
पूजा अग्निहोत्री
छतरपुर का सूरज चढ़ रहा था। कोलेज के मैदान में छात्रों की हलचल कम थी, लेकिन कुछ अंधेरे चेहरे— सूरज जैसे सामान्य लड़के के लिए—भयंकर माहौल बना रहे थे। सूरज को कई गुंडे टाइप लड़कों ने घेर लिया था। हाथों में हॉकी, साइकिल की चेन और बेल्ट झूल रही थी। हवा में जैसे हर तरफ़ डर फैल गया हो।
“अब तुम सीखोगे इश्क किस चिड़िया का नाम है!”— उनमें से एक ने धमकी दी और पहला वार किया।
सूरज ने पीछे हटने की कोशिश की। “छोड़ो मुझे!” उसने कराहते हुए कहा। पर वार तेज़ थे। उसके शरीर पर चोटें पड़ रही थीं।
सूरज कराह रहा था, जमीन पर गिरा हुआ। उसके माला के मोती टूटकर बिखर गए थे। उसपर लगातार हॉकी, चेन और बेल्ट से वार होते रहे, भीड़ में हर कोई हिचकिचा रहा था, कोई भी आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। सूरज को अधमरा छोड़ गुंडे जैसे आये थे, वैसे ही चले गए।
तभी मोना, जो उसकी कॉलेज में सेकंड इयर की छात्रा थी, ने कदम बढ़ाया। उसके हाथ में पानी की बोतल थी। उसने सूरज के होंठों को पानी तक पहुँचाया, उसे धीरे-धीरे सहारा दिया। उसकी आँखों में डर और पीड़ा दोनों चमक रहे थे। उसने धीरे-धीरे सूरज को पानी पिलाया।
“ठीक हो जाओगे, सूरज। सब ठीक हो जाएगा,” मोना ने धीमे स्वर में कहा।
भीड़ से कुछ छात्र आगे बढे और सूरज को उठाकर शहर के अस्पताल की ओर ले गए। मोना ने बिखरे मोतियों को सावधानी से इकट्ठा कर अपने पर्स में संभाल कर रख लिया।
सकीना, शहर की सबसे खूबसूरत लड़की, जिसके लिए सूरज की मोहब्बत बेइन्तहा थी। लड़की के भाईयों को सूरज और सकीना की दोस्ती कतई पसंद नहीं थी। आज मौका मिला तो इसी खूबसूरत लड़की के भाइयों ने उसकी पिटाई करवा दी।
सूरज का परिवार शहर में प्रतिष्ठित था। पिता एक जाने-माने वकील और जजों से, सरकारी हाकीमों से उनके करीबी रिश्ते रखते थे। कहावत थी कि नवाब हामिद अली के पेशाब से शहर के चिराग जलते हैं। वहीं, सकीना का खानदान रईस और आलीशान था। उनके घर का हर चीज़ शाही ठाठ-बाट वाली। उनके खानदान के पहनने के लिए कपड़े लखनऊ से आते, हर त्यौहार पर खूब दान होता और तीज-त्यौहार पर भव्य मेले जैसा आयोजन।
लेकिन उस परिवार की एक कहानी थी जो शहर में हर किसी को मुंह-जुबानी याद है कि उनके पूर्वजों की किसी स्त्री ने कभी राजा के दरबार में मुजरा किया था, तब छतरपुर के राजा ने उस पर हीरे-जवाहरात की बारिश कर दी। एक सामान्य सा परिवार रातोरात धनाड्य हो गया… उसके बाद तो मुजरा और रंडी-पेशा उनके परिवार का रिवाज हो गया, खूब धन दौलत उनके परिवार ने जोड़ी, शाही तरीके से जीवन जीते रहे। गाड़ी- दरबान सब थे, राजाओं की कृपा हमेशा बरसती रही। परिवार का धन-वैभव बढ़ा तो रसूख भी बढ़ा, फिर उनके परिवार में जब भी लड़की पैदा होती तो धन-वैभव बढ़ता। खुदा का फजल कि उनके घर में सुन्दर कमसिन लड़कियां पैदा होती- और लड़की के पैदा होने पर जश्न मनता लेकिन दो पीढ़ी से क्या ही चमत्कार हुआ कि उस परिवार में लड़की ही पैदा नहीं हुई, पुराना हुस्न कब तक जलबे दिखाता। परिवार के मर्दों ने रोजगार में हाथ डाला और बरकत इतनी कि बिजनेस में खूब मुनाफा होने लगा, सकीना तीन पीढ़ी बाद पैदा हुई, अपने परिवार की पहली लड़की जो सरकारी तालीम ले रही थी, कॉलेज जाती थी, उससे पहले जनानियों के लिए घर पर ही मौलवी पढ़ाने आते रहे थे।

सकीना का घर शहर के सबसे बड़े और ऐश्वर्यपूर्ण घरों में से एक था। बड़े दरवाज़े, संगमरमर के फर्श, सुनहरे झूमर और बहुमंज़िला हवेलियाँ—हर चीज़ राजसी थी।
कमरे महकते थे, दीवारों पर कलाकृतियाँ टंगी थीं, और हर फर्श पर बारीक़ नक़्क़ाशी का काम था। दरवाज़ों और खिड़कियों की लोहे की जाली पर सोने की पट्टियाँ लगी थीं।
सकीना के पिता शहर के बड़े व्यापारियों में से थे। हर त्यौहार पर दान और भव्य आयोजन होते। उनके परिवार की लड़कियों की सुंदरता के लिए शहर के लोग प्रसिद्ध थे।
परिवार का विरोध भी उतना ही बड़ा था। उनके भाईयों ने सूरज की बेरहमी से पिटाई की थी। उनका मानना था कि सूरज का परिवार उनके मान-सम्मान के योग्य नहीं है।
सकीना का खानदान धन-वैभव और शाही ठाठ-बाट में डूबा हुआ था। लखनऊ से आने वाले कपड़े, विदेशी गहने, सजावटी नक्काशी—हर चीज़ शाही ठाठ-बाट की कहानी कहती थी।
सूरज का परिवार भी खूब प्रतिष्ठित था, इसी कारण उसका विवाह सकीना से नहीं चाहता था। उन्हें डर था कि उनकी बेटी यहाँ आकर मुजरे जैसी चीज़ करेगी, जबकि पिछली तीन पीढ़ियों से ऐसा कुछ नहीं हुआ था।
सूरज अपनी पिटाई के बाद से सकीना से मिलने से डरने लगा था— लेकिन मोहब्बत कम नहीं हुई। सूरज का डर सिर्फ़ परिवारों के विरोध से नहीं था, बल्कि अपनी ज़ख्मों और पिछली पिटाई की यादों से भी था। लेकिन सकीना हर बार उसके पास आने की कोशिश करती।
मोना ने अपने बुद्धिमत्ता और साहस से सूरज और सकीना के बीच संपर्क बनाए रखा। कई बार उसने सीधे संकट में सूरज की मदद की, कई बार उसकी हिम्मत बढ़ाई। मोना सिर्फ एक दोस्त नहीं थी— वह दोनों की मोहब्बत की संरक्षक थी।
एक दिन सूरज कॉलेज के ग्राउंड में बैठा था, उसकी आँखों में आंसू थे। मोना ने उसे फिर से पानी पिलाया और भविष्य में अधिक सावधान रहने और अपना ध्यान रखने को कहा। तब सूरज ने पहली बार मोना को देखा, न केवल एक दोस्त के रूप में, बल्कि एक मार्गदर्शक और सहारा देने वाली के रूप में। मोना अब सिर्फ एक दोस्त नहीं थी—वह प्रेम की संरक्षक थी।
मोना ने उसे समझाया, “अगर तुम सच में उसे प्यार करते हो, तो डर के आगे मत झुको। सही समय आएगा।”
सूरज ने मोना की बातों से साहस पाया।
एक शाम, कॉलेज का बगीचा सुस्त और ठंडी हवा से भरा था। सूरज अकेला बैठा था। सकीना चुपके से पास आई।
“सूरज, मैं जानती हूँ तुम डरते हो… लेकिन डर को पार करना भी प्यार का हिस्सा है,” सकीना ने धीरे कहा।
सूरज ने उसका हाथ थामा, “सकीना, मेरी दुनिया तुम्हारे बिना अधूरी है। हर बार जो हुआ, मैं उसे भूलना चाहता हूँ, पर डर मुझे रोकता है।”
सकीना ने मुस्कुराते हुए कहा, “हमारे लिए प्यार केवल खुशियों में नहीं, कठिनाइयों में भी समझना है। मैं तुम्हारे साथ हूँ, हमेशा।”
सूरज और सकीना की मोहब्बत अब और भी मजबूत हो चुकी थी। सकीना हर बार सूरज के पास आने की कोशिश करती थी, चाहे परिवार का विरोध कितना भी बड़ा क्यों न हो।
समाज और परिवार की ओर से कितनी ही बाधाएं थीं, लेकिन मोना की मदद और सलाह से, दोनों ने अपने दिल की आवाज़ को सुनना शुरू किया।
समय के साथ सूरज और सकीना ने अपने प्यार को मजबूती दी। मोना ने दोनों के बीच विश्वास और साहस की कड़ी बनाई। सूरज और सकीना अब जानते थे कि भले ही परिवार और समाज ने कई बार विरोध किया, प्यार की शक्ति और मोना का साथ उन्हें हमेशा जोड़कर रखेगा।
लेकिन एक दिन खबर आई कि सकीना की शादी खूब ठाठबाट से किसी के साथ कर दी गयी, निकाह के बाद वह अपनी ससुराल चली गयी..
समय बीता। मोना ने सोशल साइट्स जॉइन की। एक दिन उसने सकीना को देखा। दोनों ने नंबर साझा किए और कॉल पर बातचीत शुरू हुई।
मोना की आँखों में आँसू थे जब सकीना ने फोन पर बताया— “मोना, मेरे पति का इंतकाल हो गया… कैंसर ने उन्हें मुझसे छीन लिया। अब उम्र भी चालीस नहीं हुई थी।”
मोना ने गहरी सांस ली। “सकीना, मुझे बहुत अफ़सोस है। लेकिन… सूरज अब भी तुम्हें चाहता है।”
सकीना कुछ देर खामोश रही। फिर बोली— “जानती हो मोना, मोहब्बत कभी मरती नहीं… लेकिन हर मोहब्बत मुकम्मल भी नहीं होती। सूरज से मिलने का मन बहुत करता है, पर अब हालात और हैं।”
मोना ने उसी शाम सूरज को बुलाया। उसने पर्स से वो टूटे हुए मोती निकाले, जिन्हें सालों पहले कॉलेज के मैदान से उसने उठाया था। “ये लो सूरज,” उसने कहा, “वो मोती जिनसे तुम्हारी मोहब्बत की कहानी शुरू हुई थी। आज इन्हें लौटाकर मैं तुम्हें सच बताना चाहती हूँ। सकीना अब भी तुम्हें याद करती है… पर शायद किस्मत ने तुम्हें और उसे कभी साथ लिख ही नहीं रखा।”
सूरज की आँखों से आँसू बह निकले। उसने मोती अपने सीने से लगा लिए और धीमे स्वर में कहा— “मोना, मोहब्बत अगर अधूरी रह भी जाए, तो भी उसकी ख़ुशबू दिल में ज़िंदा रहती है। सकीना मेरी थी… है… और हमेशा रहेगी।”
मोना ने उसे ढाढस दिया, “याद रखना सूरज, मोहब्बत हमेशा पाने का नाम नहीं होती। कभी-कभी बस निभाने का नाम होती है—खामोशी से, दुआओं से।”
सूरज ने आसमान की तरफ देखा। हवेली की सुनहरी झूमरों वाली यादें, सकीना की हंसी, उसकी बातें—सब आँखों के सामने कौंध गईं। लेकिन अब वो मोहब्बत बस दुआओं और यादों में ही जिन्दा रहनी थी।
मोना ने टूटे मोतियों को फिर से पिरोकर एक माला बना दी और सूरज के हाथ में रख दी। “ये रही तुम्हारी मोहब्बत… अब इसे दिल में संजो लो।”
सूरज ने माला अपने गले में डाल ली। उसके होंठों पर दर्द और सुकून का मिला-जुला मुस्कान था।
बरसों बीत चुके थे। सूरज अब दिल्ली में एक नामचीन वकील बन चुका था, मगर उसकी आँखों में आज भी वही अधूरा खालीपन था। मोना उसकी जिंदगी में दोस्त और सहारा बनकर हमेशा खड़ी रही, मगर वह जानती थी—सूरज के दिल का एक कोना हमेशा सकीना के लिए ही धड़कता है।
एक दिन अचानक मोना को सकीना का फोन आया। आवाज़ काँप रही थी—
“मोना… मैं अब अकेली हूँ। पति को गुज़रे तीन साल हो गए। बच्चे अपने-अपने काम में लग गए हैं। हवेली अब उतनी रौनक़दार भी नहीं रही।”
मोना ने दिल थामकर धीरे-से पूछा— “सकीना… क्या अब भी सूरज को याद करती हो?”
सकीना की खामोशी ही उसका जवाब थी।
मोना ने चुपके से सूरज को खबर दी। पहले तो वह सिहर उठा, जैसे किसी ने पुराना घाव कुरेद दिया हो। लेकिन फिर उसके चेहरे पर एक अजीब-सा उजाला छा गया।
“क्या मैं सचमुच… उससे मिल सकता हूँ?” सूरज ने काँपते स्वर में कहा।
मोना मुस्कराई— “अब कोई दीवारें नहीं हैं, सूरज। वक़्त ने वो सब ढहा दिया है, जो कभी तुम्हें रोकता था।”
सूरज उसी पुराने शहर पहुँचा। हवेली अब भी खड़ी थी, मगर उसका वैभव कहीं खो चुका था। दरवाज़ा खोलकर जब सकीना सामने आई, तो दोनों देर तक बस एक-दूसरे को देखते रह गए।
सालों की दूरी, आंसुओं और चुप्पियों का सैलाब, उस एक नज़र में बह निकला।
सकीना की आँखें भर आईं— “सूरज… ये मुलाक़ात बहुत देर से हुई, पर शायद मुक़द्दर की लिखावट ही यही थी।”
सूरज ने उसका हाथ थाम लिया— “सकीना, देर से सही… पर अब लगता है कि मेरे बिखरे मोती फिर से डोर पा गए हैं।”
मोना दूर खड़ी यह दृश्य देख रही थी। उसके होंठों पर संतोष की मुस्कान थी।
वह जानती थी, उसके दोस्त की अधूरी मोहब्बत अब मुकम्मल हो रही है।
उसने मन ही मन कहा— “मोती चाहे बिखर जाएं, अगर डोर सच्ची हो तो वक़्त एक दिन उन्हें फिर जोड़ देता है।”
“मोती बिखरे रास्ते” का सफ़र आखिर एक मुकम्मल माला में बदल गया।
सूरज और सकीना का प्रेम—समय, समाज और परिस्थितियों की आँधियों से जूझकर भी आखिरकार अपने ठिकाने पहुँच गया।
पूजा अग्निहोत्री
जन्म – 4 सितंबर
पति – श्री प्रदीप अग्निहोत्री
माता- श्रीमती सावित्री अवस्थी
पिता- श्री अनिल अवस्थी
जन्मस्थान – छतरपुर (मध्यप्रदेश)
शिक्षा – इंटरमीडिएट (विज्ञान संकाय), स्नातक (कला संकाय), परास्नातक (अंग्रेजी साहित्य), पीजीडीसीए।
संप्रति – स्वतंत्र लेखन, पटकथा लेखन, ।
अभिरुचि – पाककला, पोषाक सज्जा।
प्रकाशित – लोक के राम ( कथेतर पुस्तक) 2025 स्पर्श प्रकाशन, पटना।
गृहशोभा, लघुकथा कलश, किस्सा कोताह, विश्वगाथा, स्रवन्ति (दक्षिण भारतीय हिंदी प्रचारिणी महासभा), दृष्टि, क्षितिज, क्राइम ऑफ नेशन, पलाश, अदिज्ञान, नवल, विभोम स्वर, शुभतारिका, अभिनव इमरोज, विशुद्ध स्वर, शिवना साहित्यिकी, भाषा किरण, प्रेरणा अंशु, अरुणिता, लघुकथा डॉट कॉम, पुरवाई, साहित्य कुञ्ज, इरा, युग प्रवर्तक इत्यादि पत्रिकाओं में कहानी, कविता, लघुकथा, नज़्म और समीक्षाओं का लगातार प्रकाशन।
दैनिक नवभारत, हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी, राजस्थान पत्रिका, हरिभूमि इत्यादि समाचार-पत्रों में रचनाएँ ( समीक्षा, आलोचना, व साहित्यिक-सामाजिक आलेख) प्रकाशित।
तेलुगु, उड़िया, कन्नड़, नेपाली, इत्यादि भाषाओँ में रचनाएँ अनुदित।
साझा संकलन – काव्य पुंज, काव्य निहारिका, दास्तान-ए-किन्नर।
यूट्यूब चैनल (किडलॉजिक्स, बैडटाइम स्टोरी) के लिये पटकथा लेखन।
पुरस्कार:
ü साहित्य संवेद साहित्यिक संस्था द्वारा आयोजित फणीश्वर रेणु स्मृति क्विज में द्वितीय स्थान
ü विश्व गाथा साहित्यिक पत्रिका द्वारा फागुन विषय पर साहित्य पहेली में भाग लेने पर उत्तम रचनाकार के लिए पुरस्कृत।
ü नया लेखन, नया दस्तख़त द्वारा आयोजित लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा “गर्व” पुरस्कृत।
ü माँ धनपति देवी स्मृति में कथा समवेत पत्रिका द्वारा आयोजित अखिल भारतीय ‘अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता-2022’ में कहानी “नई माँ” को प्रोत्साहन पुरस्कार।
üहिंदी अकादमी मुंबई द्वारा आयोजित लघुकथा लेखन प्रतियोगिता- 2025 में प्रथम स्थान।
üआचार्य जगदीश चंद्र मिश्र लघुकथा प्रतियोगिता 2025 में पुरस्कार





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