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अधर्म का नाश हो*जातिगत समानता A to Z हो*(खंड-1)-(अध्याय-48)

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संजय कनौजिया की कलम”✍️

पृथ्वीराज तृतीय जिन्हें आम तौर पर पृथ्वीराज चौहान कहा जाता है, चौहान वंश के राजा थे..उन्होंने वर्तमान उत्तर पश्चिम भारत में पारम्परिक चौहान क्षेत्र सपादलक्ष पर शासन किया..उन्होंने वर्तमान राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से पर भी अपना वर्चस्व बनाये रखा था..पृथ्वीराज चौहान मौहम्मद गौरी के रास्ते का सबसे बड़ा रोढ़ा था..गौरी हर बार पृथ्वीराज से हार जाता था और उनके पैरों में गिरकर माफ़ी मांग लेता था..चूँकि राजपूतों का सिद्धांत था कि वे निहत्थे या शरणागत पर वार नहीं करते थे, पृथ्वीराज ने उस आक्रांता को बार बार माफ़ किया था..गौरी जब भी आक्रमण करता पृथ्वीराज की सेना, गौरी की सेना को गाजर-मूली की तरह काट देती थी..तराईन की अंतिम लड़ाई, जो तराईन का द्वितय युद्ध था सन 1192 ई० में गौरी को विश्वाश्घाती, गद्दार जयचंद का साथ मिल गया जिसने पृथ्वीराज को दिल्ली की सत्ता पाने हेतू धोखा दिया..हालांकि बाद में “गौरी ने उस गद्दार को एक युद्ध में यह कहकर मार दिया कि जो अपने वतन का ना हो सका वो भला मेरा क्या होगा”..इस युद्ध में गौरी ने जयचंद के साथ मिलकर सोते हुए पृथ्वीराज के सैनिकों पर आक्रमण कर दिया..परिणाम स्वरुप पृथ्वीराज को बंदी बना लिया गया और गौरी उन्हें अफगानिस्तान ले गया, उस वक्त पृथ्वीराज के विद्वान मित्र और कवि चंद्रबरदाई को भी बंदी बनाकर रखा गया था..वहां गौरी नित्य पृथ्वीराज के साथ अत्याचार किया करता था, एक रोज गौरी ने पृथ्वीराज कि तेज आँखों में किसी तरह का ख़ौफ़ ना पाकर, इतना क्रोधित हो गया कि उनकी आँखों में गर्म लोहे की छड़ों द्वारा आँखें फ़ुडवाकर अँधा करवा दिया था..एक दिन गौरी ने तीरंदाज़ी प्रतियोगिता का आयोजन करवाया, उसी दौरान पृथ्वीराज ने उस प्रतियोगिता में भाग लेने की इच्छा जताई..तब गौरी ने व्यंग करते हुए कहा कि बिन आँखों के तीर कैसे चलाओगे..चंद्रबरदाई ने गौरी को बताया कि पृथ्वीराज को शब्द भेदी बाण (केवल आवाज़ सुनकर तीर चलाने की कला) चलाना आता है..गौरी ने चौंकते हुए और जिज्ञासा लिए पृथ्वीराज को प्रतियोगिता में भाग लेने की इजाजत दे दी..इस प्रतियोगिता में चंद्रबरदाई ने अपनी कविता के माध्यम से पृथ्वीराज को उसका लक्ष्य बताया लेकिन चालाक गौरी, पृथ्वीराज के इस अंतिम प्रयास से बच निकला..तभी चंद्रबरदाई और पृथ्वीराज ने आपस में एक दूसरे का सर धड़ से अलग कर डाला.. क्योकिं यह दोनों योद्धा दुश्मन के हाथो मरना नहीं चाहते थे..15 मार्च, 1206 को गौरी को गज़नी वापस जाने के दौरान अपने एक कैम्प में आराम करते वक्त उसका सर काट कर हत्या कर दी गई थी..कहा यह भी जाता है कि खोखर योद्धाओं ने अपने राजा पृथ्वीराज का बदला लिया था..लेकिन आज तलक इसकी पुष्टि नहीं हो पाई कि गौरी की मृत्यु कैसे हुई..जिसके कारण गौरी की मृत्यु एक रहस्य बनी हुई है..गौरी ने 1192 ई० में ही चंद्रावल के युद्ध में दिल्ली के गहड़वाल वंश के शासक जयचंद को पराजित कर मौत के घाट उतार दिया था..सन 1194 ई० में गौरी पुनः वापस आया और कन्नौज पर कब्ज़ा जमाकर और देखते ही देखते पूरे उत्तर भारत में अपना वर्चस्व जमा लिया..मौहम्मद गौरी का कोई बेटा ना था अतः उसने अपने विजित साम्राज्य को अपने सेनापतियों और अपने प्रिय गुलामों को सौंप दिया और स्वयं गज़नी की ओर कूच कर गया जहाँ रास्ते में ही उसकी हत्या कर दी गई थी..क़ुतुब उद-दीन ऐबक ने दिल्ली सल्तनत स्थापित करके उसका विस्तार करना शुरू कर दिया था..धीरे धीरे अफगानिस्तान व अन्य इलाकों पर गौरियों का नियंत्रण समाप्त होने लगा और ख्बावरेज्मि साम्राज्य ने उन पर कब्ज़ा कर लिया..ग़ज़ना और गौर महत्वहीन हो गए और दिल्ली जो उस काल में महरौली के नाम से जानी जाती थी..क्षेत्रीय इस्लामी साम्राज्य का केंद्र बिंदु बन गई..इतिहासकार सन 1215 ई० के बाद गौरी साम्राज्य को पूरी तरह विस्तापित मानते हैं..!
क़ुतुबुद्दीन ऐबक वह मुस्लिम शासक था जिसने भारत में एक ऐसी सल्तनत स्थापित की जिस पर अगले 600 वर्षों तक यानी 1857 के ग़दर तक मुस्लिम शासक शासन करते रहे..उन्हें गुलाम सल्तनत या गुलाम वंश का संस्थापक कहा जाता है, लेकिन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मध्यकालीन इतिहास के इतिहासकार प्रोफ० नजफ़ हैदर का कहना है कि उन्हें या उनके बाद के बादशाहों को गुलाम बादशाह नहीं कहा जा सकता, उन्हें तुर्क या ममतूल कहा जा सकता है..दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामियां विश्विद्यालय में इतिहास के असिस्टेंट डॉ० रेहमा जावेद राशिद का कहना है कि मुस्लिम शासन काल में गुलाम की अवधारणा बाइज़ंटाइन गुलाम की अवधारणा से अलग थी और यही वजह है कि मुस्लिम काल में गुलामों की हैसियत कभी-कभी उत्तराधिकारों की तरह होती थी..यह भी सच है कि इस्लाम के स्थापित हो जाने के बाद दिल्ली की सत्ता हथियाने की होड़ में सदैव विदेशी आक्रांता इस्लामी ही होते थे और भारत में स्थापित इस्लाम शासकों से ही उनका युद्ध होता था..वह अलग बात है कि विदेशी इस्लामी आक्रांता दिल्ली पर कब्ज़े हेतू भारतीय हिन्दू रियासतों के राजाओं की मदद लिया करते थे..गुलाम वंश, तुगलक वंश, खिलज़ी वंश, लोधी वंश और मुग़ल वंश सभी इस्लामी ही थे जो युद्ध जीतकर दिल्ली पर काबिज़ होते थे..लेकिन मुगलों में बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहांगीर, शाहजहां, औरंगजेब, मोहम्मद शाह रंगीला और अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुरशाह जफ़र रहे थे जिन्होंने अखंड भारत पर शासन स्थापित किया और विदेशी इस्लामी आक्रांताओं को दिल्ली से दूर रखा केवल मोहम्मद शाह रंगीला के वक्त नादिर शाह जरूर आया और लालकिले में उसका भव्य स्वागत हुआ अंत में वह बेशुमार दौलत जिसमे कोहेनूर हीरा और तख्ते-ताउश शामिल थे लेकर बिना युद्ध किये वापस चला गया..उसके बाद दूसरा आक्रांता अहमदशाह अब्दाली छोटी-छोटी रियासतों के नबाबों और राजाओं के बुलाबे पर आया और पानीपत के मैदान में मराठा सैनिकों को पराजित कर, कंधार में तख्ता पलट की खबर पर वापस चला गया था..ऐसा नहीं कि इस्लाम भारत में एक हज़ार ईसवी में आया था, भारत में इस्लाम का आगमन…..

धारावाहिक लेख जारी है
(लेखक-राजनीतिक व सामाजिक चिंतक है)

Ramswaroop Mantri

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