अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

अपने गिरेबान में भी झांक लेना चाहिए?

Share

शशिकांत गुप्ते

बहुत से लोग “व” वर्णाक्षर का उच्चारण “ब” करते हैं। जैसे वापस को बापस, वजन को बजन वगैराह।
आचार्य विनोबाजी ने एक बार अपने वक्तव्य में व्यंग्यात्मक रूप से कहा, मैं वक्ता नहीं हूं,बकता हूं।
आश्चर्यजनक किंतु सत्य घटना घटित हुई। जिस व्यक्ति को पहले ही नादान नासमझ की उपाधि बतौर उलहाने की प्रदान की है।
उसी व्यक्ति के द्वारा परदेश में दिए गए एक वक्तव्य पर विश्व के सबसे बड़े सियासी दल का दंभ भरने वालों ने बवाल मचा दिया है।
बहस सुमति को दर्शाता है,और बवाल करना कुमति होती है।
बावल मचाकर जिस व्यक्ति से माफी मांगी जा रही है,वह व्यक्ति शायर अकबर इलाहाबादी का यह शेर पढ़ रहा है।
हम तो आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

इतना ही लिख पाया था कि अचानक मेरे व्यंग्यकार मित्र सीतारामजी का आगमन हुआ।
सीतारामजी ने सलाह दी,इस मुद्दे पर इतना सब लिखने की आवश्यकता नहीं है।
सन 1956 में प्रदर्शित फिल्म जागते रहो यह गीत लिख दो।रेडिमेड व्यंग्य हो जाएगा।
इस गीत को लिखा है,गीतकार प्रेम धवन
ऐवें दुनिया देवे दुहाई झूठा पांवदी शोर
अपने दिल ते पूछ के देखो कौन नहीं है चोर
ते कि मैं झूठ बोलया कोई न
ते कि मैं कुफ्र तोलिया कोई ना
ते कि मैं ज़हर घोलिया कोई ना
भई कोई ना भई कोई ना
हक़ दूजे दा मार-मार के बणदे लोग अमीर
मैं ऐनूं कहेंदा चोरी दुनिया कहंदी तक़दीर
वेखे पंडित ज्ञानी ध्यानी दया-धर्म दे बन्दे
राम नाम जपदे खान्दे गौशाला दे चन्दे
सच्चे फाँसी चढ़दे वेखे झूठा मौज उड़ाए
लोक कैहंदे रब दी माया मैं कहंदा अन्याय

( कुफ्र अर्थ कृतघ्नता)

उपर्युक्त गीत गीतकार ने फिल्म के लिए लिखा है। लेखक ने सिर्फ उद्धृत किया है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें