मैं सोनी सोरी। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा की रहने वाली हूं। यहां के लोग मुझे ‘बस्तर की अम्मा’ कहकर बुलाते हैं। पिछले दिनों मेरा ‘बिरसा’ अपने स्कूल से गायब हो गया था। दंतेवाड़ा पुलिस उसे 60-70 किलोमीटर दूर से ढूंढकर लाई। बिरसा के मिलने की खबर मिलते ही मैं फूट- फूटकर रोने लगी।
माना मैंने बिरसा को जन्म नहीं दिया है, लेकिन हूं तो इसकी मां ही। जब ये बहुत छोटा था, उम्र मुझे इसकी याद नहीं, तब से कलेजे से लगाकर पाल रही हूं। 2017-18 में इसके पिता को नक्सली होने के आरोप में मार दिया गया था। मां की मौत पहले ही हो चुकी थी।
बस्तर के सामान्य आदिवासी परिवार हर रोज नक्सली होने के आरोप में बलि का बकरा बनते हैं। मैं इसके खिलाफ आवाज उठाती हूं। इसलिए तो लोग मुझे अपनी मां मानते हैं।

सोनी सोरी के साथ बिरसा। बिरसा को अपने माता-पिता की शक्ल याद नहीं। उसके लिए सोनी ही सबकुछ हैं।
मैं कभी टीचर हुआ करती थी। 2011 में मुझे नक्सली होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। ढाई साल तक 4 जेल में रही।
मेरे साथ पुलिस ने बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं। मुझे पुलिस कस्टडी में बिजली के झटके दिए जाते थे। कपड़े उतारकर जानवर की तरह मारा जाता था। जिस तरह से बोरी में आलू कोंचा जाता है, मेरे प्राइवेट पार्ट में पत्थर डाले गए। हालत ऐसे हो गए कि मैं शौचालय नहीं जा पाती थी।
11 साल बाद मुझे कोर्ट ने सारे आरोपों से बरी कर दिया। मुझ पर 6 मुकदमे थे। सभी मामलों में कोर्ट ने 2022 में बरी कर दिया। कल तक बिना सबूत मैं नक्सली थी, आज निर्दोष हो गई।
पुलिस और नक्सली दोनों को गलत साबित करने में मेरी जिंदगी के 11 साल बीत गए।
ऐसे में अब मैं सरकार से, न्यायालय से सवाल पूछती हूं कि इन 11 साल को कौन लौटाएगा?
मैं तो दोनों तरफ से मारी गई। नक्सलियों ने मेरे घर-परिवार को बर्बाद कर दिया। पुलिस-सरकार ने मेरी पूरी जिंदगी।

आपको पता है आज भी मैं बिजली के खंभे नहीं छूती हूं। बिजली के तार, प्लग देखकर डर लगता है।
घर में अंधेरा होने पर भी मैं स्विच ऑन नहीं कर सकती। मेरे हाथ वहां तक पहुंचते ही नहीं हैं। दिमाग में पहले ही चिनगारी कौंधने लगती है। मुझे पुलिस कस्टडी में होने वाले सारे टॉचर्र याद आने लगते हैं।
ये तो मेरी कहानी का एक छोटा-सा हिस्सा है, जो मैंने आपसे एक सांस में कह डाली। पूरी कहानी जानने के लिए अब आपको मेरे साथ दंतेवाड़ा से 80 किलोमीटर दूर पटेलपारा गांव चलना होगा।
यहीं पर मैं पली-बढ़ी। ये 1970 के आसपास की बात है। पापा किसान थे, लेकिन उस तरह की खेती-बाड़ी उनसे नहीं हो पाती थी कि पूरे परिवार का बेहतर तरीके से पेट पल सके।
जैसे-तैसे हम लोगों का गुजारा होता था। पूरा बचपन गरीबी में गुजरा। मैं हमेशा चाहती थी कि कुछ बन जाऊं, ताकि घर की स्थिति ठीक हो जाए।
ये सोनी का गांव पटेलपारा है। यहीं उन्होंने टीचर बनने का सपना देखा था। वो नक्सलियों के बच्चों को पढ़ाकर अच्छी जिंदगी देना चाहती थीं।
मैं पढ़ने में औसतन स्टूडेंट थी। 2002 में 12वीं के बाद मेरी टीचर की नौकरी लग गई। उस वक्त तक नक्सली शब्द भी नहीं सुना था। नौकरी लगने पर मैं बहुत खुश थी कि चलो सब कुछ अच्छा हो जाएगा। पिता के अरमानों को पूरा करूंगी। घर-दुआर सब कुछ बन जाएगा।
घर से तकरीबन 10 किलोमीटर दूर स्कूल था, जहां मैं बच्चों को पढ़ाने के लिए जाती थी। यह एक ऐसा स्कूल था, जहां नक्सल प्रभावित बच्चे पढ़ते थे।
यह स्कूल एक आश्रम की तरह था। शुरुआत में नक्सिलयों के डर से बच्चे स्कूल नहीं आना चाहते थे। उनके अंदर डर और असुरक्षा की भावना थी। मेरे प्रयास के बाद बच्चों ने स्कूल आना शुरू किया।
कुछ साल बाद धीरे-धीरे खबरें आनी लगी कि इन इलाकों में भी नक्सली पैर जमा रहे हैं। एक रोज की बात है। नक्सलियों की तरफ से मुझे बुलावा आया। मैं बेखौफ वहां चली गई। उस दिन पहली बार मैंने नक्सली का चेहरा देखा था।
एक बड़ी-सी जनअदालत लगी हुई थी। सामने एक व्यक्ति बैठा था। वो फरमान सुनाए जा रहा था। सैकड़ों लोग बंदूक ताने खड़े थे। मुझे भी उनके सामने बिठाया गया। कहा गया- इलाके में चल रहे सभी आश्रम (स्कूल) को ध्वस्त किया जाएगा। आप स्कूल चलाकर बच्चाें को हमारे खिलाफ ही गुमराह कर रही हैं।
जो सोनी सोरी बचपन से डरपोक थी, किसी से खुलकर बोल नहीं पाती थी, वो नक्सलियों को जवाब दे रही थी। मैंने उनसे साफ शब्दों में कहा- आपकी पुलिस से, सरकार से या सिस्टम से दुश्मनी होगी, लेकिन जो बच्चे यहां पढ़ रहे हैं, रह रहे हैं, ये अनाथ हैं, आपकी इनसे क्या दुश्मनी है।
तब नक्सलियों ने मेरे सामने एक शर्त रखी। उन्होंने कहा कि ठीक है तुम पढ़ाओ, लेकिन जिस दिन तुम्हारे स्कूल में पुलिस की रेकी हुई, तुम्हें जिंदा यहीं पर टांग दिया जाएगा। तब तुम्हारे पास जवाब देने का कोई मौका नहीं होगा।
मैंने बिना कुछ सोचे-समझे हां कह दिया। नक्सली बार-बार एक ही सवाल को दोहराते रहे- सोच लो सोनी, महंगा पड़ सकता है।
2011 की बात है। तब तक मेरी शादी हो चुकी थी। 3 बच्चे थे। नक्सली की मुखबिरी के आरोप में पहले मेरे पति को पुलिस गिरफ्तार कर ले गई। उन्हें जेल में डाल दिया गया।
कुछ महीने बाद मुझे भी इसी आरोप में गिरफ्तार किया गया। मुझ पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया।
इधर मेरे घर पर नक्सलियों ने हमला कर दिया। पूरे घर को ध्वस्त कर दिया गया।
आप मेरे घर चलेंगे, तो पापा घर के बरामदे पर नक्सलियों की वजह से जिंदा मुर्दे की तरह पड़े मिल जाएंगे। बस उनकी सांसें चल रही हैं। वो जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं। उन्हें सहारा देकर उठाना पड़ता है।
सोनी के पापा को नक्सलियों ने पहले बंदूक के बट से इतना मारा कि उनके पैर टूट गए, इसके बाद उन लोगों ने टूटे पैर पर गोली मार दी।
अब बताइए कि जिस नक्सली से मिलीभगत के आरोप में मुझे मुजरिम बनाया गया, उन्हीं नक्सलियों ने मेरे घर को ध्वस्त कर दिया। सब कुछ लूट ले गए। आज भी जब मेरे पापा अपना पुराना बक्सा, पुरानी फोटो देखते हैं उनकी आंखों से आंसू टपकने लगते हैं।
अब मैं आपको अपनी गिरफ्तारी के दिन की बात बताती हूं। पुलिस मुझे जगह-जगह ढूंढ रही थी। मैं जान बचाकर भाग रही थी। पुलिस मुझे मार देना चाहती थी। एक बार तो जंगल में पुलिस की ताबड़तोड़ गोलियां मुझ पर चलीं, लेकिन मैं बच भागी। यकीन नहीं हो रहा था कि मैं जिंदा हूं।
इस दौरान मेरे मन में कई सवाल थे। जो बच्चे मेरे भरोसे पढ़ने के लिए स्कूल आते थे, अब उनका क्या होगा। मुझे याद है- जब मैं स्कूल पढ़ाने के लिए जाती थी, तो अपना पल्लू थोड़ा लंबा रखती थी, क्योंकि ये बच्चे दौड़ते हुए मेरे पल्लू से लिपट जाते थे।
किसी तरह से, कुछ लोगों की मदद से मैं छत्तीसगढ़ से दिल्ली भागी। फिर दिल्ली में मेरी गिरफ्तारी हुई। कोर्ट में पेशी के दौरान मैं फूट-फूटकर रो रही थी। मेरी मांग थी कि पूरे केस को दिल्ली से चलाया जाए, क्योंकि छत्तीसगढ़ पुलिस पर मुझे भरोसा नहीं था।
खाली समय में सोनी पढ़ना पसंद करती हैं। वो चाहती हैं कि आदिवासियों के बच्चे इतना पढ़ जाएं कि अपने साथ होने वाले जुर्म के खिलाफ आवाज उठा सके।
कोर्ट ने आश्वस्त करते हुए मुझे राज्य पुलिस के हवाले कर दिया। रायपुर एयरपोर्ट पहुंचते ही मीडिया ने घेर लिया। पहली बार मीडिया का सामना कर रही थी।
उन दिनों को याद कर आज भी मैं दहल जाती हूं। तमाम परिस्थितियों के बावजूद मैंने हमेशा संविधान और कोर्ट पर भरोसा रखा। मेरा दिल कह रहा था कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा। तुम निर्दोष हो, यह बात साबित हो जाएगी।
मुझे जेल में डाल दिया गया। जहां मैं थी, वहीं पर मेरे पति भी बंद थे। उन्हें पुलिस ने मार-मारकर अधमरा कर दिया था। इतना हट्टा-कट्टा आदमी, जिसके साथ मैंने लव मैरिज की थी, वो चल तक नहीं पा रहा था। मेरे सामने वो सांप की तरह रेंग रहा था। मुझे इस बात का ज्यादा दुख हो रहा था कि मेरी वजह से पूरा परिवार बिखर रहा था।
जब कोर्ट ने पति को रिहाई दे दी, तो मुझसे जेल प्रशासन ने कहा- अपने घरवालों को सूचना दे दो कि वो तुम्हारे पति को ले जाएं। मैंने सीधा कहा- जिस स्थिति में मेरे पति को लाए थे, मुझे वैसा ही पति चाहिए। आप इसका इलाज कराएं।
पुलिस मेरे पति को घर छोड़ गई। उनके पूरे शरीर में कीड़े लग चुके थे। कोई देखने वाला भी तो नहीं था। मेरे तीनों बच्चे पता नहीं, कैसे-कैसे करके वो अपना पेट पाल रहे थे।
पति रात-रातभर कराहते रहते थे। पेशी के दौरान जब मेरी बड़ी बेटी मुझसे मिलने के लिए आती, तो कहती- मां तुम कब बाहर आओगी, पापा मर जाएंगे। मेरे पास आंसू बहाने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं था।
कुछ साल बाद ही पति की मौत हो गई। मेरे पूरे घर में आप घूम जाएंगे, लेकिन आपको मेरे पति की तस्वीर नहीं मिलेगी। मुझे तो पुलिस-सरकार ने विधवा बनाया, सफेद कपड़े पहनाए।
सोनी अपने परिवार के सदस्यों के साथ। उन्हें आज भी इस बात का दुख हाेता है कि परिवार को उनकी वजह से परेशान होना पड़ा।
जेल से बाहर आने के बाद मैं अपना पूरा होश खो बैठी थी। आप सोचो कि एक पत्नी पर क्या बीतेगी, जब उसे पति का अंतिम बार चेहरा भी न देखने दिया जाए। आखिरी बार मैं अपने पति को छू भी नहीं पाई।
पति की मौत के करीब ढाई साल बाद मुझे रिहा किया गया। इसी बीच एक बार फिर मुझ पर अटैक हुआ। नक्सलियों ने एसिड अटैक करवाया था। वो तो अच्छा था कि मैंने अपनी दोनों आंखें बंद कर ली, नहीं तो शायद मैं आज कुछ भी नहीं देख रही होती। मेरा चेहरा देखने लायक नहीं था। पूरा चेहरा काला पड़ चुका था, जल चुका था।
एक बार फिर भगवान ने मुझे बचा लिया। अब भी मैं बस्तर के लोगों के लिए जी रही हूं। मैंने हार नहीं मानी है। न ही अब किसी चीज का डर है। पूरे बस्तर में कही भी किसी भी वक्त यदि किसी महिला के साथ अन्याय होता है तो मैं उसके साथ खड़ी रहती हूं।
देशद्रोह के आरोप में मेरी जिंदगी के 11 साल तबाह हो गए। मैं नहीं चाहती कि इस इलाके की किसी दूसरी महिला के साथ ये सब हो।
शल एक्टिविस्ट सोनी सोरी ने अपने जज्बात नीरज झा के साथ शेयर किए





