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*लघुकथा: “एक स्कूल की आखिरी चिट्ठी”*

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✍️ लेखक: तुलाराम अठ्या

राजस्थान के झालावाड़ ज़िले के मनोहरथाना ब्लॉक का एक छोटा-सा गाँव – पीपलोदी। वहीं एक जर्जर-सी सरकारी स्कूल की पुरानी बिल्डिंग खड़ी थी, जो बरसों से बच्चों की किलकारियों की साक्षी रही थी। दीवारों की दरारें और छत से टपकता पानी उसकी उम्र और उपेक्षा की गवाही देते थे, फिर भी वह हर दिन अपने बच्चों को बाहें फैलाए बुलाती थी।

इसी स्कूल की छत तले रवि, असलम, रानी और कमला जैसे न जाने कितने बच्चों ने सपनों के बीज बोए थे। गणित के सवाल, विज्ञान की पहेलियाँ और इतिहास की कहानियाँ, सब कुछ उसकी दीवारों में बसते जा रहे थे। स्कूल को लगता था कि वह कोई साधारण इमारत नहीं, बल्कि ज्ञान का एक मंदिर है, जहाँ हर बच्चा उसका पुजारी था।

लेकिन वक्त बेरहम था। सरकारी सर्वे रिपोर्ट में उसे “जर्जर भवन” कहकर सूची में डाल दिया गया। एक मामूली इमारत समझकर उसे न मरम्मत मिली, न देखरेख। और फिर एक दिन… जब आसमान में बादल गरज रहे थे और बच्चे बारिश में भीगते हुए कक्षा में घुसे थे… तभी एक गहरी आवाज़ के साथ स्कूल ढह गया।

छह नन्हे सपने हमेशा के लिए मलबे में दफन हो गए।

और फिर सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक चिट्ठी — “प्रिय बच्चों…”

कोई नहीं जानता ये चिट्ठी किसने लिखी। शायद किसी पत्रकार ने, या किसी मासूम छात्र ने, या शायद खुद उस स्कूल की आत्मा ने – जो अब इतिहास बन चुकी थी।

उस चिट्ठी में स्कूल ने कहा था — “जब यह पत्र तुम तक पहुंचेगा, तो शायद मैं इस दुनिया में नहीं रहूँगा…”

स्कूल ने बच्चों से माफी मांगी, उनसे प्रार्थना की कि वह कभी किसी छुट्टी के दिन गिरे ताकि किसी को चोट न पहुंचे। उसने बच्चों की मुस्कान को अपनी ताक़त बताया, और अपनी टूटन को उनकी टूटती उम्मीदों से जोड़ा।

चिट्ठी में स्कूल ने सवाल भी उठाया — “क्या मंत्रीजी के 200 करोड़ रुपए हम जैसे हज़ारों स्कूलों के लिए काफ़ी होंगे? जब मंत्रियों के दफ़्तरों पर करोड़ों लगते हैं, तब हमारे लिए कुछ क्यों नहीं?”

लोग रोए, आहत हुए, कुछ ने पोस्ट शेयर की, कुछ ने कैंडल मार्च किया।

फिर क्या हुआ? कुछ बिल्डिंगों की प्लास्टरिंग हो गई, कुछ के नाम बदले गए। लेकिन पीपलोदी का वह स्कूल अब इतिहास में दर्ज था – बच्चों के खून से सना हुआ, सरकार की उदासीनता का गवाह बना हुआ।

और कहीं दूर, किसी गांव में बैठा एक बच्चा आज भी अपनी नई किताब के पहले पन्ने पर अपने पुराने स्कूल का नाम लिखता है, और दीवार पर टंगी उस चिट्ठी को पढ़ता है – जिसे एक ढहती हुई इमारत ने अपने बच्चों के नाम छोड़ा था।

यह सिर्फ एक इमारत की चिट्ठी नहीं थी, यह चेतावनी थी – उन सबके लिए जो जर्जर होते स्कूलों को सिर्फ रिपोर्टों की सूची समझते हैं।

✒️ लेखक: तुलाराम अठ्या

(सामाजिक कार्यकर्ता, लघुकथाकार और बाल अधिकारों के समर्थक)

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