अग्नि आलोक
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कुछ दु:स्स्वप्न दृश्य

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सुधा सिंह

(1) सहसा
एक मशीनीकृत बड़ी सी आरी
उस विशाल बूढ़े छतनार वृक्ष को काटने लगीI
सूरज पश्चिम में ढल रहा था
और वृक्ष की छाया
पूरब में लंबी हो रही थीI
पक्षी बसेरे छोड़ उड़ चुके थेI
वृक्ष जब ढहा उत्तर की ओर
उसकी छाया दौड़ी उसकी ओर,
जैसे उसे बचाने को,
और उसके नीचे दब गयीI

(2) हवेली
एक विशाल सुनसान हवेली थी
भाषा कीI
इधर-उधर बिखरे हुए थे
संज्ञा और सर्वनाम,
दृश्य में जड़वतI
विशेषण बहुत भव्य थे,
आतंककारी आभामण्डल के साथ
ऊँची कुर्सियों पर विराजमानI
सबकुछ निश्चल था निष्प्राणवत!
क्रियाएँ अनुपस्थित थींI
काल सिर्फ़ एक था,
ठहरा हुआ,
अतीत या वर्तमान या भविष्य —
यह बताने वाला कोई न था!

(3). आधीरात की रसोई
आधी रात को रसोईघर का अँधेरा
रूमानियत से सराबोर था!
एक सुसंस्कृत, रसिकहृदय नर तिलचट्टा
ब्रेड के बिखरे हुए चूरे,
सब्ज़ी, मांस और पनीर के टुकड़े
और जैम आदि
खाने-चाटने और
अपनी मादा से प्रणय के बाद
प्यार और विश्वशान्ति के बारे में
दार्शनिक और काव्यात्मक बातें कर रहा थाI
तिलचट्टे का विचार था कि
मुक्ति के किसी भी यूटोपिया का
पीछा करना
मृगमरीचिका के पीछे भागना है,
इस बेशक़ीमती जीवन को
यूँ ही गँवाना हैI
तिलचट्टा कह रहा था,
“रसोई घर का यह सुखद अँधेरा ही
काव्यात्मक है,
जीवनदायी और शान्तिपूर्ण हैI
रोशनी की चाहत हमेशा
जोखिमों से भरी होती हैI
हम अँधेरे के निवासी
परम संतोषी जीव हैं और इसलिए
कई हिमयुगों को भी झेलकर जीवित हैं
और परमाणु विकीरण को भी
झेल सकते हैंI
ऐसी ही है हमारी उत्कट जिजीविषा!
यूँ ही हम जीवन नहीं डालते जोखिम में,
न हमें कभी शहादत की सनक सताती हैI
हम ही हैं शाश्वत सत्य के मसीहा,
शान्ति के संदेशवाहक,
प्रेम गीतों के अमर गायक,
और यह दुनिया हमारी है!”
तिलचट्टों की भाषा मैं
समझ सकती थी लेकिन
उनसे संवाद निरर्थक थाI
इसलिए मैं उस विकट दुस्स्वप्न से
बिना विलंब किये
बाहर निकल आयी
इस कोलाहल, अशान्ति,
अनिश्चय और दुखों से भरी
इंसानी दुनिया में!

(4). कथित सयाने लोग
गहरी नींद में मैं
एक ऐसे दृश्य में जा पहुँची
जहाँ नरेन्द्र मोदी
मनुष्यता के सुन्दर भविष्य के बारे में
एक लम्बी कविता पढ़ रहे थे,
अमित शाह एक ऐतिहासिक उपन्यास
लिख रहे थे,
योगी आदित्यनाथ पेन्टिंग कर रहे थे,
मोहन भागवत दार्शनिक विमर्श में तल्लीन थे,
कोई एक शंकराचार्य क्वांटम भौतिकी पढ़ा रहे थे
और तमाम साहित्यकार-कलाकार और बौद्धिक जन
जो जनता, समाजवाद आदि को समर्पित थे,
जगराता में भजन गा रहे थे,
या पं. दीनदयाल उपाध्याय के
एकात्म मानववाद के सूत्र रट रहे थे,
या दारू की भट्ठी चला रहे थे,
या बीमा एजेंट या शेयर बाज़ार के
दलाल बन चुके थे,
या ठेकेदार या प्रापर्टी डीलर का काम
कर रहे थे,
या ब्राह्मण महासभा और क्षत्रिय महासंघ के
सम्मेलनों के अध्यक्ष-मण्डल और स्वागत समितियों में
शामिल हो गये थे,
या हरिद्वार के पंडों की जमात में जा मिले थे,
या काशी या मथुरा में कारसेवा करने वालों की
सूची बना रहे थे,
या हाथ में ख़ून सना चाकू थामे
मनुष्यता और न्याय और सपनों का
पीछा कर रही भीड़ को
रास्ते किनारे टेण्ट लगाकर
जलपान करा रहे थे!
जो उनमें शामिल नहीं थे
वे पागलखानों में बंद थे
या आत्महत्या कर चुके थे!
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Ramswaroop Mantri

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