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सरकारी प्लेन से भागे व्यापमं घोटाले में फंसे राज्यपाल रामनरेश यादव राज्यपाल को बचाने की जिम्मेदारी बीजेपी सरकार ने उठाई

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भोपालः 7 जुलाई, 2013 की तारीख मध्य प्रदेश की राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण है। इसी दिन बहुचर्चित व्यापमं घोटाले को लेकर पहला मामला इंदौर में दर्ज किया गया था। इसके बाद तो इसने ऐसा तूल पकड़ा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर कई मंत्री, नौकरशाह और यहां तक कि प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल भी इसमें फंसते चले गए। ताज्जुब यह कि सारी उम्र कांग्रेस की राजनीति करने वाले राज्यपाल को बचाने की जिम्मेदारी बीजेपी सरकार और उसके मुख्यमंत्री ने उठाई।

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जुलाई, 2013 के बाद जब एमपी में व्यापमं घोटाले ने जोर पकड़ा तो रोज नए-नए खुलासे होने लगे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर भी रोजाना आरोप लगने लगे। कांग्रेस की ओर से दिग्विजय सिंह और विवेक तन्खा इसे हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। इसी दौरान एक दिन वो हुआ जिसके बारे में शायद ही किसी ने कल्पना की थी। प्रदेश के सबसे बड़े संवैधानिक पद पर बैठे राज्यपाल भी इसकी जद में आ गए।

तत्कालीन राज्यपाल रामनरेश यादव के खिलाफ वनरक्षक भर्ती परीक्षा, 2013 के मामले में धोखाधड़ी का प्रकरण दर्ज किया गया। प्रदेश के इतिहास में वे पहले राज्यपाल बन गए जिनके खिलाफ पद पर रहते हुए धोखाधड़ी का मामला दर्ज हुआ। रामनरेश यादव इसमें अकेले नहीं फंसे थे। उनके दोनों बेटे और ओएसडी के खिलाफ भी पैसे लेकर नियुक्तियां कराने के आरोप लगे थे।

व्यापमं की जांच के लिए बनी एसआईटी को एक्सेल शीट में रामनरेश यादव के खिलाफ वनरक्षक परीक्षा में पांच उम्मीदवारों को पास कराने के सबूत मिले थे। उनके बेटे शैलेष यादव पर 10 उम्मीदवारों से पैसे लेने के आरोप लगे। सबसे रोचक मामला राज्यपाल के ओएसडी धनराज यादव का था। उसे बेईमानी के धंधे में भी ईमानदारी बरती थी। धनराज ने ग्वालियर के एक लड़के से पुलिस में सिपाही बनने के लिए पांच लाख रुपये लिए थे। पैसे देने वाला युवक लिखित परीक्षा में पास हो गया, लेकिन फिजिकल टेस्ट में उसका सेलेक्शन नहीं हुआ तो धनराज ने पैसे लौटा दिए।

जैसे ही ये सबूत सामने आए, राज्यपाल के इस्तीफे की अफवाहें सामने आने लगीं। रोज सुबह खबर आती कि रामनरेश यादव आज इस्तीफा दे सकते हैं। जब उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई तब एक दिन अचानक राज्यपाल भोपाल एयरपोर्ट पर नजर आए। उनके हाथों में चार-पांच सूटकेस थे। उन सूटकेसों में क्या था, यह तो आज तक पता नहीं चला, लेकिन उस समय लोगों ने यही समझा कि राज्यपाल भोपाल छोड़ कर भाग गए।

रामनरेश यादव घाघ कांग्रेसी नेता थे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके थे। उन्होंने सारी उम्र कांग्रेस की राजनीति की थी और दिग्विजय सिंह की सिफारिश पर उन्हें राज्यपाल बनाया गया था। व्यापमं में फंसने के बाद रामनरेश यादव बीजेपी सरकार के भरोसे थे तो कांग्रेसी उनके इस्तीफे की मांग पर अड़े हुए थे।

बीजेपी सरकार और सीएम शिवराज राज्यपाल को बचाने में इसलिए लगे थे क्योंकि कहीं न कहीं उनकी अपनी गर्दन इसमें फंसी हुई थी। उन्हें डर था कि राज्यपाल ने इस्तीफा दिया तो देर-सबेर शिवराज को भी मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ेगा। सरकार की मदद से रामनरेश यादव सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। राज्यपाल पद पर रहने तक गिरफ्तार नहीं किए जाने की रियायत उन्हें सुप्रीम कोर्ट से मिल गई। इसके बाद जबलपुर हाई कोर्ट ने भी उनके खिलाफ एफआईआर निरस्त करने का आदेश दे दिया। ये सब तब हुआ जबकि हाई कोर्ट के निर्देश पर ही एसटीएफ ने राज्यपाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था।

रामनरेश यादव को फौरी तौर पर तो इस मामले में राहत मिल गई, लेकिन वे इससे पूरी तरह उबर नहीं पाए। करीब दो साल बाद उनके बेटे शैलेश यादव की लखनऊ स्थित सरकारी आवास में मौत हो गई। परिवार के लोगों ने मौत का कारण ब्रेन हैमरेज बताया, लेकिन आरोप लगे कि शैलेष की मौत जहर के चलते हुई थी।

Ramswaroop Mantri

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