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“हिंदू राष्ट्र” के विरोधी और समाजवाद के समर्थक थे सुभाष चंद्र बोस

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“हिंदू महासभा ने सन्यासियों और सन्यासनियों को त्रिशूल लेकर वोट मांगने के लिए भेजा है। हिंदू लोग भगवा रंग और त्रिशूल के सामने शीश नवाते हैं। इसका लाभ उठाते हुए हिंदू महासभा, धर्म को राजनीति के साथ मिलाकर, प्रदूषण फैला रही है। उनकी बात मत सुनिए। यह बात गलत है कि हिंदू हिंदू राष्ट्र चाहते हैं, क्योंकि वह बहुमत में है। हिंदू और मुसलमान के हित अलग हैं, यह बात सच्चाई से परे है। प्राकृतिक आपदाएं और महामारियां धर्मों के बीच भेदभाव नहीं करती।”
सुभाष चंद्र बोस, 12 मई 1940,
झारग्राम, पश्चिम बंगाल,
,,,,,आनंद बाजार पत्रिका 14 मई 1940

   आजादी के अद्भुत नक्षत्र सुभाष चंद्र बोस को आज कुछ लोग हड़पने की कोशिश कर रहे हैं, मगर अपने मिशन में, अपने लक्ष्य में, अपनी राजनीति में, सुभाष चंद्र बोस धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के पक्षधर थे। हिंदू मुस्लिम एकता के अलंबरदार थे। आइए देखें समाजवाद के बारे में भी क्या कहते हैं,,,,,,,,
" इसमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि हमारी गरीबी, निरक्षरता और बीमारी का उन्मूलन और वैज्ञानिक उत्पादन और वितरण से संबंधित समस्याओं का प्रभावी समाधान समाजवादी मार्ग पर चलकर ही प्राप्त किया जा सकता है।" 
,,,,,, 1938 के हरीपुरा कांग्रेस के अध्यक्ष पद से भाषण का एक अंश।
 इसके अतिरिक्त सुभाष चंद्र बोस भारत में एक संप्रभु, स्वतंत्र, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी गणतंत्र की स्थापना चाहते थे। जातिवाद, संप्रदायवाद और गुलामी के खिलाफ थे। वे किसी भी तरह भारत की आजादी चाहते थे। वे आजादी के दीवाने थे इसे पाने के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया था। सुभाष चंद्र बोस भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाना चाहते थे। वे हिंदू मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे और गंगा जमुनी तहजीब में विश्वास करते थे।
  दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन से जापान जाते समय उनके साथ आबिद हसन थे और जब सुभाष चंद्र बोस के विमान को दुर्घटनाग्रस्त किया गया तो उस समय उनके साथ  हबीबुर्रहमान थे। इसके अलावा  वे हिंदू मुस्लिम एकता चाहते थे। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने सिंगापुर में जो अंतरिम सरकार बनाई थी उसमें चार हिंदू थे और चार मुसलमान।
यही है सुभाष चंद्र बोस की विरासत,जिसे हमें आगे बढ़ाना है और भारत को एक संप्रभु, आजाद, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, गणराज स्थापित करने /बनाने के अभियान में दिलो जान से शिरकत करनी होगी। 
 जय हिंद।

,,,,,, अनुवाद एवं प्रस्तुति मुनेश त्यागी

Ramswaroop Mantri

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