अग्नि आलोक
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*चिंता यह है कि भारत की सामाजिक ताकत और सदियों से चाहे गये न्याय के लिये अपरिहार्य शक्ति निर्माण बिखर क्यों गया ?*

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रमाशंकर सिंह 

एकाध और होगा जो इस चित्र माला में आ सकता होगा ! 

ये सब बाबा साहब , पेरियार व फुले का नाम जाप करने वाले दलित नेता हैं और उस महान आंदोलन के उत्तराधिकारी हैं जिसे बाबा साहेब ने प्रेरित किया और कांशीराम जैसों ने अपनी मेहनत से सींचा । 

यह सामाजिक क्रांति का महान आंदोलन था पर पिछले बीस पच्चीस बरसों में दम तोड़ गया । असली व कल्पित दलित ताकत की नीलामी चुनावी बाजार में होकर अच्छा पैसा देने लगी थी और ये सब नेता धीरे धीरे अपनी धनलिप्सा के वशीभूत हो गये और आज जानकार चुनावी क्षेत्र में इनका जहॉं चाहा गया वहॉं उपयोग होने लगा। दलित वोट की इस नीलामी की सबसे बड़ी खिलाड़ी बहिन जी थीं जो गैर दलितों से हर टिकिट का मुंहमागा लेने से शुरुआत कर अब पाँच छह चुनावों के बाद “ जो मिल जाये सो “ पर आ चुकी हैं 

चिंता यह नहीं है कि नेता बिकते चले गये और अब ही वही सिलसिला चल रहा है । 

चिंता यह है कि भारत की सामाजिक ताकत और सदियों से चाहे गये न्याय के लिये अपरिहार्य शक्ति निर्माण बिखर क्यों गया ? क्या न्याय की चाहत पूरी हो गयी ? या कि जो मिल गया वह पर्याप्त मान लिया गया ? या कि आज़ादी पूर्व के अत्याचारों के मुकाबले हालात बहुत सुधर गये ? क्या कारण हुआ कि दलित आंदोलन अपने सौ बरस उसी उफान के साथ पूरे न कर सका जैसा कि कांशीराम ने छोड़ा था। कांशीराम ने उत्तर मध्य भारत में जो किया उसका प्रभाव अभूतपूर्व था। दक्षिण में विशेष तौर पर तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन अपने पीक पर पहुंच कर टिका रह गया । पेरियार की सीख तमिलनाडु में बनी रही पर महाराष्ट्र में बाबा साहेब और उत्तर में कांशीराम क्यों भुला दिये गये ? 

इस पर फेसबुक के सीमित व हल्के मंच पर नहीं गंभीर गोष्ठियों में मिलकर विचार करने की जरूरत है । इसलिये भी कि १२% सवर्ण आबादी अपने तमाम तौर तरीकों षड्यंत्रों से इतनी माहिर तो पहले से ही है कि वो बाकी वंचित हिंदू  आबादी को बुरी तरह विभाजित कर अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सके । धर्म पुनर्जन्म प्रारब्ध पुण्य स्वर्ग नाम की कल्पनायें  आखिर कब काम आती ? 

यदि दलित पिछड़े व स्त्री भारत में पूर्णतः न्याय नहीं पा सके तो यह निश्चित है कि भारत की बुनियाद में एक कच्चापन हमेशा बना रहेगा और यह देश अपनी सम्पूर्ण कौशल शक्ति को कभी हासिल नहीं कर सकेगा । चीन और भारत में यही बुनियादी फर्क है । 

इससे सांत्वना मत लेना कि आख़िर कम्युनिस्ट आंदोलन भी तो सौ साल पूरे होते होते भारत के एक छोटे से कोने में सिमट कर गैरमहत्वपूर्ण हो गया है और सोशलिस्ट नब्बे साल भी पूरे नहीं कर पाये और उनकी सैद्धांतिक वैचारिक प्रखरता चुक कर महज़ दो राज्यों में वंशवादी सीमित प्रभाव की रह गयी है । सामने ही वह उदाहरण है कि विभाजक नीतियों पर चलते हुये कैसे एक पंथीय कट्टरता ने अपने सांगठनिक बल और गतिशील रणनीतियों पर मेहनत से चलते हुये एक सदी तो पूरी की ही साथ में भारत के बड़े भूभाग पर अपना राजनीतिक कब्जा जमा लिया और उनकी वह अदम्य इच्छा आज भी कमजोर नहीं हुई है जबकि जीवनशैली भ्रष्ट जरूर हुई है । 

जैसे मुंह खोले बड़े मजबूत सवाल है वैसे ही कमजोर उत्तर भी हैं  पर असल बात कि उम्मीद कहीं से नजर नहीं आती और घूम फिर कर रंग रूप बदलते हुये वही सामाजिक श्रेष्ठि वर्ग का नेतृत्व बार बार स्वीकार करने की ओर आपका मन क्यों करने लगता है ? भिक्षा में मिली पूडी हलवा में स्वाद संतोष कैसे मिल सकता है जबकि लड़कर जान देकर संघर्ष से हकों की जीत की भविष्यमुखी खुशी काफूर क्यों हो चुकी है ? 

दलितो वंचितो पिछड़ों और औरतो ! 

तुम्हें नहीं मालूम कि जब तक कि तुम + 90% आबादी अपने सर्वश्रेष्ठ पर नहीं पहुँचोगी तब तक भारत भूमि अपने उच्चतम शिखर को कभी नहीं हासिल कर सकेगी । चीन में हममें यही अंतर है और वो विश्वगुरु का ख़िताब अमरीका से छीन कर पहनने से महज बीस साल दूर रह गया है । अगली पीढ़ी तक हम कहॉं रह जायेंगें और वे कहॉं पहुँच चुके होंगें लेकिन तुम्हें मंदिर का घंटा और मस्जिद की अजान में ही संतोष मिले तो क्या किया जा सकता है जब आँखें ही बंद की जा चुकी है ! कब तक ?

Ramswaroop Mantri

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