सब से बड़े कायर तो वे लोग हैं जो 135 करोड़ जनसंख्यावाले देश के नागरिकों को पहले तो देश के ही 21 ( कुल आबादी का लगभग 15.55) करोड़ मुसलमानों का डर दिखाकर उनके प्रति नफ़रत फैलाते हैं फिर हिंदुओं से धार्मिक आधार पर वोट मांगते हैं, फिर पाकिस्तान के 22 करोड़ मुसलमानों का डर दिखाते हैं और अपनी शौर्य गाथाएँ गढ़ते हैं और अब 3,90 करोड़ जनसंख्या वाले अफगानिस्तान के उन तालिबानों का डर दिखा रहे हैं जिनके साथ उनके देश के नागरिक भी नहीं खड़े.. सोशल मीडिया ऐसी पोस्ट से भरा पड़ा है जहां यह बताया जा रहा है कि अगर फलाने न होते तो तालिबान खा जाते. इनसे भी बड़े कायर वो हैं जो इन झूठी बातों पर विश्वास करते हैं और फरेबी पोस्ट को फारवर्ड करके इस दुष्प्रचार को आगे बढ़ाते हैं. अगर हमारा कोई दुश्मन है तो वह तो शक्तिशाली चीन है, पाकिस्तान और अफगानिस्तान हमारा क्या बिगाड़ लेंगे, हम अगर इतने ही ताकतवर हैं तो हम चीन से अपनी ज़मीन वापस लेने का कभी ज़िक्र क्यों नहीं करते ? हम चीन को अपना दुश्मन मान कर उससे मुक़ाबले की तैयारी क्यों नहीं करते ? हम अपराजेय उस दिन होंगे जब अपनी सुरक्षा अपने देश में निर्मित संसाधनों के बल पर करने में कामयाब होंगे ! ओलंपिक में अपनी दरिद्र हालत को सुधारने की कोई योजना क्यों नहीं बनाते ?
इस देश को आज़ाद हुए अभी 74 साल हुए हैं और बोलने वाले 70 सालों में हुए काम पर पानी फेरते हुये यह भी भूल जाते हैं कि इन 70 सालों में उनकी सत्ता के 3 साल भी शामिल हो जाते हैं. वाजपेयी जी की सत्ता के साढ़े छह साल भी शामिल हो जाते हैं, 1977 में जनता दल के 3 साल और 1989 में वी पी सिंह की सत्ता का एक साल में शामिल हो जाते हैं जिनका हिस्सा आपका दल रहा है..
ये लोग देश के उन 80 करोड़ ग़रीबों लोगों की हालत के बारे में कोई पोस्ट नहीं लिखते जिनको 20 किलो साइज़ के थैले में 5 किलों अन्न रख कर उसे बांटने का महोत्सव मनाया जा रहा है, 80 करोड़ का यह आंकड़ा तो सरकार ही बता रही है. जिस देश के 80 करोड़ नागरिक 5 किलो अन्न की सरकारी इमदाद पर जीने के लिए विवश हों उस देश के आर्थिक हालात की वास्तविकता को जानने समझने के लिए क्या और किसी आंकड़े की ज़रूरत है ? यह जो ग़रीबों को अन्न बांटा जा रहा है जब जनता के पैसे से ही खरीदा गया है, मेरे और आपके उस पैसे से जिसे टेक्स के रूप में हम व्यवस्था को देते हैं, तो ऐसे क्यों दिखया जाता है जैसे एक राजनैतिक दल ने इसे खैरात के रूप में ग़रीबों को दे रहा हो?
क्या यह ग़रीबी इस 5 किलों अन्न बांटने से दूर हो जाएगी.
जिन 80 करोड़ ग़रीबों के पास अपनी रोटी के लिए ही पैसे नहीं वे अपनी अन्य जरूरतों के लिए किसी उत्पाद को कैसे खरीद पाएंगे. जब उत्पाद खरीदे ही नहीं जा सकेंगे तो हमारी अर्थव्यवस्था में विस्तार के अवसर और रोजगार के अवसर कैसे पैदा होंगे कोई इस बात को बताएगा?
किसान जिस अन्न को 15 रु. किलो के भाव पर बेचने को विवश है उसे हम लोग 40 से 45 रु. प्रति किलो के भाव पर खरीदने को विवश हैं, तो किसान के उत्पाद को मुंहमांगी कीमत पर बेच कर पैसा कमाने वाले लोग कौन हैं ? यह मोटा पैसा किसकी जेब में जाता है ? किसान भी लुट रहे हैं और उपभोक्ता भी. यह कैसा खेल है कि किसान से उसके उत्पाद का भाव ख़रीदनेवाला तय करेगा और बाक़ी हर उत्पाद की कीमत उसको बनानेवाला ! किसान को जब अपने उत्पाद का लागत मूल्य ही नहीं मिलेगा तो उसकी आर्थिक हालत कैसे सुधरेगी ? कोई बताएगा ?
जब स्वास्थ्य और शिक्षा को लगभग पूरी तरह प्राइवेट सेक्टर को ही सौंप दिया गया हो तो कोई बताएगा कि ये ग़रीब मजदूर और किसान किस तरह अपनी संतान को बेहतर शिक्षा दिला पाएंगे और बिना शिक्षा के कैसे उनकी संतान बेहतर जीवन जी पाएगी ?
वैसे तो बहुत साधारण सी बात है , किसान की आय तभी बढ़ेगी जब उसका उत्पादन बढ़े, उत्पादन लागत कम हो और उसके उत्पाद का लागत मूल्य उसे मिले. मजदूर की आय तभी बढ़ेगी जब असे महीने में 30 दिन काम मिले और वाज़िब मजदूरी मिले. अगर ऐसा हो रहा है तो इस देश में 80 करोड़ लोग ग़रीब कैसे हैं ? क्या कर रहे हैं आप लोग ? 70 सालों को कब तक कोसते रहेंगे ?
देश किसी भी राजनैतिक दल से बड़ा होता है, इस देश की जनता को समझना होगा. इंदिरा गांधी को भी एक समय उनके दल के लोग देश यानी इंडिया का पर्याय बताते थे, इंदिरा गांधी के जाते ही कहाँ गई वह कांग्रेस ?
किसी भी दल को जनता के हालात से कुछ लेना देना नहीं होता, उसे तो किसी भी तरह किसी भी कीमत पर, जी हाँ , किसी भी कीमत पर केवल अपने भोग के लिए सत्ता चाहिए. जनता तो हमेशा ठगी ही जाती है. हर दल आपके नागरिक अधिकारों को कुचलने की कोशिश करेगा, उसे सिर्फ सत्ता नहीं, निरंकुश सत्ता चाहिए, अनंत काल के लिए सत्ता चाहिए. निरंकुश सत्ता का मतलब ही आपके नागरिक अधिकारों का कुचलना है. डरना बंद कीजिये, हम 135 करोड़ जनसंख्यावाला देश हैं






