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आत्मनिर्भर पथ पर शब्दों की क़दमताल?

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शशिकांत गुप्ते

देश आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। प्रगति के पथ पर अग्रसर है। देश के आत्मनिर्भरता के लिए देश की कर्णधार,भावीपीढ़ी का आत्मनिर्भर होना जरूरी है।
आत्मनिर्भर बनने के लिए अभ्यास जरूरी है।
सभी देशवासियों के साथ चल कर विकास नामक पथ पर चलतें हुए, सभी में विश्वास जागृत करने के लिए नई व्यवस्था ने एक मार्ग का नाम कर्तव्यपथ रख कर अपने संकल्प को पूरा करने का रास्ता चुना है। नई व्यवस्था आत्मनिर्भर बनने के लिए भावीपीढ़ी से स्वाभाविक तौर पर अभ्यास करवा रही है। इस नई व्यवस्था ने भावीपीढ़ी को शारीरिक और मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाने का नायाब तरीका ईजाद किया है। कुछ विरोधियों को और सजगप्रहरियों को हरएक अच्छे कार्य की आलोचना करने की आदत हो गई है।
देश के उत्तरी क्षेत्र के एक प्रान्त के एक छोटे से जिले में एक कस्बे के एक स्कूल में देश के नोनिहालों को मध्यान्ह भोजन में नमक परोसा गया। एक समाचार मध्याम के एक संवादाता ने इस घटना को उजागर किया। विरोधियों को विरोध करने का मौका मिल गया।
विरोधियों को सकारात्मक सोच रखना चाहिए।
उक्त घटना पर गहराई से सोचने पर महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है। देश के नोनिहाल को बालावस्था में ही नमक से रोटी खाने की आदत होगी तो, निश्चित ही ये भारतमाता के लाल देश के प्रति नमक हलाल बनेंगे। यह भी आत्मनिर्भर बनने का अभ्यास ही तो है।
देश के नागरिकों ने पिछले आठ वर्षों में ही शौचालय के महत्व को समझा है। एक राष्ट्रवादी, दार्शनिक, ‘अ’राजनैतिक और सांस्कृतिक संगठन के भूतपूर्व पुरोधा गुरुजी ने राजनीति की तुलना शौचालय की है। उनका दर्शन शास्त्र कहता है कि, घर में अन्य कमरों के साथ शौचालय भी अनिवार्य होता है। लेकिन कोई भी चौबिसों घण्टे वहाँ नहीं बैठता है।
बहरहाल मुद्दा है शौचालय के महत्व का। हाल ही में देशी खेलों के कुछ खिलाड़ियों को धार्मिक व्यक्ति के नेतृत्व में अपराध मुक्तछबी बनने वाले सूबे के एक शहर में शौचालय में रखा खाना खिलाया। इस पर भी विरोधियों ने खूब आपत्ति जताई। समाचार माध्यमों को समाचार की खुराक मिल गई।
सोचना चाहिए कि, देश का युवा हर तरह से सशक्त होना चाहिए। हर तरह परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए सक्षम होना चाहिए। किसी विषम स्थिति में किसी भी जगह खाना ग्रहण करना पड़े तो उन्हें कोई संकोच न करतें हुए, भोजन ग्रहण करने की आदत होनी चाहिए।
मामाजी के नाम से लोकप्रिय एक सूबे के मुखिया के प्रांत के एक कस्बे में नन्ही बालिकाओं से शौचालय की सफाई करने का अभ्यास करवाया जाता है। पढ़ाई के साथ स्वच्छता रखने का भी अभ्यास करवाना जरूरी है।
पिछले आठ वर्षों से ऐसे अनेक उदाहरण प्रत्यक्ष देखने को मिल रहें हैं।
उज्ज्वला योजना का भी विरोधी विरोध कर रहें हैं। इस मुद्दे पर भी सकार्यात्मक सोचना चाहिए।
सरकार ने एक बार गैस सिलेंडर मुफ्त मुहैया करवा दिया।
सबका साथ,विकास और विश्वास का नारा बुलंद करने वाली व्यवस्था को तुरंत ध्यान में आया। देहाती स्त्रियों को हमेशा के लिए परावलम्बी नहीं बनाना चाहिए।
यदि उन्हें गैस के चूल्हे की आदत पड़ जाएगी तो ये स्त्रियां लकड़ी के चूल्हे पर फुँकनी से फूक कर खाना पकाने के अभ्यास को भूल जाएंगी, तो आत्मनिर्भर कैसे बन पाएंगी।
उपर्युक्त सारी योजनाएं प्रशंसनीय हैं। सारी योजनाएं आत्मनिर्भता बनने के लिए सुदृढ़ अभ्यास है। सभी को इस तरह का सकारात्मक सोच बनाए रखना चाहिए।
सकारात्मक सोच ही प्रगतिशीलता का मार्ग प्रशस्त करता है। जिस तरह हमनें महज ताली और थाली बजाकर महामारी को भगाया। ठीक इसी तरह अपने सकारात्मक सोच के कारण ही हम निश्चित आत्मनिर्भर बनेंगें।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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