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लोकजीवन में रामजी का मोहक स्वरूप 

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सुसंस्कृति परिहार

आज भले अयोध्या में नवनिर्मित राम मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा के आयोजन में वी वी आई पी लोग उपस्थित हो रहे हों किन्तु राम भारतीय लोक जीवन में ना तो राजनैतिक है ना ही भगवान।वे अवध के राजकुमार के रूप में घर घर में पैदा होने वाले बालक के रुप में सामने आते हैं। इसलिए राम जनम के बधाई गीत गाए जाते हैं।इतना ही नहीं उसके नामकरण में राम ज़रूर शामिल होता है मसलन भोला राम,गोलूराम,रामलाल, रामदीन वगैरह वगैरह। सम्पन्न घरों में वे राघवेन्द्र,राघव , रामचंद्र, रामावतार, रामरतन, रामेश्वर,रामेन्द्र के रुप में मिलते हैं। लोकजीवन में ऐसी आस्था राम के प्रति कि वे बच्चे को जब जब पुकारेंगी।राम का सुमिरन हो जाएगा।

यह बच्चा जब ठुमक ठुमक चलने लगता है तब भी राम का साकार और मोहक रुप ही सबके सामने आता है कहां तो सभी जगह यही कहा जाता है बच्चों में भगवान होते हैं क्योंकि उनके अंदर अपने पराए का  जैसी कोई भावना नहीं होती।वे निश्छल और विमल भावों से ओत प्रोत होते हैं मतलब यह है कि राम इस तरह घर घर में मोहक स्वरूप में आते हैं।

लेकिन सिर्फ बचपन के भोलेपन में ही राम नहीं रहते जब उनका उपनयन या विवाह संस्कार होता है तब भी जो लोकगीत गाए जाते हैं उनमें सभी को राम की दूल्हा छबि ही नज़र आती मिथिला हो या बुंदेलखंड सब जगह दूल्हे को बनरा( वर) राम ही सम्बोधित किया जाता है मिथिला में राम बरवा गोदिया लेले/ जेकर जनेववा होवे। इस तरह विवाह के गीतों की भाषा में भी दूल्हे में राम को देखा जाता हैं। जैसे- मिथिला के लोकगीतों में हर दामाद राम का स्वरूप है। उसे राम कह कर ही संबोधित किया जा रहा है। बुंदेलखंड में गाते हैं मोरे रामचंद्र धनुर्धारी बनरा की छबि न्यारी, बारात आई रे  बजने लगे रामजी के बाजे जैसे गीत बारात आगमन पर गाते हैं।इसी तरह दूल्हा राम राजा से ररिया करते जनक पुरी की सखियां तरह तरह की बातें करती हैं। वैवाहिक कार्यक्रम में दशरथ परिवार और जनकपुरी आमने सामने होती है।इस दौरान दशरथ पर छींटाकशी करते हुए गालियां भी मुस्कान के साथ दी जाती है एक बानगी देखिये-‘बता द बबुआ लोगवा देत काहे गारी/ एक भाई गोर कहे एक भाई कारी।लें कें चली जयमाल सिया जू या जब विदाई होती है तब सिया राम जूं को लें कें चलें  लोकगीत से ही होती है।यानि ब्याह के समय राम-सीता विवाह की झलक ही ग्रामों में हर शादी में देखने मिलती है।राम के साथ जीवन का  ऐसा एकाकारी स्वरूप और कहीं देखने नहीं मिलता यह है राम के साथ घुल-मिल जाने की अप्रतिम भक्ति का स्वरूप।

आइए,अब चलते हैं सामाजिक व्यवहार की ओर जहां अभिवादन में राम राम या जय सियाराम का चलन है।जब मुसीबतें आती हैं तो कहा जाता है राम भरोसे जो रहें पर्वत पे हरियाएं।राम आसरा शब्द बहुसंख्यक लोग इस्तेमाल करते हैं। किसान भी प्रमुदित मन से चिड़ियों को दाना चुगते देख कहता है ‘राम जी की चिड़िया,राम जी का खेत।खाले चिरैया भर भर पेट।मन को संतुष्ट रखना एक बड़ी साधना है रामजी की माया, कहीं धूप कहीं छाया।वे इसे जीवन क्रम मानते हैं।यही भाव ‘रामजी करेंगे बेड़ा पार उदासी मन काहे को करे’ में दृष्टिगोचर होती है।जब परेशानियां कम नहीं होती तब भी राम का भरोसा वे नहीं छोड़ते गर्व से कहते हैं ‘जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए।’ कभी-कभी जब भरोसा टूट जाता है तो दुखी होकर सिर्फ यही कह पाते हैं रामभरोसे की भैंस पड़ा ब्या गई।

बड़ी ग़ज़ब की सहनशक्ति राम नाम ने उन्हें दी है और इसी का फायदा राजनैतिक , चालबाज,ढ़ोंगी और धंधेबाज उठा रहे है।जिनका काम ‘राम राम जपना ,पराया माल अपना’ करना है। पिछले कोरोना काल के दिनों से जिस तरह गरीब आदमी को चूसा गया वो धंधा अब बहुत जोर पकड़ गया है तब आपदा में फायदा की नई तरकीब निकाली गई। बड़ी शान से ये कहा जाने लगा-लगा ‘राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट,अंत काल पछताएगा जब प्राण जाएंगे छूट।कहने का आशय यह है कि राम नाम का दुरुपयोग अब पराकाष्ठा पर पहुंच चुका है।इसे समझने की ज़रूरत है अब रामजी से साहस लें और बढ़ते अन्याय, अनाचार के खिलाफ खड़े हों। रामजी को भी जय आसानी से नहीं मिली।विवेक से काम लें राम में भरोसा रखें लेकिन कर्तव्यों को ना भूलें।अब देश बदल गया है।अब तो जेल से आकर राम-रहीम राम भंडारा चलाएंगे कुछ दिन में हो सकता है आशाराम भी किसी राम के काम में लग जाएं।राम के नाम पर लूट से सावधानी बरतें।

याद रखें लोकजीवन के मोहक और प्यारे राम के रूप को सिर्फ मूर्ति में ही नहीं बदला गया बल्कि हमारी आपकी ‘राम राम’ को जय श्री राम जैसे युद्धक नारों में बदल दिया गया है।जबकि हम सब जानते हैं कि जीवन का सच ‘राम नाम सत्य’ में ही छुपा है।

Ramswaroop Mantri

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