अग्नि आलोक
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बातें मीठी मीठी बातें

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शशिकांत गुप्ते

यकायक इस फिल्मी गीत का स्मरण हुआ।
मीठी मीठी बातों से बचना ज़ारा
दुनिया के लोगों में हैं जादू भारा

सन 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म कैदी नंबर 911 फ़िल्म का गीत जिसे लिखा है गीतकार हसरत जयपुरी ने।
इस गीत में भावीपीढ़ी को सवाल है?
झूम झूम तूफा की नज़र
राह घेरले तेरी अगर
होगा अँधेरा कोई न तेरा
फिर तू कैसे बचेगा कैसे हमको बता
भावीपीढ़ी का जवाब
तूफानों से नहीं डरूंगा
हिम्मत से मैं निकल पड़ूंगा

यह गीत छः दशक पूर्व लिखा गया है।
देश-काल-स्थिति के नियमानुसार छः दशक पूर्व की समस्याएं और आज की समस्याओं में अंतर होना स्वाभाविक है।
तात्कालिक समस्याएं इतनी भयावह नहीं थी,जितनी आज है।
आज की समस्याओं के लिए सुनामी जैसे तूफान की उपमा भी कम पड़ सकती है।
आज की भावीपीढ़ी को उक्त गीत की पंक्तियों को गम्भीरता से समझना अनिवार्य है।
आज समस्याओं के निदान के लिए सिर्फ और सिर्फ मीठी मीठी बातें ही की जा रही है।
इन मीठी मीठी बातों के माध्यम से तमाम समस्याओं को हल करने के लिए कागजी कार्यवाही कर कागजों पर ही हल किया जा रहा है।
यथार्थ में मीठी मीठी बातें ही है।
कसमें वादें प्यार वफ़ा सब बाते हैं बातों का क्या
कोई किसी का नहीं है झूठे नाते है नातों का क्या

यही वास्तविकता है।
मीठी मीठी बातें करने वाले इस कहावत को चरितार्थ करतें हैं।
अंधा बांटे रेवड़ी,अपने अपनो को ही दे
सत्ता के मद में अंधे बनकर रेवड़ियां अपनो को बांटना मतलब, सम्भवतः यही निजीकरण के ओर बढतें कदम हो सकतें हैं।
Party with different का यह साफ सुथरा चरित्र तारीफेकाबिल है।
जो अपने निजी सम्बंधित हैं,उन्हें लाभ होना ही चाहिए।
अपने निजी हैं उन्हें छोड़ बाकी लोगों की निजता भी कोई मायने नहीं रखती है,उनकी निजता पर भी अप्रत्यक्ष अंकुश लग सकता है?
पार्टी विथ डिफरेंट के जो निजी सम्पर्क में हैं वे दिन,दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहें हैं।
संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्वच्छंददा से यदि कोई उपयोग करता है?कोई व्यवस्था पर प्रश्न उठता है? वह प्रताड़ित होता है।
सजगपरहरियों द्वारा व्यवस्था की लापरवाही की कोई भी खबर प्रस्तुत करना साहस का कार्य हो गया है। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के सजगप्रहरी अलोकतांत्रिक मानसिकता के शिकार हो जातें हैं।
इसलिए मीठी मीठी बातों से बचना ही चाहिए?

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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