डॉ. विकास मानव
शराब धीरे धीरे हमें अपनी आत्मा से अलग कर देता है. इसे स्प्रिट भी कहा गया है जो आत्मा के द्वार को धीरे धीरे बंद करती जाती है.
कभी विचार किए हो कि जब भी कोई इसका सेवन करता है तो वो कौन सी अदृश्य ताकत होती है जो सेवन कर्ता को नियंत्रित्त कर रही होती है ?
हमारे पूर्वजों ने शराव को चेतना का शत्रु के रूप में माना है जबकि आज का समाज इसे आनंद का प्रतीक मानने लगा है. तो अब एक विचार उठता है क्या हम एक व्यूह का हिस्सा बन चुके हैं ? एक ऐसा जाल जो हमें भीतर से खोखला कर रहा है और हम खुशी खुशी अपना ही पतन करते जा रहे हैं.
Alc o hol का अर्थ जानते हो ? अल्क ओ होल का अर्थ है एक आत्मा को खाने वाली सूक्ष्म+ सत्ता ! प्राचीन काल में इसका इस्तेमाल आत्मा से जुड़ने या उससे अलग होने के लिए किया जाता था. फिर धीरे धीरे इसका इस्तेमाल तरल के रूप में होने लगा जो चेतन को परिवर्तित कर सके और अंततः श राब का पर्याय बन गया.
हमारे पूर्वज अच्छे से जानते थे कि कुछ पदार्थ आत्मा और शरीर के पवित्र बंधन को निर्बल कर सकते हैं उन्होंने शराव के प्रति चेतावनी भी दी थी. वे जानते थे कि इसका सेवन करते ही ये हमारी चेतना के द्वार पर पर्दा डाल देती है और हमें अदृश्य ऊर्जा के प्रभाव में आने के लिए खोल देती है !
यह हमें निम्न स्तर की ऊर्जा चेतना और भ्रम से जोड़ती है ! इसे पीने से पूर्व एक बार सोचना जरूर की आप इसे पी रहे हैं या कोई पुरानी शक्ति आपकी आत्मा को धीरे धीरे पी रही है .
कल्पन करें हमारी चेतना एक दीप्तिमान दीपक है जोकि हमें संसार से परे देखने को शक्ति देता है. अब जरा गहरे से सोचो कि यदि कोई उस दीपक की लौ को धीरे धीरे बंद करने लगे तो क्या होगा?
यही अदृश्य युदद्ध है जो यह हमारे भीतर छेड़ती है. ये केवल माइंड को सुस्त करने वाला पदार्थ नहीं अपितु यह तो एक ऊर्जा हथि यार है जो सीधे ही हमारी चेतना पर हम्मला करता है.
आभामंडल को भेदता जाता है और आत्मा को “ब्रह्म” से दूर ले जाता है ! विज्ञान् कहता है यह मस्तिष्क के न्यू रो ट्रांस मीटर को प्रभावित करती है सोचने समझने की शक्ति को मद्धिम करती है साथ ही निर्णय लेने की क्षमता को धुंधला कर देती है जबकि हमारे पूर्वज बहुत पहले ही जान चुके थे कि यह हमारी आध्यात्मिक रक्षा प्रणाली जिसे प्राणमय कोस , औरा कहा जाता है उसमें दरारें पैदा करती है और ये दरारें बाहरी नकारात्मक ऊर्जाओं को आमंत्रित करती हैं जो कि हमारी भावनाओं विचारों और कर्मों को प्रभावित करती है.
हमने अक्सर ही देखा होगा इसके सेवन के बाद कुछ लोग अचेत होकर ऐसा व्यवहार करने लगते हैं कि जैसे वो किसी अन्य के नियं त्रण में आ गए हों और वे वो कार्य करने लगते हैं या वो बातें बोलने लगते हैं जो कि सचेत होने पर कभी नहीं करते.
जरा सोचिए कि क्या ये नशे के कारण होता है या कोई अदृश्य सत्ता उनके माध्यम कार्य कर रही होती है. हमे यह जानकारी होना चाहिए कि नशे के समय आत्मा आंशिक रूप से बाहर निकल जाती है और यही वो अवसर होता है जब निम्न स्तर की चेतना प्रवेश कर जाती है.
अब प्रश्न उठता है कि इसके सेवन से अपनी चेतना की रक्षा कर रहे हैं या इसे अदृश्य आक्र मण के लिए खुला छोड़ दिए हैं ? कभी महसूस किया है कि नसे की हालत में व्यक्ति केवल शारीरिक रूप से उपस्थित होता है लेकिन जैसे उसकी आत्मा कहीं और भटक रही हो.
इसी को आत्मिक संबंध टूटना कहते हैं यही वो रहस्यम अवस्था है जहां मन और आत्मा का पवित्र बंधन टूटने लगता है. यह केवल तंत्रिकाओं को ही नहीं छूती अपितु आत्म की गहराइयों तक पहुंचकर अदृश्य दूरी पैदा करती है जो व्यक्ति को उसकी उच्च चेतना से काट देती है.
वास्तविकता यही है कि इसका प्रचार मनुष्य को उसके आत्मिक संबंध से दूर करके उसे अपने नियंत्रण में लेने का एक छलावा मात्र है.
यदि आप अपने आसपास के लोगों को अपने नियंत्रण में लेना चाहते हैं उनपर अपना आधिपत्य चाहते है तो आप उन्हें फ्री में बांट दीजिए.आप पाएंगे कि लोगों का एक बड़ा समूह आपके अधीन आने लगा है. आगे की राज नीति आप सभी अच्छे से जानते हैं.
अब यदि इसे सोमरस का रूप मान इसके सेवन को उचित मानते हैं तो ध्यान दें सोमरस और शराव में भेद है. भगवान शिव ने जिस सोम रस का संकेत दिया है वह भिन्न है. यह उपरोक्त लेख समूह सदस्यों की जानकारी हेतु तैयार किया गया है अतः व्यर्थ प्रवचन से बचें





