दिव्यांशी मिश्रा
‘आज सब्जी में नमक तेज था!’ बिल चुकाते हुए जनार्दन जी बोले।
‘रसा सूख गया होगा!’ होटल मालिक बोला।
‘रसा बोले तो तरी!’ जनार्दन जी ने कंफर्म किया।
‘जी आप उसे झोल भी कह सकते हैं!’ होटल मालिक ने उनकी जानकारी में इजाफा किया।
जनार्दन जी हंसते हुए चले गए।
इस होटल का नाम सत्कार था। यह था तो होटल ही। मगर इसका मालिक इसे होटल न कहकर भोजनालय कहता था।
‘आज फिर नमक तेज था सब्जी में!’ बिल चुकाते हुए जनार्दन जी बोले।
‘आज सब्जी चटक है!’
जनार्दन जी आगे कुछ न बोले और चले गए।
इस होटल के पास में एक और होटल था। मगर जनार्दन जी उधर नहीं जाते थे,क्योंकि एक तो वह होटल काफी पुराना था।
दूसरे,उस होटल में जो जेंटरी आती थी, जनार्दन जी को कुछ खास पसंद नहीं आती थी।
‘कितना नमक खिलाएंगे! कभी सब्जी भी खिला दीजिए!’ बिल चुकाते हुए जनार्दन जी बोले।
‘डाला तो कम था … ‘
जनार्दन जी ने होटल मालिक को देखा।
‘जी हां,मैंने अपने सामने डलवाया था!’ होटल मालिक ने अपनी कर्तव्य परायणता बतलाई।
जनार्दन जी बड़बड़ाते हुए चले गए।
होटल देखने में बहुत अच्छा था। बड़ा था।सजा था। उस पर लगा हुआ लंबा-चौड़ा बोर्ड खूब चमकता था।
खाने से खुशबू आए या न आए,मगर होटल को भोजनालय कहने से भारतीय संस्कृति की खुशबू अवश्य आती थी।
‘आज फिर नमक बहुत तेज था!’ बिल चुकाते हुए जनार्दन जी बोले।
‘बुरा न माने तो एक बात कहूं!’ होटल मालिक विनम्र होकर बोला।
‘जी कहें!’
‘वास्तव में,आपको फीका खाने की आदत है!’
जनार्दन जी ने होटल मालिक को घूरा।
‘गलती आपकी नहीं है! आपके पूर्वजों की है। फीका खाते होंगे! आपको भी वही आदत पड़ गई!’ होटल मालिक आगे बोला।
‘सही कह रहे हैं आप! गलती हमारी ही है!’ यह कहकर जनार्दन जी होटल के बाहर निकले। बोर्ड पर नजर गई। वापस आए और होटल मालिक से बोले,’आप से एक निवेदन है! ‘
‘आप तो आदेश करें!’ होटल मालिक बोला।
‘न मत करिएगा!’
‘आप बताइए तो सही! यहां आपका सेवक बैठा है!’
‘आप अपने होटल का नाम सत्कार भोजनालय से बदलकर सरकार भोजनालय कर लीजिए!’
यह कहकर जनार्दन जी कुछ पल को रुके। फिर आगे बोले,’क्योंकि आप से कभी कोई गलती होती ही नहीं! आप कभी कोई गलती कर ही नहीं सकते!’ यह कहकर पैर पटकते हुए जनार्दन जी होटल से बाहर आ गए।
‘गाहक टूट गवा! अब ना आई!’ उनको जाते देख वेटर ने एक्जिट पोल की तरह अपना मत प्रकट किया।
‘कल फिर आएगा देखना!’ होटल मालिक काउंटर थपथपाते हुए बोला।
एक्जिट पोल को धत्ता बताते हुए अगले दिन जनार्दन जी होटल में नजर आए।
‘सब्जी आज कैसी थी!’ पैसा लेते हुए होटल मालिक बोला।
‘आप इतना नमक खिला दिए हो कि अब तो खाने की आदत हो गई है!’ जनार्दन जी मुस्कुराते हुए बोले।
‘भोजनालय का नया नाम आपको कैसा लगा!’ होटल मालिक ने गर्व से पूछा।
‘बहुत अच्छा नाम चुना है!’
‘मैं जानता था आपको अवश्य पसंद आयेगा!’ होटल मालिक ने वेटर को कनखियों से देखा।।
जनार्दन जी बिल चुकाने के बाद होटल से बाहर निकले। बोर्ड पर लिखे हुए नाम को दुबारा देखा और खुद को सुनाते हुए बोले ‘हिंदू भोजनालय





