डॉ. विकास मानवविश्वासपात्रं न किमस्ति ?
नारी।
द्वारं किमेकं नरकस्य ?
नारी।
विद्वान् महा विज्ञतमोऽस्ति को वा?
नार्या पिशाच्या न च वञ्चितो यः।
किस पर विश्वास नहीं करना चाहिये।
नारी पर।
नरक का एकमात्र द्वार क्या है?
नारी।
विद्वानों में महाविद्वान कौन है?
नारी रूपी पिशाचिनी से जो ठगा नहीं गया है। अर्थात् जिसने स्त्री-संग नहीं किया है।
विपाद्विषं भाति सुधोपमं किं?
स्त्री।
विष से भी बड़ा विष जो अमृत के समान है, क्या है ?
स्त्री।
अब तुलसीबाबा की करतूत देखिए :
विधिहुँ न नारि हृदय गति जानी।
सकल कपट अद्य अवगुन खानी॥
~रामचरित मानस (अयोध्याकाण्ड )
नारी की नीयत बह्मा भी नहीं जान सकते। यह हर प्रकार के छल कपट, पाप और अवगुणों की खान है।
सत्य कहहिं कवि नारि सुभाऊ।
सब बिधि अगह अगाध दुराऊ ||
निज प्रतिबिम्ब बरकु गहि जाई।
जानि न जाई नारि गति भाई॥
~रा.च.मा (अयोध्याकाण्ड)
अर्थात नारी स्वभाव के बारे में कविगण सही कहते हैं : हर प्रकार से स्त्री पकड़ में न आने वाली है। स्त्री के स्वभाव की गहराई का थाह नहीं है. इसे जाना नहीं जा सकता। अपना प्रतिबिम्ब भले ही पकड़ लिया जाय, नारी की गति अज्ञेय है।
दूसरी तरफ स्त्री की दशा पर आह भरता एक काव्यांश है :
अबला जीवन हाय ! तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में पानी|
नारी अबला (बलहीन) है। इसके जीवन की केवल एक कहानी है। क्या कहानी? आँचल में दूध है वह पालनकर्त्री है तथा आँखों में पानी (आँसू) है. वह सुख देने के बदले में दुःख ही पाती है।
आदि से अब तक की अभिव्यक्तियों से स्पष्ट है :
पुरुषों ने ही नारी के विषय में कहा है. नारी ने स्वयं अपने विषय में ऐसी कोई बात नहीं कही। अपने को व्यक्ति जितना जानता है, उतना दूसरा उसके विषय में नहीं जान सकता। इसलिये नारी के बारे में कहे गये पुरुषों के विचार अपूर्ण एक पक्षीय,असत्य और उनकी विकृत सोच के प्रमाण हैं।
चलो मान लेते हैं की नारी बदचलन, रंडी, पैड वीमेन, कॉल गर्ल्स, डाकिनी, हाकिनी, साकिनी, पिशाचिनी, चुडेल, कुलरा, कर्कशा, चण्डी, जिन मस्तका, उमा, रक्तपा, काली, कपालिनी, भैरवी, चामुण्डा, कालिका, कपालिका है; तो उसे ये सब बनाया किसने? उसे मज़बूर और इस तरह परिभाषित किया किसने? पुरुष ने. तो सज़ा सिर्फ उसे क्यों? दूसरी बात : अगर नारी ऐसी है तो क्या नारी दया, क्षमा, माया, ममता, करुणा, सुफला, मधुरा, निर्मला, विमला, शिवा, लक्ष्मी, विद्या, कामाशीला, सुहृदा, सुप्रभा, दया नहीं है?
नारी के सभी वैविध्यपूर्ण रूप पुरुषत्त्वयुक्त पुरुष के लिये आदरणीय हैं, अमृत हैं। महोग्रा एवं सौम्या दोनों रूपों में नगरी वरेण्य है। नारी का अपमान पुरुष का अपमान है। नारी पुरुष से अपृथक है। दोनों को अलग-अलग मानना एवं जानना मूर्खता है। नारी का हर रूप शक्ति है। शक्ति सबके लिये सब काल में सम्मान्य है।
नारी पुरुष से कम नहीं, अधिक भी नहीं अपितु बराबर है। क्योंकि राशि चक्र में ६ स्वी राशियाँ हैं तो ६ पुरुष राशियाँ सम राशिया (२, ४, ६, ८, १०, १२) स्त्री हैं। विषम राशियाँ (१,३,५, ७, ९, ११) पुरुष हैं।
पुरुष-पुरुष को देखता है। इसका अर्थ हुआ पुरुष पुरुष का पक्ष लेता है। स्त्री राशियों परस्पर अभिमुख होने से एक दूसरे को देखती हैं। निष्कर्ष निकला स्त्री स्त्री का पक्ष ग्रहण करती है।
जीवन चक्र से यह भी स्पष्ट है कि स्त्री के आगे पीछे पुरुष है तथा पुरुष के आगे पीछे रखी है। इसका अर्थ निकला- स्त्री पुरुष के घेरे में है तथा पुरुष स्त्री के घेरे में दोनों एक दूसरे को आप्यायित कर रहे हैं।फिर पुरुष को स्त्री से वा स्त्री को पुरुष से कैसे अलग किया जा सकता है? दोनों अपृथक् हैं। दोनों का सह अस्तित्व है। स्त्री के आगे उसका पति है तो पीछे उसका पुत्र है। पुरुष के आगे उसकी माता है तो पीछे उसकी कन्या है। यह चक्र अनादि एवं अटूट है।
स्त्री, पुरुष की सखा है तो पुरुष, स्त्री का मित्र है। इन दोनों में पारस्परिक सौमनस्य है। एक दूसरा पक्ष भी है : स्त्री पुरुष की वैरिणी है तथा पुरुष स्त्री का शत्रु है। इन दोनों में परस्पर वैमनस्य रहता है। लोक व्यवहार में यह घटित होता है। यह प्रत्यक्ष सत्य है।
लोक में देखा जाता है-स्त्री, पुरुष के लिये आत्म बलिदान करती है। पुरुष स्त्री के लिये प्राण न्यौछावर करता है। स्त्री, पुरुष का प्राण हर लेती है। पुरुष, स्त्री की हत्या कर देता है। स्त्री और पुरुष दोनों लालन एवं ताडन के अस्त्र का प्रयोग परस्पर करते हैं।
अत्याचारी पक्ष को अपने-अपने अत्याचार का फल इसी जीवन में भुगतना पड़ता है।
स्त्री जब पुरुष को यातना देकर सताती है तो उस स्त्री का पुरुष संतान अर्थात् पुत्र उसे (अपनी माता को) दुःख देता है।
पुरुष जब स्त्री के प्रति रूक्ष एवं हिंसक व्यवहार करता है तो उस पुरुष की स्त्री संतान अर्थात् पुत्री उसे (अपने पिता को) दुःख देती है। यहाँ पुत्र = पुत्री। यह अकाट्य एवं प्रत्यक्ष सत्य है तथा नैसर्गिक नियम से आबद्ध है। कहा है-‘बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय’.
जहाँ स्त्री पुरुष आपस में लड़ते झगड़ते नहीं, परस्पर प्रेम एवं सौहार्द से रहते हैं, उनकी सन्तानें अनुशासित होती हैं, अपने माता पिता की आज्ञा का पालन करती हैं। वहाँ शांति रहती है। हम ऐसे ही परिवारों के निर्माण में सतत सक्रिय हैं.
आपके संज्ञान में ऐसे परिवार कितने हैं? ऐसे सुसंस्कृत दाम्पत्य जीवन एवं सुव्यवस्थित कुटुम्ब को मेरा प्रगल्भित प्रणाम!





