*तमिलनाडु के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले से संबंधित हैं सभी सवाल*
संजय पराते
राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट को रेफरेंस भेजकर 14 सवालों पर उसकी राय मांगी है। संविधान का अनुच्छेद 143(1) राष्ट्रपति को किसी भी संवैधानिक मामले में सुप्रीम कोर्ट से उसकी राय मांगने का अधिकार देता है, लेकिन उसकी राय को मानने के लिए राष्ट्रपति या सरकार बाध्य नहीं होती। अब राष्ट्रपति के सवालों का जवाब खोजने के लिए सुप्रीम कोर्ट 5 सदस्यों की संविधान के पीठ का गठन करेगी।
राष्ट्रपति ने जो सवाल पूछे हैं, वे सभी पिछले ही दिनों तमिलनाडु के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले से संबंधित हैं। इस मामले को याद कीजिए। मामला यह था कि तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित किए गए कई विधेयकों को राज्यपाल ने वर्षों से लटकाकर रखा था। न ही वे इन विधेयकों को पुनर्विचार के लिए विधान सभा को वापस लौटा रहे थे और न ही उसे मंजूरी दे रहे थे। जिन मामलों में विधानसभा ने दुबारा विधेयकों को पारित भी कर दिया था, उसे अपनी मंजूरी देने के बजाए उन्होंने राष्ट्रपति के पास विचारार्थ भेज दिया था और फिर राष्ट्रपति उस पर कुंडली मारकर बैठ गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल और राष्ट्रपति के इस व्यवहार को असंवैधानिक और राज्य सरकार के कामकाज में बाधा माना था और कहा था कि राज्य विधान सभा द्वारा पारित किसी भी विधेयक को, चाहे वह राज्यपाल हो राष्ट्रपति, अनिश्चितकाल तक लटकाकर नहीं रखा जा सकता और तीन माह के भीतर उसे फैसला देना होगा। उसने तमिलनाडु विधान सभा द्वारा पारित सभी विधेयकों को राज्यपाल के हस्ताक्षर के बिना कानून बनाए जाने की अनुमति दे दी थी।
विपक्ष शासित राज्यों के साथ अपने संघ पोषित राज्यपालों के जरिए मोदी सरकार जो खेल खेल रही है, वह इस देश के लोकतंत्र के ताने-बाने और संविधान द्वारा निरूपित केंद्र-राज्य संबंध को चीर-चीर करने वाला है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने इसे संभालने की कोशिश की है। इस निर्णय ने केरल सहित कई विपक्षी राज्य सरकारों के लिए उम्मीद जगाई है कि आम जनता की आशा आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अपने राज्य के दायरे में उन्होंने जो विधेयक पारित किए हैं, वे शीघ्र ही कानून बनकर जनता के काम आयेंगे।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले से इस बात की चेतावनी सभी राजनैतिक ताकतों को दी गई कि हम सब और हमारी पूरी व्यवस्था लोकतंत्र की उस डोर से बंधी है, जिसमें आम जनता की इच्छा ही सर्वोपरि है। आम जनता की यह इच्छा उसके द्वारा निर्वाचित सरकारों के माध्यम से पूरी की जाएगी। इसलिए, कोई भी ताकत, जो हमारे संविधान और लोकतंत्र की दुहाई तो दें, लेकिन अपने व्यवहार से आम जनता पर राजतंत्र ही लादने की कोशिश करें, स्वीकार नहीं किया जा सकता। विधान सभा द्वारा पारित विधेयकों को, बिना कोई उचित कारण बताए, सालों साल लटकाकर रखना लोकतंत्र नहीं, राजतंत्र की अभिव्यक्ति है और राष्ट्रपति और राज्यपालों के इस राजतंत्रीय आचरण को अस्वीकार किया जाता है।
लेकिन यह निर्णय मोदी की तानाशाह सरकार को रास नहीं आया, क्योंकि इस फैसले ने जो उजाला फैलाया है, वह अंधकार फैलाने वाली ताकतों पर भारी साबित हुआ है। तभी से इस फैसले की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष आलोचना भी जारी थी, लेकिन यह आशा की जा रही थी कि अंततः केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के दिखाए रास्ते पर चलकर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत करेगी।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राष्ट्रपति द्वारा जिन 14 सवालों पर जो रेफरेंस मांगा गया है, यह उनकी अभिव्यक्ति कम, केंद्र की अभिव्यक्ति ज्यादा है। हालांकि राष्ट्रपति बनने के बाद किसी भी व्यक्ति को व्यक्तिगत या पार्टीगत विचारधारा से ऊपर उठकर काम करना चाहिए और संविधान ही उसका पथ प्रदर्शक होना चाहिए, राष्ट्रपति मुर्मू अभी भी संघी गिरोह की अनन्य अनुसरणकर्ता के रूप में ही काम कर रही है। इन सवालों के माध्यम से वह अतीत के अपने आचरण पर मुहर लगवाना चाहती है और भविष्य में भी इसी तरह का गैर-संवैधानिक आचरण करते रहने की अनुमति चाहती है, क्योंकि संविधान में राज्य विधान सभा द्वारा पारित विधेयकों को अनुमति देने की भले ही कोई समय-सीमा निर्धारित न हो और ऐसा व्यवहार करना असंवैधानिक न हो, लेकिन गैर-संवैधानिक आचरण तो है ही। जिन सवालों पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से रेफरेंस मांगा है, उससे साफ है कि वे संविधान रूप से निर्वाचित एक जन प्रतिनिधि की तरह अपनी सरकार नहीं चलाना चाहती, बल्कि राजतंत्र में मनोनीत राज्याध्यक्ष के रूप में काम करने की इजाजत चाहती है, जहां राष्ट्रपति की मर्जी ही सर्वेसर्वा होगी और किसी भी प्रकार की जवाबदेही से वे ऊपर होगी।
अब देखना यही है कि सुप्रीम कोर्ट किस प्रकार हमारे संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करता है। इस व्याख्या पर ही हमारे देश में लोकतंत्र रहेगा या राजतंत्र की स्थापना होगी, इसका निर्णय होगा। ये व्याख्या यह भी बताएगी कि हमारे देश में किस हद तक उच्चतम न्यायपालिका का क्षरण हुआ है और किस हद तक संविधान बचाने के अपने कर्तव्य के प्रति मजबूत है?





