भोपाल। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जितने सहज और सरल है उतने ही परिपक्व राजनेता भी हैं। यही वजह है कि उनके लिए मुश्किल माने जा रहे पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की केन्द्रीय मंत्री रही साध्वी उमा भारती की राजनैतिक घेराबंदी बाली वॉल पर ऐसा स्ट्रोक खेला की उसे मास्टर स्ट्रोक माना जाने लगा है। इस स्ट्रोक की वजह से न केवल उमा भारती बल्कि विपक्षी दल कांग्रेस भी हतप्रभ रह गई है। अब पूरा मामला ही उमा और कांग्रेस के लिए मुसीबत भरा नजर आने लगा है। दरअसल शराबबंदी के मुद्दे के सहारे साध्वी के साथ ही कांग्रेस भी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की तैयारी में थी, लेकिन होता अब इसके उलट दिख रहा है। यह स्ट्रोक भी ठीक मुद्दे की ही तरह पूरी तौर पर राजनीतिक स्तर से खेला गया है। इस वजह से उसकी दिशा ही बदल गई है। चौहान ने नशामुक्ति के लिए उनकी हां में हां मिलाते हुए इस मामले में सामाजिक चेतना का आह्वान कर दिया, जिसकी वजह से शिव सरकार के खिलाफ पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती द्वारा की गई घेराबंदी की तैयारी और कांग्रेस की लामबंदी बेदम नजर आना शुरू हो गई है।
इस मास्टर स्ट्रोक से भाजपा ने यह भी संदेश दे दिया है कि उमा भारती पार्टी लाइन के खिलाफ नहीं, बल्कि नशामुक्ति के लिए उनके साथ ही खड़ी हैं। गौरतलब है कि हाल ही में साध्वी ने शराबबंदी के लिए अपनी ही सरकार के खिलाफ जाने के संकेत देते हुए आठ मार्च से अभियान चलाने का एलान करते हुए इस मामले में मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इसे लागू करने के लिए नैतिक दबाव बनाने का प्रयास किया था। इस मामले में कांग्रेस ने भी समर्थन करते हुए उमा भारती के साथ खड़ा होने के संकेत दे दिए थे। दरअसल इसके पीछे कांग्रेस की मंशा सरकार पर दबाव बनाना था। इस मामले में सियासी तौर पर शिव सरकार मुश्किल में पड़ती नजर आने लगी थी। खास बात यह है कि सरकार की मुश्किलें शिवराज सरकार के ही गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा और आबकारी मंत्री जगदीश देवड़ा के बयानों की वजह से अधिक बढ़ती नजर आने लगी थीं। मिश्रा ने यह कहकर कि आबादी के मुताबिक शराब की दुकानें कम हैं, इन्हें बढ़ाना चाहिए, इससे राजस्व बढ़ेगा। देवड़ा ने विभागीय मंत्री के नाते उमा और शिव की जगह सामंजस्य वाला बयान देते हुए पूरा मामला उच्च स्तर के लिए छोड़ दिया था। यहां बता दें कि शराबबंदी का मामला जोर पकड़ता इसके पहले ही मुख्यमंत्री चौहान ने उमा भारती और कांग्रेस के राजनीतिक अस्त्र की काट के तौर पर स्पष्ट बयान देते हुए कहा कि प्रदेश को नशामुक्त करने का संकल्प हम पूरा करके रहेंगे। दरअसल, चौहान ने एक दशक से सत्ता की बागडोर संभालने के दौरान शराब की एक भी नई दुकान नहीं खुलने दी। यही नहीं उनके द्वारा नर्मदा नदी और पवित्र नगरों से शराब दुकानें हटवाई गईं।
यही नहीं उनके द्वारा नशामुक्ति के लिए अधिकारियों को जिला स्तर पर योजना तैयार करने के भी निर्देष दे दिए गए हैं। इसके लिए उनके द्वारा कहा गया है कि इसमें जिले की सामाजिक, आर्थिक सहित अन्य गतिविधियों को भी समाहित किया जाएगा। इसके साथ ही उनके द्वारा सामाजिक संगठनों, ग्राम पंचायतों सहित विभिन्न संस्थाओं को नशा मुक्ति अभियान में शामिल होने का आह्वान भी कर दिया गया। दरअसल भारती प्रदेश की सक्रिय राजनीति में लंबे समय से आने का प्रयास कर रही हैं। सरकार व संगठन उन्हें मप्र से दूर रखने के पक्ष में है। यही वजह है कि उन्हें बीते लोकसभा चुनाव के पहले चुनाव में उप्र की झांसी से लोकसभा का चुनाव संगठन द्वारा लड़ाया गया था, जबकि इसके पहले उन्हें उप्र की ही चरखारी सीट पर चुनाव लड़ने के लिए भेजा गया था।
शराब से 15 हजार करोड़ की आय
दरअसल प्रदेश में सरकार की आय का प्रमुख स्रोत शराब ही है। इससे इस साल ही 15 हजार करोड़ रुपए की आय हुई है। अगर सरकार इसे पूरी तरह से प्रतिबंधित करती है तो पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रही सरकार का संकट गंभीर हो जाएगा। कोरोना संक्रमण की वजह से पहले ही खाली चल रहे सरकारी खजाने की हालत बहुत ही गंभीर बनी हुई है। यही वजह है कि सरकार को हर माह कर्ज दर कर्ज लेकर अपना कामकाज चलाना पड़ रहा है। शायद यही वजह है कि सरकार द्वारा हर साल नशा मुक्ति अभियान के बजट में कटौती करनी पड़ रही है। चालू वित्त वर्ष में नशा मुक्ति अभियान के खर्च के लिए सरकार ने बजट को कम कर महज 73 लाख रुपए तक सीमित कर दिया है। अगर इस बजट की तुलना वर्ष 2017-18 से की जाए तो यह 18 करोड़ 28 लाख कम है। खास बात यह है कि अब से पांच साल पहले 2015-16 में नशा मुक्ति अभियान का बजट जहां 3.75 करोड़ रुपए था, जो इस साल 73 लाख ही कर दिया गया है। अगर शराब की दुकानों की तुलना अन्य राज्यों से की जाए तो प्रदेश में अन्य राज्यों की तुलना में शराब दुकानों की संख्या बहुत कम है। सरकार के मुताबिक प्रदेश में एक लाख की आबादी पर महज चार शराब दुकानें हैं, जबकि राजस्थान में इतनी ही आबादी पर 17दुकानें हैं महाराष्ट्र में इनकी संख्या 21 और उप्र में 12 है।
प्रशासन नहीं लेता है रुचि
नशामुक्ति के लिए सरकार द्वारा हर साल बजट में राशि तो दी जाती है , लेकिन प्रशासन इस मामले में रुचि ही नहीं लेता है, जिसकी वजह से लगभग हर साल मिलने वाला बजट खर्च ही नहीं किया जाता है। इसका उदाहरण है वर्ष 2018-19 में 11 करोड़ के एवज में महज दो करोड़ रुपए ही खर्च करना। इसी तरह से 19-20 में 2 करोड़ 72 लाख का बजट दिया गया था, लेकिन इसमें से एक करोड़ 9 लाख रुपए ही खर्च किए गए।





