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एसआईआर प्रक्रिया पर चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है, जिसमें तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर जवाब मांगा गया है।

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि इन राज्यों और बिहार में एसआईआर से संबंधित मामलों पर संबंधित हाईकोर्ट में चल रही याचिकाओं की सुनवाई को फिलहाल स्थगित रखा जाए। अदालत इस मामले की अगली सुनवाई 26 नवंबर 2025 को करेगी।

पीठ ने आदेश में कहा — “चूंकि यह अदालत पहले से ही बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी सहित विभिन्न राज्यों में एसआईआर की वैधता से संबंधित मामलों की सुनवाई कर रही है, इसलिए संबंधित हाईकोर्ट्स से अनुरोध किया जाता है कि वे इन राज्यों में एसआईआर से संबंधित किसी भी लंबित याचिका की कार्यवाही को स्थगित रखें।”

ये याचिकाएं द्रविड़ मुनेत्र कड़गम, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), पश्चिम बंगाल कांग्रेस की मोस्तारी बनू, और टीएमसी सांसद डोला सेन सहित कई राजनीतिक दलों और व्यक्तियों द्वारा दायर की गई हैं।

सुनवाई की शुरुआत में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, जो डीएमके सचिव आर.एस. भारती की ओर से पेश हुए, ने कहा कि कई राज्यों में एक समान समय पर एसआईआर कराना अतार्किक है। उन्होंने बताया कि नवंबर-दिसंबर में तमिलनाडु में भारी बारिश और बाढ़ राहत कार्य चलते हैं, दिसंबर में क्रिसमस अवकाश होता है और जनवरी में पोंगल का त्यौहार, ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अपने घरों पर नहीं होते, जिससे यह समय एसआईआर के लिए सबसे अनुपयुक्त है।

सिब्बल ने कहा कि 27 अक्टूबर के चुनाव आयोग के आदेश ने पहले जारी जून के आदेश से भिन्न दिशा दी है, क्योंकि अब दस्तावेज़ केवल तब जमा करने होंगे जब इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर उनसे मांगे। इस पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा — “जो भी कमी थी, आयोग ने उसे ठीक कर दिया है।” सिब्बल ने आगे कहा कि ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं है, इसलिए लोग ऑनलाइन दस्तावेज़ अपलोड नहीं कर पाएंगे।

इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा —आप लोग इतने चिंतित क्यों हैं? उन्हें (आयोग को) यह करना ही होगा।”

सिब्बल ने पूछा — “आखिर इतनी जल्दीबाजी क्यों?” उन्होंने आगे कहा कि पश्चिम बंगाल में स्थिति और भी खराब है। इस पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने टिप्पणी की — “ऐसा लग रहा है जैसे यह पहली बार हो रहा है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया जा रहा है! हमें भी जमीनी हालात पता हैं।”

सिब्बल ने जवाब दिया कि पहले पुनरीक्षण वर्षों तक चलते थे, लेकिन इस बार केवल एक महीने का समय दिया गया है।

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा — “यह काम एक संवैधानिक संस्था कर रही है। यदि कोई प्रक्रिया संबंधी गलती होती है तो बताइए, उसे सुधारा जाएगा।”

सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी, जो चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए, ने कहा — “यह तो ऐसी स्थिति हो गई है कि अब राज्य यह साबित करने में लगे हैं कि कौन ज़्यादा पिछड़ा है।” उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि हाईकोर्ट्स को समान मामलों में हस्तक्षेप से रोका जाए, ताकि विरोधाभासी आदेश जारी न हों। अदालत ने इस पर सहमति जताई।

वहीं, एआईएडीएमके की ओर से अधिवक्ता बालाजी श्रीनिवासन ने कहा कि उनकी पार्टी ने एसआईआर के समर्थन में एक आवेदन दायर किया है। उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि सत्तारूढ़ पार्टी कह रही है कि तमिलनाडु के ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं है। अदालत ने सुझाव दिया कि यदि एआईएडीएमके एसआईआर को किसी विशेष तरीके से कराना चाहती है, तो वह नई याचिका दायर करे।

बिहार एसआईआर को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं लंबित हैं। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की है और अवैध तरीके से नाम हटाए और जोड़े गए हैं। उन्होंने एसआईआर की वैधता पर सवाल उठाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले आयोग को निर्देश दिया था कि आधार कार्ड को पहचान दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किया जाए और हटाए गए मतदाताओं के नाम सार्वजनिक किए जाएं।

डीएमके, माकपा और कांग्रेस विधायक के. सेल्वापेरुंधागई ने तमिलनाडु एसआईआर को चुनौती दी है। डीएमके ने कहा कि अक्टूबर 2024 से जनवरी 2025 के बीच पहले ही एक स्पेशल समरी रिवीजन किया जा चुका है और नई एसआईआर के ज़रिए नागरिकता जांच जैसी शर्तें लगाई जा रही हैं, जो चुनाव आयोग का अधिकार नहीं है।

याचिका में कहा गया है कि यह प्रक्रिया नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत केवल केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती है। आयोग द्वारा नागरिकता की जांच करना संविधान के अनुच्छेद 10, 14, 19, 21 और 326 का उल्लंघन है और यह मताधिकार व संघीय ढांचे को प्रभावित करता है।

वहीं, एआईएडीएमके ने एसआईआर का समर्थन करते हुए कहा कि यह मतदान प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखने और फर्जी मतदाताओं को रोकने के लिए आवश्यक कदम है।

टीएमसी सांसद डोला सेन और पश्चिम बंगाल कांग्रेस ने एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती दी है, यह कहते हुए कि इससे मतदाताओं का बड़े पैमाने पर बहिष्कार हो सकता है।

एडीआर की अर्जी पर भी चुनाव आयोग से जवाब माँगा

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (11 नवंबर) को मतदाता सूची में एक ही व्यक्ति की कई प्रविष्टियों की पहचान के लिए डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल के सुझाव को मौखिक रूप से स्वीकार कर लिया। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची की पीठ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा दायर एक आवेदन पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें भारत के चुनाव आयोग को कई राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान कुछ निर्देश देने की मांग की गई थी।

एनजीओ की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पीठ को बताया कि एक डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर है जिसका इस्तेमाल चुनाव आयोग कई प्रविष्टियों को हटाने के लिए कर सकता है। न्यायमूर्ति कांत ने कहा, “यह एक अच्छा सुझाव है; इसमें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।”

आवेदन में एक और निर्देश मांगा गया था कि चुनाव आयोग को एसआईआर के माध्यम से मतदाताओं की नागरिकता का निर्धारण न करने का निर्देश दिया जाए, क्योंकि चुनाव आयोग के पास नागरिकता सत्यापन का अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति कांत ने कहा, “अगर उनके पास शक्ति है, तो वे निर्धारण करेंगे। अगर नहीं, तो वे नहीं करेंगे। यह मुद्दा अंतिम मामले में उठेगा।”

आवेदन में अगला निर्देश यह मांगा गया था कि चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया जाए कि गणना फॉर्म जमा करने वाले सभी मतदाताओं को एक पावती पर्ची दी जाए। भूषण ने कहा, “ये फॉर्म वेबसाइटों पर अपलोड नहीं किए जा रहे हैं। इसलिए लोगों के पास इस बात का सबूत नहीं है कि उन्होंने गणना फॉर्म जमा किया है।”

इसके बाद, भूषण ने आग्रह किया कि चुनाव आयोग 2002 की मतदाता सूची को मशीन-पठनीय रूप में उपलब्ध कराए ताकि मतदाता 2002 की मतदाता सूची में अपने माता-पिता के नाम आसानी से खोज सकें। इस बिंदु पर, पीठ ने कमलनाथ मामले में 2018 के आदेश का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि मतदाता सूची को मशीन-पठनीय रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है।

अंततः, पीठ ने एडीआर की अर्जी पर चुनाव आयोग से जवाब माँगा। पीठ ने भूषण से सूची में पासवर्ड-सुरक्षित प्रविष्टि रखने के सुझाव पर भी विचार-विमर्श करने को कहा। न्यायालय इस मामले पर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में एसआईआर को चुनौती देने वाली अन्य याचिकाओं के साथ 26 नवंबर को सुनवाई करेगा।

Ramswaroop Mantri

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