
उज्जैन: सिंहस्थ 2028 की तैयारियां जोरों पर हैं. आज आपको लगभग 22 ऐसी सहायक नदियों के बारे में बताते हैं, जिसने एक समय 12 महीने प्रवाहमान बनाए रखने के लिए क्षिप्रा में अपनी धाराओं को समर्पित किया था. तभी क्षिप्रा मोक्षदायिनी भी कहलाई. स्वच्छ बहती क्षिप्रा किनारे सिंहस्थ स्नान होने लगे. हालांकि समय के साथ-साथ अतिक्रमण का शिकार हुई क्षिप्रा की लगभग सभी 22 सहायक नदियां विलुप्त होती गईं और क्षिप्रा सिर्फ बरसाती नदी बन कर रह गई.
विलुप्त हो चुकी नदियों में एक चन्द्रभागा नदी को लेकर आज बात करेंगे जिसे उज्जैन के युवाओं ने महज 2 सालों में खोज कर जिंदा कर दिया. अब सिंहस्थ महाकुंभ में अपने पुराने वैभव के साथ लौट चुकी चन्द्रभागा में भी श्रद्धलुओं के स्नान की मांग उठी है. आज ये चन्द्रभागा जिले के आधा दर्जन गांव के 350 लगभग किसानों के लिए वरदान साबित हुई है.
कहां है ये नदी?
क्षिप्रा की जिस सहायक नदी चन्द्रभागा की हम बात कर रहें हैं वो उज्जैन के धर्मबडला गांव, मोहन पूरा, मुरली पूरा, सदावल होती हुई क्षिप्रा पूरा और गोनसा गांव में मिलती है. 11 किलोमीटर लंबी नदी युवाओं के हौसलों के चलते 8 किलोमीटर तक का मूर्तरूप ले चुकी है. नाले में तब्दील नदी को अपने पुराने वैभव की और लौटाने के कार्य की शुरुआत युवाओं ने 20 मार्च 2022 को निरीक्षण कर की. संभावना तलाशी कि कैसे इस नदी को उसके पुराने वैभव की और लौटाया जा सकता है. युवाओं ने अपने हाथ से ही नदी के उद्गम स्थल से लेकर क्षिप्रा में मिलन तक का नक्शा तैयार किया और फिर साधु संतों की मौजूदगी में 4 अप्रैल 2022 दिन सोमवार को इसका भूमिपूजन किया गया, जो निरंतर 2022 से 2024 तक समय समय पर चलता रहा.

सूखी चन्द्रभागा नदी में आया पानी
कौन हैं युवा, कैसे हुई प्लानिंग?
युवाओं की टीम में यूं तो एक समय के बाद बड़ी संख्या शामिल हो गई. लेकिन सबसे पहला नाम सोनू गहलोत का है जो नगर निगम उज्जैन के पूर्व अध्यक्ष हैं. वर्तमान में खेल मलखंभ के प्रदेश अध्यक्ष हैं. दूसरा नाम क्षीरसागर निवासी पुष्पेंद्र शर्मा का है. तीसरा नाम प्रितम सिंह मेवाड़ा और चौथा नाम दशरथ आंजना पटेल का है. पुष्पेंद्र शर्मा ने बताया, ”पद्मश्री एवं पद्मभूषण सम्मानित अनिल प्रकाश जोशी, राज्यसभा सांसद बाल योगी उमेशनाथ महाराज, महामंडलेश्वर शैलेशानंद गिरी, मुनिशरण दास राघवेंद्र दास, महामंडलेश्वर ज्ञान दास सहित कई सामाजिक लोगों ने नदी के पुनर्जीवित के लिए कार्य की शुरुआत श्रमदान के साथ की. धीरे-धीरे जनता जुड़ी. लगभग 5 से 7 हजार लोगों का हर रोज श्रमदान में सहयोग मिलता रहा.”

चन्द्रभागा नदी का नक्शा
15 नाम तय हुए, 7 दिन का जुटाया पैसा, शुरू हुआ काम
पुष्पेंद्र शर्मा बताते हैं, ”हमने जब चन्द्रभागा नदी के बारे में विचार किया तब हमारे पास 1 रुपए भी नहीं था, बस मन में संकल्प और विश्वास था. 15 नाम हमने तय किये किसी ने 2000 किसी ने 5000 दिए. ग्रामीणों की मीटिंग हुई. 7 दिन में नदी की खुदाई का पैसा जुटाया. 2 जेसीबी 4 डंपर से कितना काम होगा कोई अंजादा नहीं था. लेकिन भगवान का ऐसा आशीर्वाद हुआ, मां चंद्रभागा की ऐसी कृपा हुई 6 पोकलेन, 8 जेसीबी हो गई 30 से 40 डंपर हो गए. हमने 8 किलोमीटर लंबी नदी उसके पुराने वैभव के साथ 2 सालों मे सबके सहयोग से सामने ला दी.”

विलुप्त चन्द्रभागा नदी को युवाओं ने 2 साल में किया जिंदा
350 किसानों को मिला वरदान
खास बात यह है जब खुदाई चालू हुई तो 350 किसान लाभान्वित हुए और आज तक हो रहे हैं. शुरुआत में हर दिन 600 डंपर मिट्टी निकलती, समय के साथ साथ 600 से 1000-1100 की संख्या हो गई डंपरों की. ये मिट्टी उपजाऊ मिट्टी थी जो आस पास के किसानों ने खेतों में डाल ली. जो कच्ची मुरम निकली उसका उपयोग गांव के रास्ते बनाने में खेत के रास्ते बनाने में कर लिया गया. लगभग 350 किसान मोटर लगाकर सिंचाई के लिए आज भी नदी से पानी ले रहे हैं.” पुष्पेंद्र शर्मा एवं प्रितमा मेवाड़ा बताते हैं, ”चन्द्रभागा एक ऐसी नदी जिसमें किसी प्रकार का सरकारी व्यय खर्च नहीं हुआ. यह नदी एक उदाहरण है जिसमें निजी पैसा तो खर्च हुआ लेकिन उसका लाभ भी मिला.”

साधु-संतों ने किया नदी के लिए श्रमदान
2500 पौधे लगाए गए
युवाओं की टीम के सदस्य प्रितम सिंह मेवाड़ा ने बताया, ”वर्ष 2024 के बाद हमने नदी के आस पास बड़ी संख्या में पौधरोपण करना शुरू किया. ये पोधा रोपण एक अभियान बन गया. किसी के जन्मदिन, किसी की स्मृति तो किसी के रिटायरमेंट के उपलक्ष्य में नदी के आस पास पौधा रोपण होने लगा. लगभग 8 किलोमीटर नदी के आस पास हमने 2500 हजार पौधे लगाए जो आज बड़े हो चुके है. नदी के आस पास एक तरह से जंगल बस गया है जहां छोटे छोटे जानवर, पशु पक्षी निवास करने लगे हैं.”
क्या है नदी का इतिहास?
गांव मोहन पूरा के किसान दशरथ आंजना पटेल ने बताया, ”उनके दादाजी स्वर्गीय सेवाराम को 95 वर्ष की उम्र में यानी आज से 90 वर्ष पूर्व ही उनके सपने में सहायक नदी चन्द्रभागा ने उद्गम स्थान के दर्शन दिए थे. उस समय दादाजी के साथियों ने कई प्रयास किये लेकिन संसाधन की कमी की वजह से ज्यादा प्रयास नहीं हो पाए. पानी ऊपर आया लेकिन दोबारा विलुप्त हो गया था. आज हमने दादाजी के प्रयासों को धरातल पर लाने का प्रयास किया जिसमें हमे सफलता मिली है.”
मिट्टी से साधु संत स्नान करते थे
गांव की बुजुर्ग माता ने ETV भारत से चर्चा में बताया, ”जब सिंहस्थ में पेशवाई निकलती थी तो आज के समय में साधु संत क्षिप्रा नदी के श्री रामघाट पर स्नान करते हैं. हमारे भी बुजुर्ग बताते थे कि हमे साथ संत पेशवाई के दौराम गीली मिट्टी से स्नान किया करते थे और वो स्थान चन्द्रभागा नदी का उद्गम स्थान ही है. उस समय खास कर ऋषि पंचमी और पूनम पर स्नान होता था गांव की महिलाएं जाती थी लेकिन सब बंद हो गया समय के हिसाब से आज दौबारा चन्द्रभागा नव दर्शन दिए है बहुत खुशी हैं.
22 सहायक नदियां, जिन्हें नक्शे में क्लस्टर बनाया गया
प्रितम सिंह मेवाड़ा ने बताया, ”हमने हाथ से जो नक्शा तैयार किया उस हिसाब से 22 सहायक नदियों की खोज के लिए क्लस्टर चार्ट भी तैयार किया है. जिनमें पालखंदा, नरवर, दताना-मताना, चंदेसरी, पीलिया खाल, पिंगलानदि प्रथम एवं द्वितीय, साहेबखेड़ी, सुरासा, दुधेस्वर, कागदी कराड़िया, बिहारिया, भूखीमाता, महीदपुर, आलोट, सोमतीर्थ, भंडारिया, विक्रांत भेरव, सिंहस्थ सरोवर, कालभैरव, गुनावा, खलावा, सिपावरा व कई कुवें बावड़ी क्लस्टर के रूप में तय किये गए. अब चन्द्रभागा के बाद बाकियों पर काम किया जाएगा.





