सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) सुप्रीम कोर्ट द्वारा वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 पर दिए गए आदेश का स्वागत करती है। अदालत ने अधिनियम की कुछ सबसे आपत्तिजनक धाराओं पर अंतरिम रोक लगाकर यह साफ़ कर दिया है कि संसद या सरकार की मनमानी हमेशा संवैधानिक कसौटी पर खरा नहीं उतर सकती। विशेष रूप से, अदालत द्वारा “पाँच साल से इस्लाम मानने की शर्त” और जिलाधिकारी को वक्फ संपत्तियों पर मनमाना निर्णय लेने की शक्ति पर रोक लगाना एक बड़ा कदम है। यह निर्णय वक्फ संपत्तियों की स्वायत्तता और समुदाय के अधिकारों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण है।
लेकिन यह फैसला पूरी तरह पर्याप्त नहीं है। अधिनियम के कई प्रावधान अब भी बने हुए हैं जो वक्फ संपत्तियों की ऐतिहासिक स्थिति, समुदाय की भागीदारी और न्यायसंगत प्रक्रियाओं को प्रभावित करेंगे। “वक्फ बाय यूज़” जैसी धारणाओं को कमजोर कर देना, गैर-मुस्लिम सदस्यों की भागीदारी सीमित करना और CEO की नियुक्ति में पक्षपातपूर्ण झुकाव रखना लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं है।
सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) का मानना है कि एक समुदाय विशेष की धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं को कमजोर करना, सत्ता और पूंजी की मिली जुली चाल का हिस्सा है, और हम इसकी विरोध करते हैं। किसी भी धार्मिक संस्थान की स्वायत्तता पर अतिक्रमण संविधान और समाजवाद की भावना दोनों के ख़िलाफ़ है। वक्फ मामले में हमारा मानना है कि इसकी संपत्तियों की रक्षा और प्रबंधन पारदर्शी, न्यायपूर्ण और समुदाय-हितैषी होना चाहिए। अदालत को इस मामले में अपने अंतिम निर्णय में इसके बचे हुए प्रावधानों पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।
सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) सुप्रीम कोर्ट से यह उम्मीद करती है कि अंतिम सुनवाई में और राहत दी जाएगी तथा वक्फ अधिनियम को इस रूप में ढाला जाएगा जो न्याय, बराबरी और लोकतांत्रिक नियंत्रण के सिद्धांतों के अनुरूप हो।
बसंत हेतमसरिया
राष्ट्रीय प्रवक्ता, सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया)
मो. 9934443337





