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ईयू और अमेरिका के संबंधों में तनाव,ट्रंप का उल्टा पड़ा दांव

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वॉशिंगटन. भारत-यूरोपीय यूनियन रिश्तों में भू-राजनीतिक विस्फोट का क्षण आ चुका है. 27 जनवरी अब सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन बदलने वाला दिन बनता जा रहा है. भारत और ईयू के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) और रक्षा सहयोग पर संभावित मुहर दुनिया की रणनीतिक धुरी को नई दिशा देने वाली है. यूरोप की बेचैनी अब छुपी नहीं रह गई है. जिस अमेरिका को दशकों तक यूरोप ने सुरक्षा कवच और रणनीतिक गारंटर माना, वही अमेरिका आज दबाव, धमकी और अनिश्चितता का पर्याय बन चुका है.
ट्रंप के कार्यकाल में ईयू और अमेरिका के संबंधों में तनाव देखने को मिला. ट्रंप की प्रेशर पॉलिटिक्स ईयू को अमेरिका से दूर धकेल रहा है. ट्रंप ईयू को टैरिफ की धमकियां देकर अपनी शर्तों पर व्यापार करने की कोशिश कर रहे हैं. वर्तमान में अमेरिकी राष्ट्रपति ने जैसे हालात पैदा कर दिए हैं, इसकी वजह से यूरोपीय देश अपने लिए एक स्थिर और भरोसेमंद साझेदार की तलाश में भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं.

डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति और ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडा ने ईयू को सीधे तौर पर दीवार से लगा दिया है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मार्शल प्लान से यूरोप को खड़ा करने वाला अमेरिका, नाटो के जरिए सुरक्षा देने वाला वही देश आज यूरोप को आर्थिक और रणनीतिक बंधक बनाने पर उतारू दिख रहा है. ट्रंप की टैरिफ धमकियां, व्यापारिक दबाव और ग्रीनलैंड पर कब्जे जैसे बयान यूरोप के लिए सीधी चेतावनी बन चुके हैं.

ट्रंप की प्रेशर पॉलिटिक्स से ईयू का सब्र टूटा
ईयू अब यह समझ चुका है कि अमेरिका के भरोसे रहना रणनीतिक आत्महत्या हो सकती है. ट्रंप प्रशासन की नीतियों ने यूरोप को मजबूर कर दिया है कि वह एक नए, स्थिर और भरोसेमंद वैश्विक साझेदार की तलाश करे और यही वह जगह है जहां भारत निर्णायक खिलाड़ी बनकर उभरा है.

भारत: विकल्प नहीं, मजबूरी
आज की दुनिया में भारत सिर्फ एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता का स्तंभ बन चुका है. लोकतांत्रिक मूल्य, विशाल बाजार, रणनीतिक स्वतंत्रता और संतुलित विदेश नीति – इन सबने भारत को ईयू के लिए अमेरिका का एकमात्र विश्वसनीय विकल्प बना दिया है.

ग्रीनलैंड विवाद ने आग में घी डाला
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की बयानबाज़ी ने यूरोप की चिंताओं को और भड़का दिया है. ईयू खुलकर अमेरिका के खिलाफ खड़ा है, लेकिन सच्चाई यह भी है कि अगर अमेरिका पीछे हटता है तो ईयू और नाटो की मौजूदा संरचना पूरी तरह हिल जाएगी. यही डर यूरोप को भारत की ओर और तेज़ी से धकेल रहा है.

नया वैश्विक समीकरण लिख रहा है भारत
आज भारत सिर्फ व्यापार समझौता नहीं कर रहा, बल्कि एक टूटते ट्रांस-अटलांटिक रिश्ते की जगह ले रहा है. भारत-ईयू डील साफ संकेत है कि दुनिया अब एकध्रुवीय अमेरिका-केंद्रित व्यवस्था से बाहर निकलकर बहुध्रुवीय युग में प्रवेश कर चुकी है.

Ramswaroop Mantri

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