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तो वह कौवा कितने लोगों का पितर बन गया

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  • मधुकर पवार

 आज सोशल मीडिया पर एक वीडियो देखकर बहुत हैरानी हुई। वीडियो में एक व्यक्ति कौवा को लेकर बैठा है और कुछ लोग अपने घर से प्लेट में पकवान सजा कर लाए हैं। वे बारी – बारी से कौवा को भोग लगा रहे हैं। कौवा प्लेट में भोजन पर चोंच नहीं डालता तो कौवा का  मालिक उसकी गर्दन पकड़कर भोग के पास चोंच ले जाता है। इस तरह  पितरों को उनकी मनपसंद का भोजन कराने की रस्म पूरी की जा रही है। यहां यह प्रश्न खड़ा होता है कि एक कौवा को कई लोग भोजन करवा रहे हैं तो वह कौवा कितने लोगों का पितर बन गया है। 

 कुछ सप्ताह पहले ही नागपंचमी का त्यौहार मनाया गया। नागपंचमी के अवसर पर सांप / नाग को दूध पिलाने का परम्परा है।  वैज्ञानिक / विशेषज्ञ कहते हैं कि सांप दूध नहीं पीता है। जब इसकी जानकारी नहीं थी, तब सांप को दूध पिलाने की होड़ सी लगी रहती थी लेकिन उन्नत वैज्ञानिक युग में अभी भी नागपंचमी के दिन चोरी – छुपे दूध पिलाने की प्रथा जारी है। हालांकि सरकार ने नागपंचमी के दिन सांप को दूध पिलाने पर प्रतिबंध लगा रखा है। यदि कोई संपेरा सांप को लिए पकड़ा जाता है तब वन विभाग के कर्मचारी सांप को छुड़ाकर जंगल में छोड़ देते हैं।

 आगामी कुछ दिनों बाद दशहरा का त्यौहार भी धूमधाम से मनाया जाएगा। दशहरा के दिन नीलकंठ को देखना शुभ माना जाता है। कई लोग नीलकंठ को देखने के लिए शहर से दूर जंगलों की ओर भी जाते हैं। उन्हें नीलकंठ दिखता है या नहीं, यह अलग बात है लेकिन  कितने लोग हैं जो नीलकंठ को पहचानते हैं। अब इस साल हो सकता है  कुछ लोग नीलकंठ को पकड़ कर ले आएं और दशहरा के दिन दर्शन करवा कर उसका शुल्क वसूलें। वैसे व्हाट्सएप पर तो दशहरा के दिन सुबह से ही नीलकंठ आभासीय दुनिया से मोबाइल पर प्रकट हो जाते हैं, दर्शन देते हैं। लेकिन पितृ पक्ष में कौवा को पकड़कर उसे पितरों को भोजन करने का व्यवसाय भी शुरू हो गया है, उसी तरह नीलकंठ को भी लोग पकड़ कर लाएं और उसके दर्शन करा कर एक नए व्यवसाय की शुरुआत कर दें।

 आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई) का जमाना है। समाचार पढ़ने  के लिए न्यूज़ चैनल एआई एंकर की मदद लेने लगे हैं। नई दिल्ली में इंडिया गेट पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा के स्थान पर होलोग्राम से मूर्ति भी दिखाई जा चुकी है। मैं करीब डेढ़ महीने पहले उज्जैन गया था। महाकाल लोक में दूरबीन जैसा यंत्र के साथ कुछ लोग महाकाल के दर्शन करा रहे थे।  इसके एवज में कुछ राशि भी ले रहे थे। देखने वालों ने बताया कि हमें ऐसा लगता है जैसे हम महाकाल के सामने ही खड़े हैं।

आने वाले वर्षों में पितरों को दिखाने के लिए बुकिंग शुरू हो जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं, एआई की मदद से पितरों को भोजन कराने का अहसास भी कराया जा सकता है,  इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलने का भी आभास हो जाएगा। यदि ऐसा होने लगेगा तो पुरानी मान्यताएं ध्वस्त हो जाएगी और अभी कौवा को थोड़ी भौत पूछ परख होती है, वह भी समाप्त हो जाएगी। इससे केवल प्रथा समाप्त होने  की आशंका नहीं है बल्कि कौवा की प्रजाति पर भी संकट उत्पन्न हो जाएगा। वैसे संकट तो अभी भी है कई पक्षियों की प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है और इसके जिम्मेदार हम ही हैं।

गांव में  किसानों के यहां कोई जानवर मर जाता था तो उसे किसी खुले स्थान पर रख देते थे। कुछ ही देर में बड़ी संख्या में गिद्ध आ  जाते थे और कुछ घंटे में केवल हड्डियों का ढांचा ही बचा रहता था।  लेकिन अब य्व गिद्ध कहां चले गए कुछ पता नहीं ।इनकी संख्या  इतनी कम हो गई है कि गिद्धों की प्रजाति विलुप्त होने की कगर पर पहुंच गई है। मुझे याद है गांव में पितृपक्ष के दौरान पितरों को तिथि के अनुसार पकवान बनाकर घर के ऊपर कवेलु पर रख देते थे। पितरों का  आह्वान करते थे तो कौवे कांव – कांव करते हुए आते थे और कवेलू पर डाले गए भोजन को बड़े चाव से खाते थे। वे कौवे पूरी तरह से काले न होकर स्लेटी रंग के हुआ करते थे। यह कोई 45 50 साल पहले की बात  है लेकिन अब गांव में भी कौवों का अकाल सा पड़ गया है। कौवों की संख्या काफी कम हो गई है। सुबह-सुबह कांव-कांव की आवाज से पूरा खेत खलियान और गांव गुंयजायमान होता था। अब यदा कदा ही कौवा  की आवाज सुनाई देती है ।

बहरहाल समय के साथ सुविधा भी बदल रही हैं । अभी तो कौवे मिल रहे हैं। भले ही घर पर पितरों को लगाए जाने वाले भोग को ग्रहण  करने कम आ रहे हैं इसलिए एक ही कौवा अनेक पितरों का भोग ग्रहण कर रहा है। भविष्य में एआई तकनीक के जरिए सीधे पितरों को ही भोग लगाए जाने लगेगा, तब कौवों की प्रासंगिकता तो समाप्त होगी। कौवों की प्रजाति पर भी विलुप्त होने का खतरा आज नहीं तो कुछ दशक बाद जरूर मंडराएगा।  

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