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*’शिवराज-कैलाश’…अदावत बरक़रार*केंद्रीय मंत्री सिंधिया और पूर्व लोकसभा स्पीकर के साथ बनाया ‘गठबंधन’, मनमाफ़िक सफ़लता हाथ नही लगीं*  

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*_विजयवर्गीय विरोधी गुट के पक्ष दिल्ली में मोर्चा संभाले हुए थे ‘ जगत मामा’_

 _संगठन के केंद्रीय नेतृत्व समक्ष ज़िले में अध्यक्ष पद पर बदलाव की पैरवी करते रहें पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज_  *_केंद्रीय मंत्री सिंधिया और पूर्व लोकसभा स्पीकर के साथ बनाया ‘गठबंधन’, मनमाफ़िक सफ़लता हाथ नही लगीं_*  _दिल्ली जाने के बाद भी पूर्व मुख्यमंत्री की विजयवर्गीय से अदावत जारी, सिंधिया को साथ ले करी घेराबंदी_  *_ज़िले की राजनीति में ‘ सिखाये पूत’ की भूमिका में अपना बड़ा नुकसान कर बैठे मंत्री सिलावट, मनोज को भी लगा झटका_* 

 _*शिवराज-कैलाश के बीच की तल्ख़ी हैं कि कम होने का नाम ही नही ले रहीं। ज़िले के अध्यक्ष पद जैसी ‘ छोटी ‘ बात पर भी ये तल्ख़ी छुप नही पाई। प्रदेश सरकार में मंत्री या प्रदेश अध्यक्ष जैसा कोई मामला होता तो समझ भी आता। लेकिन इंदौर भाजपा की कप्तानी जैसी बात पर विजयवर्गीय को उनके ही ‘ घर’ में ‘ घेरने’ के लिए ‘ जगत मामा’ ने ‘ श्रीमंत’ का साथ भी जुटा लिया और ‘ ताई-भाई’ की लड़ाई को फिर से ‘ जीवित ‘ भी कर दिया। सफ़लता फ़िर भी पूर्णरूपेण हाथ नही आई। सिवाय विजयवर्गीय का ब्लडप्रेशर ऊपर नीचे करने और इंदौर का फ़ैसला सबसे अंत तक खिंचाने के अलावा इस घेराबंदी का कोई लाभ नही मिल पाया। उलटे इस बात का ख़ुलासा भी हो गया कि भविष्य में विजयवर्गीय की राह में प्रदेश से जुड़े कौन तीन बड़े नेता आड़े आएंगे।*_ 

किसी ज़माने के अभिन्न मित्र शिवराज सिंह चौहान और कैलाश विजयवर्गीय के बीच अदावत अब भी बरक़रार हैं। यह अदावत पूर्व मुख्यमंत्री की दिल्ली की नई भूमिका के बाद भी कम नही हुई हैं। इस अदावती का ख़ुलासा इंदौर ज़िले में करीब डेढ़ महीनें चली ज़िले व शहर के अध्यक्ष पद की लड़ाई से हुआ। लंबी चली इस लड़ाई का कारण ही ये रहा कि दिल्ली में शिवराजसिंह ने ही विजयवर्गीय विरोधी खेमे के पक्ष में मोर्चा संभाल रखा था। केंद्रीय संगठन के समक्ष ‘इंदौर की बात’ वे ही रख रहें थे। 

 *इस काम के लिये पूर्व मुख्यमंत्री ने वैसे ही दिल्ली में भी ‘ गुट’ बना लिया था, जैसा उनके ‘इशारे ‘ पर इंदौर में विधायकों के एक गुट ने डॉ मोहन यादव के सत्तानशीन होते ही बना रखा हैं। दिल्ली में कैलाश विजयवर्गीय विरोधी खेमे को मजबूती देने के लिए उन्होंने ताज़ा ताज़ा भाजपा में आये केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी साथ लिया। इस कारण अध्यक्ष की लड़ाई न सिर्फ लंबी चली, बल्कि सबसे आख़िर में ही अपने इंदौर का फ़ैसला हो पाया।* 

जगत मामा यही नही रुके। उन्होंने दिल्ली में अपनी बात में वजन बढ़ाने के लिए शहर की आठ बार की सांसद व पूर्व लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन का भी साथ लिया था। ‘ ताई-भाई’ की पुरानी लड़ाई को जीवित करते हुए जगत मामा ने घर बैठी वयोवृद्ध नेता को भी दांव पर लगाया। ताई ने ‘ वीटो’ भी लगाया। बावजूद इसके ‘ मामा गुट ‘सफ़लता मनोनुकूल नही मिल पाई। ज़िले में बदलाव तो हुआ लेक़िन मनोनुकूल नही हो पाया। शहर कैलाश विजयवर्गीय के पाले में ही आया। ज़िले में भी ऐसा अध्यक्ष सामने आ गया, जिसकी रत्तीभर भी कल्पना न शिवराज ने की थी, न ‘ बड़े गांव ‘ के मौजूदा विधायक ने की थी। 

 *इस लड़ाई में घर बैठे ही बड़ा नुकसान मन्त्री तुलसी सिलावट का भी हो गया जो अब तक टकराव की राजनीति से सदैव दूर रहते आये। चाहे फ़िर वो पुराना दल कांग्रेस हो या नई भाजपा। लेक़िन ‘ पहलवान’ को भी अपने ‘ श्रीमंत’ के लिये वो करना पड़ा, जो वे कम से कम ‘ कैलाश कैम्प ‘ के साथ तो कभी करते नहीं। ज़िले की इस लड़ाई का असर ‘ 2028 ‘ में कम से कम सांवेर में तो साफ़ नज़र आना तय हैं। असर देपालपुर-महू में भी होगा।* 

मामला चिंटू वर्मा को पुनः जिलाध्यक्ष बनाने से जुड़ा हुआ था। वर्मा का दांवा प्रदेश भाजपा की संगठन चुनाव की उस नीति के तहत था, जिसमे तय हुआ था  कि ऐसे जिलाध्यक्ष बदले नही जाएंगे, जिनकी नियुक्ति को सालभर नही हुआ। चिंटू इसी सालभर कोटे में थे। लिहाज़ा उनका बनना लगभग तय था लेक़िन अकस्मात ज़िले में चिंटू का विरोध उभर आया, जो रायशुमारी तक नेपथ्य में था। मंत्री सिलावट को इसका अगुवाकार करार दिया गया। तब किसी को भरोसा नही हुआ। क्योंकि मंत्री सिलावट का तालमेल ‘ कैलाश कैम्प ‘ बेहतर व मजबूत था।

 *देखते ही देखते सिलावट के साथ जिले के दो अन्य विधायकों का साथ भी जुड़ गया। देपालपुर विधायक मनोज पटेल का जुड़ना स्वभाविक था। उनकी पटरी विजयवर्गीय से शुरू से नही बैठी। ऐसा ही महू विधायक उषा ठाकुर का नाता विजयवर्गीय से रहा। लिहाज़ा ज़िले के तीनों विधायक चिंटू के विरोध में क़रार दे दिए गए। इस ‘ बेक़रारी’ की पैरवी पूर्व मुख्यमंत्री चौहान ने दिल्ली में संभाल ली और वे इस विरोध को केंद्रीय संगठन के अहम नेता की चौखट तक ले पहुँचे। बताया गया कि जब विधायक नही चाह रहे तो फ़िर चिंटू की ज़िद क्यों? ये तर्क असरकारी रहा और विजयवर्गीय विरोध रंग ले आया। लेक़िन ये रंग आंशिक ही रहा।* 

Ramswaroop Mantri

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