अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

मैदान की फ्लड लाइट के पीछे का ‘अंधेरा’

Share

उसका बदला ना

म गोपाल मान लेते हैं। पुणे मेट्रो ट्रेन में गार्ड की नौकरी पर है। हर गुरुवार को उसकी साप्ताहिक छुट्टी होती है, ताकि परिवार के साथ वक्त बिता सके। लेकिन इस बार वो काम पर है। उसी काम पर जो वह करता है, लेकिन जगह बदल गई है। गुरुवार को उसे मेट्रो ट्रेन के स्टेशन पर नहीं जाना, बल्कि भारत-पुणे के क्रिकेट मैच में गार्ड बनकर खड़ा होना है। इसकी वजह थी उसे मिलने वाले अतिरिक्त पांच सौ रुपये। मैच दोपहर दो बजे से था, लेकिन गोपाल जैसे तमाम जरूरत के मारे युवाओं को सुबह छह बजे ही बुला लिया गया। उन्हें उनकी ड्रेस दी गई और काम समझाया गया। सुबह ही उन्हें नाश्ता दिया गया। इसके बाद 12 बजते-बजते सभी गार्ड अपनी ड्यूटी पर तैनात हो गए। उनका काम था मैच देखने आए दर्शकों को उनकी सीट तक पहुंचाना। वे अपनी ड्यूटी करते रहे, लेकिन उनका लंच कब और कहां होगा, किसी को पता नहीं। जो भूख झेल सकते थे, वे ड्यूटी पर खड़े रहे और जो नहीं, वे अपने पैसे से फूड स्टॉल पर जाकर कुछ सबसे सस्ता समझकर महंगा खा आए। शायद वड़ा पाव या समोसा। दोनों के एक नग की कीमत सबसे कम 50 रुपये थी। बर्गर 200 रुपये का, पिज्जा 400 रुपये का, एक गिलास कोल्ड ड्रिंक्स 100 रुपये की, भेल 80 रुपये की, सैंडविच 150 रुपये का था। कुछ जरूरतमंदों ने उतनी भूख सहन की जितनी कर सकते थे। उन्हें उम्मीद थी कि जल्द उन्हें पूरा भोजन रोटी, सब्जी, दाल-चावल मिलने वाला है। लेकिन शाम को पांच बजे उन्हें लंच के नाम पर सिर्फ दो वड़ा पाव मिले। देने वाले इस बात से चिंतित थे कि किसी को दो से ज्यादा वड़ा पाव न पहुंच जाएं और सही लोगों को ही मिले। 22 साल के एक युवा ने बताया कि वह औरंगाबाद से आया है। मैच में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। लेकिन शाम को उसे जो पांच सौ रुपये मिलेंगे, उससे कुछ काम चल जाएगा।
बड़ा आश्चर्य होता है कि सिर्फ एक सीट से 1200 से लेकर 12,000 तक कमाने वाले आयोजक मैच के बीच सुरक्षा में तैनात गार्ड को एक वक्त का ठीकठाक खाना देने में भी आनाकानी करते हैं। तमाम लोगों के लिए मैच एक कमाई का अवसर है। टिकट से लेकर प्रसारण के अधिकार तक सब से करोड़ों की कमाई। लेकिन ऐसे आयोजन को सफल बना रहे हजारों लोग जब वापस घर लौटे होंगे, तो उन्हें थकान, भूख और तनाव के सिवाय कुछ नहीं मिला होगा। मैदान की फ्लड लाइट के पीछे बहुत अंधेरा होता है। इतना कि आगे के खेल के आगे पीछे का खेल कोई देख ही नहीं पाता।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें