा आदि आदि।
यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि शक्तिपात दीक्षा योग और तंत्र की अति महत्वपूर्ण दीक्षा है। यह अत्यंत गहन, गंभीर और रहस्यमयी दीक्षा है।
यह गुह्य और गोपनीय दीक्षा उस विशेष व्यक्ति को दी जाती है जो योग-तंत्र परक साधना की एक विशेष अवस्था को उपलब्ध हो गया होता है। जिसके भावशरीर और सूक्ष्मशरीर का अतिक्रमण हो चुका है।
स्पर्श दीक्षा उसी साधक को दी जा सकती है जिसकी पहुँच मनोमय शरीर में हो चुकी है।
शक्तिपात दीक्षा के पहले चार प्रकार की क्रम दीक्षा है--स्पर्श दीक्षा, मनोनिग्रह दीक्षा, योजनिका दीक्षा और वैन्दव दीक्षा।
_इन दीक्षाओं के संपन्न होने पर ही सद्गुरु शिष्य या शिष्या को अंतिम शक्तिपात दीक्षा प्रदान करता है। इसके प्रभाव से साधक के व्यक्तित्व में तत्काल आमूलचूल परिवर्तन हो जाता है।_
शरीर, शरीर नहीं रह जाता। प्राण, प्राण नहीं रह जाता। मन, मन नहीं रह जाता और आत्मा, आत्मा नहीं रह जाती। सभी अपने-अपने स्थान पर नैसर्गिक अवस्था को हो जाते हैं उपलब्ध।
_सारे कर्म-विपाक नष्ट हो जाते हैं और नष्ट हो जाते हैं आणव मल भी उस साधक के। वह साधक फिर साधना- मार्ग पर एक लम्बी छलांग लगाता है, सिद्धियाँ आती हैं पर वे उसे मार्ग से नहीं भटका पाती हैं। वह साधक से योगी, फिर योगी से सिद्ध बन कर साधना-मार्ग के अगले पड़ाव की और अग्रसर होता जाता है।_
एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न और है, वह है--यह दीक्षाएं क्या हैं और कौन किसको प्रदान कर सकता है ? कौन अधिकारी है उस शक्तिपात दीक्षा प्रदान करने के लिए ?
_शक्तिपात दीक्षा एक गूढ़, गम्भीर और गोपनीय दीक्षा होती है जो सद्गुरु अपने योग्य शिष्य को प्रदान करता है। जो लोग साधना के नाम पर ठगे जाते हैं या सिद्धियां प्राप्त करने के नाम पर धोखा पाते हैं, उन्हें यह भली-भांति जान-समझ लेना चाहिए कि कुण्डलिनी-जागरण के नाम पर या चक्र-जागरण के नाम पर जगह-जगह जो साधना-केंद्र खोले गए हैं या ऐसे केंद्र चलाये जा रहे हैं, उनकी वास्तविकता क्या है ? क्या वे साधना कराने के लिए अधिकृत हैं ?_
क्या वे स्वयं में सक्षम हैं अपने शिष्य की कुण्डलिनी जागृत करने के लिए ? क्या उन्हें मालूम है कि मनुष्य के शरीर में कुण्डलिनी की स्थिति कहाँ पर है और मनुष्य के किस शरीर में विद्यमान है ?
_शायद नहीं जानते। अगर जानते होते तो वे इस तरह आडंबर और पाखंड नहीं फैलाते। तथाकथित साधना करने की होड़ में अंधे लोग आर्थिक और बौद्धिक रूप से भ्रम-जाल के शिकार न होते।_
उनकी जानकारी के लिए बता दें कि मनुष्य का स्थूल शरीर ही सब कुछ नहीं होता। स्थूल शरीर तो मात्र माध्यम होता है साधना का। स्थूल शरीर के भीतर भाव शरीर, भाव शरीर के भीतर सूक्ष्म शरीर और सूक्ष्म शरीर के भीतर मनोमय शरीर स्थित है।
_इस तरह शरीरों के कई स्तर हैं। हर शरीर अपने पिछले शरीर के स्तर से अलग है। पुरुष का स्थूल शरीर पौरुषेय है और उसमें धनात्मक विद्युत आवेश है। उसका दूसरा भाव शरीर स्त्रैण शरीर है जिसमें ऋण विद्युत आवेश है। पुरुष का तीसरा शरीर सूक्ष्म शरीर या प्राण शरीर है जो पौरुषेय है और उसमें धन विद्युत आवेश है।_
पुरुष का चौथा शरीर मनोमय शरीर है जिसमें ऋण विद्युत आवेश है और वह स्त्रैण शरीर कहलाता है। मनुष्य का पांचवां शरीर आत्मशरीर है। उसका कोई लिंग नहीं है अर्थात वह न पुरुष है और स्त्री। आत्मा का कोई लिंग नहीं होता।
_इसी प्रकार स्त्री का पहला और तीसरा शरीर स्त्रैण है जिसमें ऋण विद्युत आवेश है और दूसरा तथा चौथा शरीर पौरुषेय है जिसमें धन विद्युत आवेश है। इस प्रकार स्त्री और पुरुष के निचले चार शरीरों में विषमता है।_
साधक पुरुष बिन्दु साधना के रूप में स्त्री के स्थूल शरीर की विद्युत की सहायता से अपने मूलाधार स्थित कुण्डलिनी को जगाने का प्रयास करता है। पुरुष शरीर और स्त्री शरीर की विद्युत मिलकर एक वलय का निर्माण करती हैं जिससे पुरुष के मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी में स्फुरण आरम्भ हो जाता। बस सारा साधना का रहस्य यहीं पर है।
_इस स्थान पर ही सक्षम गुरु के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। क्योंकि शिष्य के साधना के प्रयोजन पर, उद्देश्य पर उसकी सफलता निर्भर है। अगर उसके भीतर स्थित बिन्दु (शुक्र) उत्थान होने की जगह बिन्दु-पतन होता है तो फिर उसका प्रयोजन ही विफल हो जाता है।_
साधक को शुद्ध मन से अपनी साधना सहायिका स्त्री के स्थूल शरीर स्थित ऋण विद्युत आवेश का प्रयोग बिना काम-भावना लाये, बिना कामातुर हुए करना होता है तो बिन्दु उत्थान सम्भव है, अन्यथा बिंदु का पतन निश्चित है।
_बस तथाकथित साधना-केंद्रों पर विधि विधान सम्मत ढंग से उचित मार्गदर्शन में बिन्दु-उत्थान होने के स्थान पर काम-क्रीड़ा ही होती पाई जाती है और ऐसे केंद्र अधिकृत व्यभिचार के अड्डे के रूप में काम करते पाए जाते हैं। यदि उनकी वास्तविक सत्यता की परख के लिए प्रशासन की ओर से रेड डाली जाए तो सारे के सारे साधना केंद्रों में ताले लटक जाएंगे और तथाकथित गुरु और शिष्य अपनी-अपनी दाढ़ी और अपने बाल कटवाने के लिए नाई की दुकानों पर चक्कर काटते पाए जाएंगे।_
यही वास्तविकता है उन तथाकथित साधना केंद्रों की और ऐसे साधकों की।
तांत्रिक पद्धति में बिन्दु साधना है और यौगिक पद्धति में अष्टांग साधना है जिसके अंतर्गत स्थूलशरीर को यम, नियम और आसन की सहायता से शक्तिशाली बनाने का विधान है। प्राणायाम के माध्यम से सूक्ष्मशरीर में विद्युत संचार करके और अंतरंग प्राणायाम से उसे जगाया जाता है।
_प्राणायाम और ध्यान की प्रक्रिया से मनोमय शरीर का जागरण सम्भव है। मनोमय शरीर के जागरण के बावजूद यदि कुण्डलिनी जागरण नहीं हो सका है तो यहां पर सिद्ध व्यक्ति के द्वारा शक्तिपात दीक्षा की आवश्यकता पड़ती है।_
वह अपनी सामर्थ्य से उसके आज्ञाचक्र पर दबाव डालकर शक्तिपात करता है और ऐसा करते ही उसके अंदर एक अनिर्वचनीय अनुभूति के साथ कुण्डलिनी जागरण होता है। फिर क्रम से कुण्डलिनी का उत्थान और क्रमशः चक्र-जागरण की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है।
_जानकारी के लिए बता दूं कि स्त्रियों में कुण्डलिनी नहीं होती है। उनके चक्रों का जागरण अवश्य होता है। लेकिन अधिकांश मामलों में उन्हें धोखे में रखकर उनका शारीरिक और मानसिक शोषण ही होते देखा जाता है।_
*🍃चेतना विकास मिशन*: :





