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निवारण में हल : इसलिए दुःख के कारणों की पड़ताल

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प्रिया सिंह (लखनऊ)

मनुष्य को दुःख(क्लेश) क्यों होता है? *अविद्याsस्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः*

    अर्थात् संसार मे आए मनुष्य का दुःख है, अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। बस इतना ही दुःख है, और अविद्या के कारण अन्य चार क्लेश अपने आप पैदा हो जाते हैं। 

     प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न, और उदार इन चारो की प्रसवभूमि अविद्या है।

    *अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्तनुविच्छिन्नोदाराणाम्।*

                    . (योग-दर्शन-4)

यानी अविद्या(अज्ञान) न हो तो परवर्ती चारो दुःख पैदा ही न हों. इसलिए,,अज्ञान,,को ही दुःख समझा गया है।

तो अज्ञान क्या है?

                 *अनित्याsशुचिदुखाःनात्मसु नित्यशुचिसुखाssत्मख्यातिरविद्या।*

           .             (योगसूत्र-5)

       _अनित्य=अनुशासनरहित जीवन,अशुचिता=अपवित्र(गंदगी) जीवनशैली अनात्मपदार्थों को नित्य समझ लेना और आत्मतत्त्व का ज्ञान न होना अविद्या है अविद्या का यह अर्थ डिग्री से  संबंधित नही है, डिग्री और उच्चशिक्षा के बाद भी हम पञ्चक्लेशों मे जी रहे है।_

      उदाहरण के लिए यदि हमारे पास यह नही है-.

*युक्ताहारविहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु।*

*3युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।*

                    (गीता-6/17)

अध्यात्म की खोजें व्याधियों की जड़ के विनाश की है. आधुनिक विज्ञान की खोजें मानक पेश करती हैं. मानक यह है कि-आठ ग्रास भोजन करे और यह कष्ट नही देगा,उदर का आधा भाग शाकभाजी और अन्य आहार से भरे शेष के तीसरे भाग मे पानी और शेष भाग वायु के गमनागमन के लिए रिक्त रखे। दो वक्त भोजन करे।     

           विहारस्य=विहरति, चलति यह काम पैरों का है तो कम से कम एक योजन पद से विचरण करे। इसके वाद, युक्तचेष्टस्य कर्मसु,, अर्थात् चेष्टा=प्रयत्न (यज्ञ)= यजन और अपने जीवन निर्वाह के लिए यथोचित और यथाविहित कर्म,  करे। युक्तस्वप्नावबोधस्य,,रात्रि मे पहली दश घड़ी तक जागना, मध्य की दश घड़ी तक सोना और प्प्रातः यानी शेषरात्रि की दश घड़ी तक जागना, यह सोने और जागने का विधान शतपथ मे लिखा है।

     योगो भवति दुःखहा,l यह जो योगज्ञान है, वह दुःख से निवृत्ति देने वाला है।

*योगिनो योगो भवति दुःखहा*

*दुःखानि सर्वाणि, हन्तीति। सर्वसंसार दुःखक्षयकृद्योगो भवतीत्यर्थः।*

        अज्ञान(अविद्या) वश हम सबेरे आठ बजे तक सोते है और उठकर जल्दी-जल्दी नित्यक्रिया से निवृत्त हो काम की ओर भागते हैं, दिन भर मे आठ बार चाय पीते हैं, तीन बार खाते हैं और पुनः बिस्तर पर पड़ जाते हैं और कहते हैं. ज्ञान की हमे कोई आवश्यकता नही है. संसार मे दुःख है।       

        बड़े-बड़े हास्पीटल हैं, डाक्टर है और वे स्वयं विमार हैं तो अब गैस की गोली खाओ, ब्लडप्रेशर की दवाई खाओ और दवाई ही खाते रहो पर कभी ठीक नही होवोगे। आज तक कोई ठीक हुआ है, हमने तो नही सुना।

               (चेतना विकास मिशन )

Ramswaroop Mantri

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