अग्नि आलोक
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हमारी अंतर्मैथुन और अर्धनरीश्वर अवस्था का प्रतीक है शिवलिंग

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डॉ. विकास मानव 

        _शिव की प्रतिमा का निर्माण शिवलिंग के रूप में हुआ है। शिव को, जैसा कि हम सभी जानते हैं, अर्धनारीश्वर कहा जाता है।_    

         अर्धनरीरश्वर का अर्थ है–आधा रूप नारी का और आधा रूप पुरुष का। जो लोग जीवन के परम रहस्य को जानना चाहते हैं, उन्हें शिव के व्यक्तित्व को गहराई से समझना होगा। हमने सब देवताओं को ‘देवता’ कहा है लेकिन शिव को ‘महादेव’ कहा है।

         इसके पीछे  कई कारण हैं क्योंकि उनकी कल्पना में हमने अध्यात्म की दृष्टि से जीवन का सम्पूर्ण सार छिपा दिया है और छिपा दिया है सम्पूर्ण रहस्य भी।

       ‘अर्धनारीश्वर’ के स्वरूप को समझने के लिए हमें अपना सांसारिक दृष्टिकोण बदलना पड़ेगा। यह संसार, यह सृष्टि जैसा कि हम सभी जानते हैं कि मिथुनात्मक है, दो लोगों (स्त्री-पुरुष) के मिथुनात्मक संसर्ग का परिणाम है, मैथुन का प्रतिफल है।

         यह स्त्री-पुरुष का मैथुन जब अपने चरमोत्कर्ष  पर पहुंचता है, उस पल पुरुष का आधा व्यक्तित्व स्त्री का हो जाता है, उसकी आधी ऊर्जा पुरुषतत्व की और आधी ऊर्जा स्त्रीतत्व की हो जाती है और उन दोनों की विपरीत ऊर्जाओं के आंतरिक मिलन से जो लीनता घटित होती है और जो रस उत्पन्न होता है, उससे शक्ति का विसर्जन नहीं होता, बल्कि उत्थान होता है।

         जगत् यह द्वन्द्व से निर्मित है, इसलिए व्यक्ति जब भी होगा, दो होगा। व्यक्ति स्त्री को बाहर खोज रहा है, इसलिए अपने भीतर की स्त्री का ज्ञान या अनुभव नहीं है उसे। स्त्री खोज रही है बाहर पुरुष को क्योंकि उसे भी अपने भीतर के पुरुष का न ज्ञान है और न तो है अनुभव ही।

         जिस समय भीतर के स्त्री-पुरुष का मिलन हो जाता है, उसी क्षण से बाहर किसी की खोज समाप्त हो जाती है। दूसरा कोई बचता ही नहीं। द्वंद्व समाप्त हुआ, निर्द्वन्द्व हो गए। द्वैत का अस्तित्व समाप्त हुआ और अद्वैत की स्थिति आ गयी। ‘अद्वैत’ का अर्थ है–परम आलिंगन।

       ऐसा जो साधक है, वह शिवलिंग स्वरूप है। वह अपने भीतर वर्तुलाकार रूप में पूर्ण हो गया होता है। वह अपने भीतर के रस का आनंद लेने लगता है उसके भीतर ही चलने लगता है निरंतर आत्मरमण।

       इसी अवस्था को कहते हैं–‘स्वसंभोग’ स्वयम् के भीतर के स्त्री-पुरुष का संभोग। इस संभोग की परम अवस्था में ऊर्जा बाहर नहीं निकलती, बल्कि भीतर ही वर्तुलाकार घूमती रहती है और उस वर्तुलाकार ऊर्जा का स्वरूप अर्घायुक्त शिवलिंग है, आत्मरमण की निरन्तर घटित होती हूई अवस्था का स्वरूप है–अर्धनारीश्वर और अर्धनारीश्वर का प्रतीक है–अर्घायुक्त शिवलिंग।

*शिवलिंग संबंधी वैज्ञानिक बात :*

        भारत का रेडियोएक्टिविटी मैप उठा ले हैरान हो जायेंगे भारत सरकार के न्युक्लियर रियेक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगो के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडियेशन पाया जाता है !

     _शिवलिंग ओर कुछ नहीं बल्कि न्युक्लियर रिएक्टर्स ही तो है तभी तो उस पर जल चढाया जाता है ताकि वो शांत रहे._

      बिल्वपत्र, आक, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्युक्लियर एनर्जी सोखने वाले हैं. शिवलिंग पर चढा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है. इसलिए जल निकासी नलिका को लाँघा नही जाता.

      भाभा एटाॅमिक रिएक्टर का डिजाइन भी शिवलिंग की तरह ही है. शिवलिंग पर चढाया जल नदी के बहते जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है.

       भारत में ऐसे महत्वपूर्ण शिव मंदिर है जो “केदारनाथ” से लेकर “रामेश्वरम” तक एक ही सीधी रेखा में बनाये गए हैं , आश्चर्य है कि हमारे पूर्वजो के पास ऐसा कैसा विज्ञान और तकनीक थी जिसे हम आज तक नहीं समझ पाये ? 

        उत्तराखंड का “श्री केदारनाथ” तेलंगाना का “कालेश्वरम” आंध्रप्रदेश का “कालहस्ती” तमिलनाडु का “एकंबरेश्वर” चिदंबरम और अंततः “रामेश्वरम” मंदिरो को 79°E 41’54” Longitud की भोगोलिक सीधी रेखा में बनाया गया है !

        यह सारे मंदिर प्रकृति के 5 तत्वों में लिंग की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसे हम आम भाषा में पंचभूत कहते हैं, पंचभूत यानि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और अंतरिक्ष, इन्हीं पाँच तत्वों के आधार पर इन पाँच शिवलिगों को प्रतिष्ठापित किया गया है!

          जल का प्रतिनिधित्व तिरूवनैकवल मंदिर में है ,आग का प्रतिनिधित्व तिरूवन्नमलई में है , हवा का प्रतिनिधित्व कालाहस्ती में है, पृथ्वी का प्रतिनिधित्व कांचीपुरम में है, और अंत में अंतरिक्ष का प्रतिनिधित्व चिदंबरम मंदिर में है, वास्तु -विज्ञान – वेद के अदभुत समागम को दर्शाते हैं ये पाँच मंदिर!

          भौगोलिक रूप से भी इन मंदिरो में विशेषता पाई जाती है, इन पाँच मंदिरो को योग विज्ञान के अनुसार बनाया गया था और एक दूसरे के साथ एक निश्चित भौगोलिक संरेखण में रखा गया है, इस के पीछे निश्चित ही कोई विज्ञान होगा जो मनुष्य के शरीर पर प्रभाव करता होगा !

         इन मंदिरो का करीब पाँच हजार वर्ष पूर्व निर्माण किया गया था जब उन स्थानों के अक्षांश और देशांतर को मापने के लिए कोई उपग्रह तकनीक उपलब्ध ही नहीं था तो फिर कैसे इतने सटीक रूप से पाँच मंदिरो को प्रतिष्ठापित किया गया था? उत्तर भगवान ही जाने!

         केदारनाथ और रामेश्वरम के बीच 2383 किमी की दूरी है लेकिन ये सारे मंदिर लगभग एक ही समानांतर रेखा में पडते हैं ! आखिर हजारों वर्ष पूर्व किस तकनीक का उपयोग कर इन मंदिरो को समानांतर रेखा में बनाया गया है यह आज तक रहस्य ही है.

        श्रीकालहस्ती मंदिर में टिमटिमाते दीपक से पता चलता है वह “वायु लिंग” है तिरूवन्निका मंदिर के अंदरुनी पठार में जल बसंत से पता चलता है कि यह “जल लिंग” है . अन्नामलाई पहाडी पर विशाल दीपक से पता चलता है कि वह “अग्नि लिंग” है . कांचीपुरम के रेत के स्वयंभू लिंग से पता चलता है कि वह “पृथ्वी लिंग” है . और चिदंबरम की निराकार अवस्था से भगवान की निराकारता यानि “आकाश तत्व” का पता चलता है !

         अब यह आश्चर्य की बात नहीं तो और क्या है कि ब्रह्मांड के पाँच तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले पाँच लिगों को एक समान रेखा में सदियों पूर्व ही प्रतिष्ठापित किया गया है ! हमें हमारे पूर्वजो के ज्ञान और बुद्धिमत्ता पर गर्व होना चाहिए कि उनके पास ऐसी विज्ञान और तकनीक थी जिसे आधुनिक विज्ञान भी नहीं भेद पाया है.

          माना जाता है कि केवल यह पाँच मंदिर ही नहीं अपितु इसी रेखा में अनेक मंदिर होंगे जो “केदारनाथ” से “रामेश्वरम” तक सीधी रेखा में पडते हैं, इस रेखा को “शिवशक्ति अक्श रेखा” भी कहा जाता है ! संभवतया यह सारे मंदिर”कैलाश”  को ध्यान में रखते हुए बनाये गये हो जो 81.3119° E में पडता है !

     वैदिक साहित्य में म.प्र के उज्जैन को पृथ्वी का केंद्र कहा गया है. इसलिए उज्जैन में सूर्य की गणना के लिए मानव निर्मित यंत्र भी बनाये गये हैं, करीब 2050 वर्ष पहले.  जब करीब 100 साल पहले पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा ( कर्क)  अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनायी गई तो उनका मध्य भाग उज्जैन ही निकला.

      आज भी वैज्ञानिक उज्जैन ही आते हैं सूर्य और अंतरिक्ष की जानकारी के लिए।

Ramswaroop Mantri

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