डॉ. विकास मानव
_अध्यात्म के क्षेत्र मे जितना शोध और चिंतन पाश्चात्यद र्शन मे हुआ भारत मे उसको समझने के लिए एक कल्पित रूढ़िवादी धारणा प्रस्तुत करके आमजन को अंधा बना दिया।_
शंकराचार्य, रामानुजम्, विवेकानंद, दयानन्द सरस्वती ने किया उसे बौद्धिक कसौटी पर परखने के लिए वैज्ञानिक शोध हो रहे हैं। लेकिन एक पुराणवादी मंच भी है जो भारत के भक्तों का भयादोहन करके मूल बात न तो स्वयं जानना चाहता और न आमजन को समझने देना चाहता।
इसका कारण अशिक्षा है,अशिक्षा यानी जिसमे Rationality नही है।जैसे जेम्स हेडली चेइस, देवकीनन्दन खत्री, कालीदास, वाल्मिकी, वाण, भास, तुलसी, महाबीर प्रसाद द्विवेदी,हजारी प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, सूर्यकांत त्रिपाठी (निराला) मैथिलीशरण गुप्त, रवीन्द्रनाथ टैगोर ऐसे अनन्त नाम हैं जिनके विचारों को हम पढ़ते हैं।
मार्क्स की दासकैपिटल, रूसो की सोशल कान्टैक्ट,मान्टेस्क्यू का Separation of powers आस्टिन का Theory of sovereign और ऐसे अनंत पुस्तकों को पढ़कर भारतीय दर्शन और पाश्चात्य दर्शन की तुलना करते हैं।
एक पुराणवादी,परम्परावादी ऐसे अध्ययन के बारे मे कुछ नही जानना चाहता। यही कारण है कि हम बार-बार और हमेशा अपने को गुलाम पाते हैं या यूँ कहा जाय कि हमे गुलामी ही पसंद है, हम आजाद(मुक्त) होना ही नही चाहते तो बौद्धिक क्षेत्र मे पंगु बनाने की प्रक्रिया है, उस अप्रत्यक्ष गुलामी से हम कभी मुक्त भी नही हो सकते है, क्योंकि हमारे पास अपनी स्वयं की तथ्यपरक, समझपूर्ण Free will ही नही है।
खैर हमारा विषय निजात (Salvation) मोक्ष,स्वर्ग, पुनर्जन्म का सिद्धांत है।
आप कहेंगे यह पुनर्जन्म के प्रसङ्ग का तो विषय ही नही है। हमारे अनुसार तो है, तभी तो उल्लेख किया एक उदाहरण के रूप मे।
सो क्या है कि, जितने नाम हमने गिनाए और भविष्य मे गिनाएंगे उसमे से एक भी उस घटना का स्वयं पात्र नही रहा है। कहने का अभिप्राय यह कि यह सब मनुष्य की कल्पना शक्ति का विषय है।
यदि कोई मनुष्य यह कहे कि हमने स्वर्ग,नरक,मोक्ष या किसी का पुनर्जन्म देखा है या कोई शोध करके जाना है तो उस विद्याभूषण से मिलकर हमे काफी प्रसन्नता होगी और हमारा यह चैप्टर विश्व मे एक स्थान बनाकर युग युग की उत्कंठा का समाधान कर देगा।
यद्यपि पाश्चात्य देशों ने इस विषय की खोज के लिए कयी शोधशालाएं खोल रखी हैं लेकिन उन्हे भी वैसी सफलता नही मिली है जैसी उन्होने उम्मीद जताई थी। इसलिए आज के अंक मे भारतीय दर्शन के आइने से यह मानकर देखते हैं कि पुनर्जन्म होता ही है।
तो भारतीयदर्शन अनुसार मृत्यु के बाद जीव की गति के चार विभाग मिलते हैं।
पुनरपि जननं पुनरपि मरणंः-अर्थात् जन्म लो मरो। जन्म लो मरो। शंकराचार्यजी का कहना है कि प्रायः अज्ञानजनित कर्मों के कारण अधिकांश मनुष्य इसी गति को प्राप्त होते हैं।
धूममार्ग : श्रीकृष्णगीता८/२५/ तथा छाँदोग्य उपनिषद /५/१०/४/ और बृहदारण्य उपनिषद /६/२/१६/ के अनुसार यह दक्षिणायन मार्ग पुण्यात्माओं का होता है लेकिन इस मार्ग से गया हुआ जीव भी अपनै पुण्यभोग के पश्चात, प्राणी एक लम्बी यात्रा के पश्चात् पुनःजन्म लेता है। छा०उ०/५/१०/५-६-७/ तथा बृ०उ०/६/२/१६/ (द्रष्टव्य)लेकिन यह जन्म उत्तम मनुष्य के कुल मे होता है।
ज्योति मार्ग : श्रीकृष्णगीता/८/२४/ छा० उ०/४/१५/५/ तथा/५/१०/१-२/ एवं बृ०उ०/६/२/१५/ इस जीव की गति का विस्तृत वर्णन करता है।
इस मार्ग से जाने वाले जीव का पुनर्जन्म नही होता। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है यह ज्योतिमार्ग है,जीव ज्योति होकर ही उत्तरायण मार्ग से गमन करता है अर्थात् प्रकाश बनकर देदिप्यमान् होकर सदा के लिए मुक्त हो जाता है।
यह ब्रह्मवेत्ता का मार्ग है. इसमे जीवात्मा यही पर ब्रह्म(ऊँकार) मे विलीन हो जाता है। जैसे ब्रहमैव सन् ब्रह्माप्येति। (बृ०उ०/४/४/६) ब्रह्म ही हो जाता है। न तस्यप्राणा ह्युत्क्रामन्ति। (बृ०उ०/४/४/६) उसके प्राण उत्क्रान्ति को प्राप्त नही होते,जीवनकाल मे ही मुक्त हो जाता है।
अत्रेव समवलीयन्ते। उसके प्राण शरीर से निकलकर अन्यत्र नही जाते।(बृ०उ०/३/२/११) यह पुनरावर्ती मार्ग नही है इसलिए ब्रह्मवेत्ता का पुनर्जन्म नही होता।
यहाँ यह ध्यान रखना होगा कि श्रीकृष्णगीता/८/१६/ मे वर्णित ब्रह्मलोक से यह भिन्न लोक है. इसे शास्त्रों मे सत्यलोक, परमधाम, ब्रह्मलोक और साकेतलोक के नाम से भी जाना गया है।
[चेतना विकास मिशन)





