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मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति विवादों के बीच

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सनत जैन

केंद्र सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कर दी है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने के कारण नियुक्ति की कार्रवाई टालने का अनुरोध कमेटी से किया था। नेता प्रतिपक्ष के अनुरोध को सरकार ने नहीं माना और बहुमत के आधार पर नियुक्ति कर दी है। लोकतंत्र की सफलता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों पर निर्भर करती है।

भारत में इस जिम्मेदारी को निभाने का दायित्व चुनाव आयोग के पास संवैधानिक रूप मे है। हाल ही में सरकार ने बहुमत के आधार पर चुनाव आयोग में महत्वपूर्ण नियुक्ति की है। ज्ञानेश कुमार को नया मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) बनाया गया है। यह नियुक्त ऐसे समय पर हुई है जब चुनाव आयोग को लेकर सबसे ज्यादा विवाद की स्थिति देखने को मिल रही है। चुनाव आयोग भारतीय लोकतंत्र की निष्पक्षता और पारदर्शिता का सबसे बड़ा प्रहरी है। चुनाव आयोग लोकतंत्र के लिए रीड की हड्डी की तरह है। इसकी जिम्मेदारी केवल चुनाव कराना नहीं है। बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है, सभी राजनीतिक दल, प्रत्याशी, आचार संहिता का पालन करें। आम जनता को चुनाव पर विश्वास हो। हर नागरिक अपने मताधिकार का उपयोग कर पाए। यह सुनिश्चित करना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है।

मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति ऐसे समय पर हुई है जब चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली को लेकर देश की विभिन्न हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में सरकार द्वारा बनाये गए चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए जो कानून बनाया गया है। उसको सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। उसकी सुनवाई 18 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में हो रही है। मामला न्यायालय में लंबित होने के बाद भी सरकार ने नेता प्रतिपक्ष की आपत्ति के बाद, बहुमत के आधार पर नियुक्ति कर दी है जिसके कारण इस नियुक्ति पर विवाद गहरा गया है। पहली बार पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन सेशन ने चुनाव आयोग के अधिकार बताए। निष्पक्ष चुनाव कैसे कराए जाते हैं, यह उन्होंने करके दिखा दिया था। टीएन सेशन जब मुख्य चुनाव आयुक्त थे।

तब सरकार और राजनेता उनके फैसलों से घबराते थे। उन्होंने चुनाव के दौरान सभी की जिम्मेदारी तय करके जवाब देह बनाया था। पिछले कुछ वर्षों से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार विवाद सामने आये हैं। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नजर अंदाज करते हुए जिन तीन लोगों की कमेटी बनाने का जो आदेश सरकार को दिया था। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करते हुए जो कानून बनाया। जिसमें प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त एक केंद्रीय मंत्री तथा नेता प्रतिपक्ष को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने का अधिकार दिया गया। इस कानून के बनने के बाद से ही इसका विरोध शुरू हो गया था। सुप्रीम कोर्ट में सरकार के इस कानून को चुनौती दी गई है।

चुनाव आयोग की नियुक्ति में सरकार का बहुमत होने के कारण निष्पक्ष चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर सवाल खड़े किए गए। सरकार ने जो चुनाव आयुक्तों नियुक्ति की थी। वह अभी भी सुप्रीम कोर्ट में विवादित है। मुख्य चुनाव आयुक्त पर निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की जिम्मेदारी होती है। विपक्षी राजनीतिक दल सरकार द्वारा बनाए गए कानून का विरोध कर रहे हैं। पूर्व में जिस तरह की नियुक्ति की गई है, उसका भी विरोध कर रहे हैं। लोकसभा और विधानसभाओं के जो चुनाव हाल ही में हुए हैं। उसको लेकर चुनाव आयोग के ऊपर तरह-तरह के आरोप हैं।

चुनाव आयोग द्वारा विपक्षी दलों को कोई जानकारी और स्पष्टीकरण नहीं दिया जा रहा है। सरकार और चुनाव आयोग पारदर्शिता को खत्म कर जानकारी भी देना नहीं चाहती है। जिसको लेकर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एवं कार्यप्रणाली पर विपक्षी दलों में अविश्वास है। हाल में संपन्न हुए चुनाव में ईवीएम और वीवीपैट को लेकर कई तरह की शंकाएँ उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों द्वारा व्यक्त की गई हैं। मतदाताओं के नाम काटने और जोड़ने को लेकर तरह-तरह के आरोप लगाए गए हैं। इस स्थिति में सरकार ने जिस तरह से मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की है। उससे चुनाव की विश्वसनीयता खत्म होंगी। जो चिंता का विषय है।

Ramswaroop Mantri

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