सपना सिंह
_उनसे बात करके मुझे बहुत बढ़िया लगता था। क़िस्से पे क़िस्से, कहानियों पे कहानियाँ थी उनके पास -कई ज़िंदगी के तजुर्बे से मंझी हुई, और बहुतेरी; इतिहास में उनकी गहन रुचि से चुनी हुई। कहानी सुनाने का गुर शुरू से उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ ही था – सस्पेंस से शुरू करते थे, पहली एक-दो पंक्तियों से ही बांध लेते सुनने वाले को और फिर, और बढ़ते-बढ़ते ख़ूब खुलासा होता असल मुद्दे का – अब अक्सर ये गुर चल जाता, लेकिन कभी-कभार बिल्ड-अप ज़्यादा और असल कम हो तो सुनने वाले सकते में भी आ जाते थे।_
याद है मुझे जब डैडी बैठते थे चाय का कप ले के कुछ सुनाने को तो कितनी ही बार पूरा क़िस्सा खतम कर लेने के बाद ही दम लेते थे और यही सुनने को मिला था, “अरे यार, ये चाय तो ठंडी ही हो गयी”। वो तो भला हो मम्मी का, जो ग़रम कर देते थे उनकी चाय को, कोई और हो तो रोज़-रोज़ यही रूटीन देख कर पस्त ही हो जाए। बचपन की, कॉलेज तक की बड़ी सुखद यादें जुड़ी हैं मेरी, मम्मी-पापा, ख़ासकर पापा के क़िस्सों-कहानियों के आसपास।
लेकिन मैं भी कभी थक जाऊँगी ये तो दूर-दूर से सपने में भी सोचा न था।
“डैडी जल्दी खतम करो यार, मुझे आगे भी जाना है।” वो कोशिश भी करते हैं जल्दी-जल्दी सुनाने की, लेकिन पुरानी आदत है, मस्ती में सुनाने की, सो जल्द में अंत करना शायद उन्हें आता ही नहीं, सो ज़्यादातर एक अनसुना-सा अलगाव ही हो जाता है, बात खतम करते-करते, बात को दोनो तरफ़ से खतम ही नहीं कर पाते – उनका कॉनक्लूज़न हो जाता है लेकिन मेरे पास समय ही नहीं बचता एक सलीके से ‘ख़त्म’ करने का बातों को। एकदम से उठ कर अगले काम की ओर भागना पड़ता है – कभी बच्चों का पिक-अप-ड्रॉप-ऑफ़, कभी ऑफ़िस का कॉल, कभी गाड़ी की सर्विस, कभी लॉंड्री-किचन में कुछ, कभी ग्रोसरी, कभी घर की सफ़ाई, कभी कोई डेडलाइन, कभी कोई झमेला। काम के बाद घर में बचे दो-चार घंटे ऐसे चक्करघिन्नी बन निकलते हैं कि लगता है हर दिन एक लिखा-लिखाया अजेंडा ही बन गया है।
ऐसा नहीं है कि कभी आराम से नहीं बैठ पाते, मिलता है वो समय भी, ज़्यादातर सप्ताहांत पर, एक-दो घंटे तक सुबह का नाश्ता, शाम की चाय बातों की गहमा-गहमी में ही बीतती है। लेकिन मुझे पता है ना, माँ-पापा दोनों के पास इतने क़िस्से हैं कि यह जितना भी मिल रहा है समय, मुझे बड़ा कम लगता है, और इसी चक्कर में कभी-कभार न चाहते हुए भी एक अनजाना-सा पैनिक ही जैसे घेर लेता है, और सारे-का-सारा मज़ा किरकिरा कर देता है। अच्छी-ख़ासी बातों की महफ़िल ऐसे बहस में बदल जाती है कि पड़ोसी भी सोचते होंगे, आज तो कोई गम्भीर ही मुद्दा चल रहा है, और हल निकाल के ही दम लेंगे ये सभी। सुबह की चाय एक-डेढ़ घंटा तो शाम की दो-ढाई, वीकेंड का मज़ा ही अपना है, बात करने का सबका शहूर ऐसा कि एक-एक शब्द पे सबकी नज़र, सबके कान, और सबकी ज़ुबान! उस पर, अब डैडी के कान ज़रा कमजोर हो गए थे, तो कभी-कभार तो ग़लत शब्द सुन लेने पर जब तक अगला उनको सही शब्द बताए – आधा-अधूरा क़िस्सा तो उसी शब्द पर निकल जाता था। इसी आनन-फ़ानन ज़िंदगी में इकट्ठे बैठ कर बातें करने का सिलसिला फिर भी मुक़म्मल जारी रहता रहा।
फिर भी जब भी आराम से बैठना होता, अंदर तक जाती हैं उनकी आवाज़ें, वहीं बैठे-बैठे ख़ुद को एक दम से अलग कर कुछ सेकिंड के लिए एक तीसरे की नज़र से ख़ुद को देखती हूँ तो कितना रूहानी पाती हूँ, कि उनके साथ बैठ कर सुन रही हूँ उनके जीवन के अनुभव – खट्टे-मीठे-कड़वे-सच्चे-छोटे-लम्बे बस सभी।
जैसे इंसान अपने बच्चों के क़िस्से सुनाने से अखरता नहीं कभी, वैसे ही बच्चा अपने माता-पिता की बचपन के क़िस्से सुनने से भी कभी नहीं अखरता। उम्र जितनी लम्बी भी हो जाए, फिर भी अपने ही बचपन से नए-नए क़िस्से ढूँढ निकाल ही लेता है गप्पें मारने वालों का मन! माँ की याद्दाश्त देखती हूँ तो लगता है, “काश मैं भी इस तरह सब याद रख पाती”, इस पर माँ का ये मानना है, “अरे बुढ़ापे में बचपन और भी ज़्यादा साफ़ याद आता है, जैसे बहते पानी की धारा जब धीमी होती हैं तो नीचे रखे पत्थरों के रंग साफ़ नज़र आते हैं वैसे ही रंगीन यादें हो जाती हैं बचपन की यादें बुढ़ापे में, एक-एक को अलग-अलग से निकाल सकते हो।”…. पकड़ लेना चाहती हूँ इस आशा को मैं भी, लेकिन दिन में पचास बार फ़ोन गुम कर के ढूँढना पड़े, और फिर कमरे में जाते ही भूल जाओ क्यों आए थे, बोलते-बोलते किसी शब्द का यों गुम हो जाना जैसे कभी डिक्शनरी में था ही नहीं…इस सब के रहते मुझे तो कोई उम्मीद नहीं कि मेरा बुढ़ापा इतने क़िस्से-कहानियाँ याद रख पाएगा!
उस दिन डैडी को बोला चाय बनाने की आपकी बारी है, और मैं भी उनके साथ ही लग ली किचन में और छुट-पुट देखने को। डैडी बड़ा कढ़ा-कढ़ा के मस्त स्ट्रोंग चाय बनाते हैं, तो हफ़्ते में एक-दो बार कम से कम उनकी बारी आती ही है, चाय बनाने की। “यार डैडी आप तो चार-एक साल के थे ना पार्टिशन के समय?”
“हाँ, यही कुछ उम्र थी मेरी”
“तो आपने वैसे तो ज़्यादातर यहाँ आने के बाद के अपने बचपन के गाँवों के क़िस्से ही सुनाए हैं, और आपके बचपन के क़िस्सों में तो बड़ा संतोष-सा है, कमी रही चाहे लेकिन आपने कभी एक भी त्रासद पिक्चर नहीं दी अपने बचपन की, हमेशा बड़े इन्स्पाइरिंग क़िस्से ही सुनाए हैं। पर आपको पार्टिशन के उस समय की कुछ याद है, दादा जी- माता जी के साथ बॉर्डर-पार आने की?”
“हाँ, हैं याद तो, कोई धुंधली टूटी-टूटी यादें हैं – मुझे ट्रेनें याद हैं, बड़ी सारी ट्रेनें और छकड़े जिन पर हम आए थे।”
“छकड़े? यानी बैल-गाड़ी?”
“नहीं, नहीं -छकड़ा भी ट्रेन ही होती है, माल-गाड़ी जैसी, उसमें कोई डब्बा नहीं होता, बस ‘फ़्लैट’ सी होती है……उस पर बंदे के ऊपर बंदा, बस बहुत ही ज़्यादा लोग-ही-लोग किसी तरह लटके-अटके हुए, हम बच्चों को तो बड़ा कस के पकड़ा हुआ था। फिर दूसरी ट्रेन डब्बों वाली थी, उसमें भी नक्को-नक्क लोग भरे हुए थे, उसमें बड़े दिन रहे हम।
“कुछ याद है लगभग कितने दिन?”
“हाँ, यही कोई दस-बारह दिन तो थे ट्रेन पर। फिर याद है मुझे ‘इटारसी’ की, अभी भी शब्द नया-सा लगता है, ‘इटारसी, इटारसी’ तब पता थोड़े ही था ‘इटारसी’ क्या है, बस बोलने में मज़ा आ रहा था?? – हमारी ट्रेन ‘इटारसी’ पहुँची थी, या जाना था वहाँ, ठीक से याद नहीं। फिर वहाँ से ट्रेन में ही वापिस हुए….…लगातार ट्रेन-पे-ट्रेन याद हैं मुझे, कोई इधर को जा रही है, कोई उधर को, यहाँ-वहाँ से बस ट्रेनें, एक साथ कितनी ही ट्रेनें, धीमी-तेज, धड़-धड़-धड़-धड़ लगातार। फिर हमारी ट्रेन रुक गयी, बड़ा शोर मच गया, उधर से एक छकड़ा ट्रेन आयी, बस….. उसमें लाशें ही लाशें भरी हुई थी, कटे हुए हाथ-टाँगे-सर, छकड़े पे छकड़ा भरा हुआ उनसे ही …. सारा शोर एक दम बंद हो गया वो ट्रेन जब हमारी ट्रेन के साथ से गुज़री, मैंने भी देखी, खिड़की से …… तो वो तो याद है मुझे।”
इसके बाद …निस्तब्धता-नि:शब्दता छा गई,…. आगे के शब्दों में कुछ कहने की क्षमता गुम ही हो गई या ज़ुबान काठ मार गई उनकी! बचपन की जिस ज़हरीली कठोर याद को अपनी अंतरगुहा के तहख़ाने में इतने वर्षों से दफ़नाए रखा था, वो इतनी स्पष्टता से यूँ-की-यूँ मन में झांकने लगेगी उन्होंने शायद सोचा भी ना था। और मेरी भी हिम्मत ना पड़ी उनसे ये पूछने की, कि पापा पहले भी कई बार हमने पार्टीशन की त्रासदी पर बात की है लेकिन ये..तो ..!!
चाय बन चुकी थी, और पापा दूसरी ओर पलट कर उसको छान रहे थे। हम दोनो के आगे शब्दों का बस एक ख़ाली मरूस्थल-सा फैल रहा था, और मैं एक-दम लगे शॉक में से उबरने को ढूँढ रही थी कोई शब्द जो तोड़ सके इस निःशब्दता को।
डैडी ने मुझे अपने अदृश्य हाथ से पकड़ के वहीं धँसने से बचा लिया, “आ जाओ बेटा, चाय पी लेते हैं। आज तुमसे ख़ास बात करनी है मैंने अपनी कविताओं की किताब के बारे में, आ जाओ जल्दी से अब लिविंग-रूम में…!”





