अजय असुर
आखिर इस इमारत के ढहने से देश को क्या हासिल हुआ? क्या इस कार्यवाही से देश में भ्रष्टाचार पर शिकंजा कसना शुरू हो गया? इस कार्रवाई के बाद फिर से देश में ऐसी स्थिति नहीं बनेगी? 18 साल पहले लोगों के आशियाने के लिए कवायद शुरू होती है। बिल्डर जमीन खरीदता है, नोएडा अथॉरिटी इसकी अनुमति देती है। फिर शुरु होता है बिल्डर, प्रशासन की मिलीभगत का खेल। इसके बाद भ्रष्टाचार की नींव पर गगनचुंबी इमारत खड़ी हो जाती है। ऐसे में जब गलतियां उजागर होती हैं तो मामला कोर्ट में चला जाता है। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सिर पर छत की उम्मीद लगाए लोगों को क्या मिलता है, बारूद और धूल का गुबार, मलबे का ढेर और सरकार की की तरफ से बंजर सपने और उस बंजर सपने में देश की बर्बादी पर जनता द्वारा ताली!
इस ट्विन टावर को ढहाने से किसी को कोई लाभ मिले या ना मिले पर शासक वर्ग के इस न्यायपालिका और शासन को जरूर मिला। न्यायपालिका और शासन में जनता का विश्वास जरूर बढ़ाया गया है, इस ट्विन टावर को ढहाने के आदेश पर। लोगों को यह भरोसा तो हो गया है कि अगर कोई गलत करेगा तो सुप्रीम कोर्ट का डंडा उस पर जरूर चलेगा। ये दलाल मीडिया सर्वोच्य न्यायालय के आदेश को प्रशासन द्वारा अमल में लाने को ऐसे पेश कर रही है जैसे कि हमेशा से अदालत का सम्मान ऐसे ही शासन और प्रशासन के लोग ऐसे ही करते रहे हैं।
इसी बहाने भाजपा सरकार अपने को दूध की धुली पार्टी साबित करना चाहती है और सबसे ईमानदार शासन का दावा भी पेश करेगी। अपने हितों के विपरीत आदेश आने पर शासन/प्रशासन कई बार उच्च न्यायालय ही नहीं सर्वोच्य न्यायालय के आदेश को भी ठेंगा दिखाती रही है, पर तब ये दलाल मीडिया इस तरह से कभी नहीं बताती।
दिल्ली और एनसीआर में इस तरह के प्रोजक्ट के लिये डायरेक्ट किसान से जमीन नहीं खरीदी जा सकती। इसके लिये सरकारी संस्था द्वारा जमीन का अधिग्रहण किया जाता है और फिर उस संस्था द्वारा जमीन को बिल्डर के नाम आवंटित किया जाता है। और यह घटना दिल्ली एनसीआर में उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोयडा में घटती है। यह आवंटन नोयडा प्राधिकरण द्वारा किया जाता है। पूरी तरह से सरकार के दिशा निर्देशों के तहत ही इस बिल्डिंग की फाईनल रिपोर्ट पर मुहर लगाकर ही इस तरह की परियोजना को आगे बढ़ाया जाता है। इस पर भी दलाल मीडिया चुप्पी लगाये बैठी है बस कुछ अधिकारियों का नाम लेकर सबको बचा ले रही है।
ये ट्विन टावर की कहानी कहाँ से और कैसे शुरू होती है?-
नोएडा बेस्ड कंपनी ने 2000 के दशक के मध्य में एमरल्ड कोर्ट नामक परियोजना की शुरुआत की। नोएडा और ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे के समीप स्थित इस परियोजना के तहत 3, 4 और 5 बीएचके फ्लैट्स वाले इमारत बनाने की योजना थी और यह ट्विन टावर ग्रेटर नोयडा स्थिति इसी एमरल्ड कोर्ट नामक परियोजना में सुपरटेक लिमिटेड कंपनी ने बनाया था। यह एक गैर-सरकारी कंपनी है। इस कंपनी को सात दिसंबर, 1995 में निगमित किया गया था। सुपरटेक के फाउंडर आरके अरोड़ा है। उसने इसके बाद अपनी 34 कंपनियां खड़ी किया है।
इस ट्विन टावर की कहानी 23 नंवबर 2004 से शुरू होती है। जब नोएडा अथॉरिटी ने सेक्टर-93ए स्थित प्लॉट नंबर-4 को एमराल्ड कोर्ट के लिए आवंटित किया। इस प्रोजेक्ट के लिए नोएडा अथॉरिटी ने सुपरटेक को 84,273 वर्गमीटर जमीन आवंटित की थी और 16 मार्च 2005 को इसकी लीज डीड हुई। आवंटित जमीन के पास ही 6,556.61 वर्गमीटर जमीन का टुकड़ा निकल आया, जिसकी अतिरिक्त लीज डीड 21 जून 2006 को बिल्डर के नाम भी कर दी गई। नक्शा पास होने के बाद दोनों प्लॉट्स को मिलाकर एक ही प्लॉट में तब्दील कर दिया गया और एक फाइनल रिपोर्ट बनाकर इस पर सुपरटेक ने एमराल्ड कोर्ट प्रोजेक्ट को लॉन्च कर दिया। और इस आवंटन के साथ ही ग्राउंड फ्लोर समेत 9 मंजिल के 14 टावर बनाने की अनुमति मिली। 29 दिसंबर 2006 को अनुमति में संशोधन कर दिया गया। नोएडा अथॉरिटी ने संसोधन करके सुपरटेक को नौ की जगह 11 मंजिल तक फ्लैट बनाने की अनुमति दे दी। इसके बाद अथॉरिटी ने टावर बनने की संख्या में भी इजाफा कर दिया। पहले 14 टावर बनने थे, जिन्हें बढ़ाकर पहले 15 फिर इन्हें 16 कर दिया गया। 2009 में इसमें फिर से इजाफा किया गया। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार 28 फरवरी 2009 को नए आवंटियों के लिए एफआर (फाइनल रिपोर्ट) बढ़ाने का निर्णय लिया। एफआर बढ़ने से अब उसी जमीन पर बिल्डर ज्यादा फ्लैट्स बना सकते थे। इसके बाद प्लान को तीसरी बार रिवाइज किया गया और इसी बिहाफ पर 26 नवंबर 2009 को नोएडा अथॉरिटी ने फिर से 17 टावर बनाने का नक्शा पास कर दिया। इसके बाद भी ये अनुमति लगातार बढ़ती गई। 2 मार्च, 2012 को टावर 17 के लिए एफआर में फिर बदलाव किया। इस संशोधन के बाद इन दोनों टावर को 40 मंजिल तक करने की अनुमति मिल गई और इसकी ऊंचाई 121 मीटर तय की गई। दोनों टावर के बीच की दूरी महज नौ मीटर रखी गई।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा ढहाने के आदेश तक सुपरटेक समूह ने एक टावर में 32 मंजिल तक और दूसरे में 29 मंजिल तक का निर्माण भी पूरा कर दिया। इसके बाद मामला कोर्ट पहुंचा और ऐसा पहुंचा कि टावर बनाने में हुए भ्रष्टाचार की परतें एक के बाद एक खुलती गईं। और सभी नेताओं और अधिकारियों को बचाने के लिये इस ट्विन टावर की बलि चढ़ा दी गयी। इस बलि के बाद हल्ला मचने पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 26 सरकारी अफसरों पर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। CM ऑफिस से इन अफसरों की लिस्ट भी जारी हो गई है। टावर बनते समय ये अफसर किसी न किसी पद पर नोएडा डेवलपमेंट अथॉरिटी में तैनात थे। इन 26 अधिकारियों में 19 रिटायर हो चुके हैं और बाकी बचे 7 अधिकारी बड़ी-बड़ी परियोजनाओं में बड़े-बड़े पदों पर आज भी विराजमान हैं। सिर्फ जनता का ध्यान आकर्षण करने के लिये लिस्ट जारी कर बिना किसी लिखित आदेश के हवा में मुँह से बोलकर कार्यवाई का आदेश जारी किया।
खरीदारों ने 2012 में इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। साल 2014 में हाईकोर्ट ने इन्हें गिराने का आदेश दिया, तब तक सुपरटेक समूह ने 32 और 29 फ्लोर की इमारत खड़ी कर दी थी। सुपरटेक समूह ने मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुपरटेक ने एक टावर को गिराकर दूसरे को रहने देने की भी दलील दी। हालांकि कोर्ट में सुपरटेक समूह की कोई भी दलील काम नहीं आई और सुप्रीम कोर्ट ने भी इन्हें गिराने पर हरी झंडी दिखा दी। सुप्रीम कोर्ट में सात साल चली लड़ाई के बाद 31 अगस्त 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बरकार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने तीन महीने के अंदर ट्विन टावर को गिराने का आदेश दिया। फिर गिराने की समय सीमा बढ़ाई गयी अन्ततः 28 अगस्त को इस ट्विन टावर को ढ़हा दिया गया।
इस ट्विन टावर को गिराने के लिए इसमें 9800 सुराख कर 3700 किलो विस्फोटक लगाया गया था। इमारत से करीब 70 मीटर दूर रिमोट रखा गया था। दोपहर ठीक 2:30 बजे रिमोट की बटन दबाई गई और तेज धमाके के साथ पूरी इमारत 9 सेकेंड में मिट्टी में मिल गई।
इस समूह के मालिक आर के अरोड़ा के मुताबिक कंपनी अभी तक 70 हजार फ्लैट्स बनाकर दे चुकी है और करीब 20 हजार फ्लैट्स बनाए जा रहे हैं। ऐसे में कंपनी ने अबतक कुल 90 हजार फ्लैट्स बनाए हैं, दोनों ही टावरो में कुल 950 फ्लैट्स बन चुके थे और इस ट्विन टावर को बनाने में तकरीबन 200 करोड़ रूपया की लागत लगी थी। मौजूदा समय में इमारत की कीमत करीब 800 करोड़ रुपये आंकी गई थी। सुपरटेक के ट्विन टावर्स को गिराने में करीब 17.55 करोड रुपये का खर्च (Supertech Twin Towers Demolition Cost) आया है और यह खर्च नोएडा अथॉरिटी ने किया है।
ट्विन टावरों में कुल निर्मित 950 फ्लैट्स में से 711 फ्लैट बुक हो चुके थे। इनमें से सुपरटेक ने कागज में 652 ग्राहकों का सेटलमेंट कर दिया है। सुपरटेक समूह ने प्रॉपर्टी की कीमत ज्यादा होने पर, जिन लोगों को बदले में सस्ती प्रॉपर्टी दी गई उनमें सभी को अभी तक बाकी रकम नहीं मिली है। ट्विन टावर्स के 59 ग्राहकों को अभी तक ना ही रिफंड मिला और ना ही किसी तरह का कोई फ्लैट। रिफंड की आखिरी तारीख 31 मार्च 2022 थी। इंसोल्वेंसी में जाने के बाद मई में कोर्ट को बताया गया कि सुपरटेक के पास रिफंड का पैसा नहीं है क्योंकि आर के अरोड़ा के मुताबिक कंपनी के पास नकदी का संकट है।
इसके बाद इसी साल मार्च में सुपरटेक कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया गया। सुपरटेक नाम से कई कंपनियां हैं जो आरके अरोड़ा की ही हैं, लेकिन यहां जो कंपनी दिवालिया हुई है वह रियल एस्टेट में काम करने वाली सुपरटेक है, जिसने ट्विन टावरों का निर्माण किया है। सुपरटेक ने यूनियन बैंक से करीब 432 करोड़ रुपये का कर्ज लिया है। कर्ज नहीं चुकाने पर बैंक ने कंपनी के खिलाफ याचिका दायर की थी। जिसके बाद NCLT ने बैंक की याचिका स्वीकार कर इन्सॉल्वेंसी की प्रक्रिया का आदेश दिया था।
देश मे जो भी बनता है चाहे वैध हो या अवैध सब देश की संपत्ति है उसे कैसे बर्बाद किया जा सकता है-
जिस देश में 80 करोड़ लोग 5 किलो राशन पर डिपेंड हों तो उस देश में 200 करोड़ लागत का इतना बड़ा निर्माण बहुत ही मायने रखता है। यहाँ निर्माण होना ही बहुत बड़ी चीज है, तोड़ना, मिटाना, खत्म कर देना, उस देश की प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए। आखिर क्या मिला उस बिल्डिंग को ढहाने से? और इस ट्विन टावर्स को गिराने में करीब 17.55 करोड रुपये का खर्च हुवा है वो भी जनता का ही है। इन पैसों से बहुत सारे डेवलपमेंट किये जा सकते थे।
बिल्डिंग को ढहाने के लिये 3700 किलो का विस्फोटक का इस्तेमाल किया किया गया है तो उस विस्फोटक के कण और सीमेंट और बालू के कण भी हवा में मौजूद होंगे। वहां रहने वालों के साथ-साथ उसके आस-पास इलाकों में भी उसके कण हवा में तैरेंगे जो उन इलाकों के बाशिंदों के शरीर को प्रभावित करेगा और इसका असर लंबे समय तक रहेगा। जल्द ही इसका असर किसी ना किसी बीमारी के रूप में दिखाई देगा और आखिर इसका जिम्मेदार कौन होगा?
यदि कोई बिल्डिंग अवैध है तो उसे सीज़ करके लोक कल्याण में इस्तेमाल किया जा सकता है, हज़ारो करोड़ रूपये को बर्बाद करना कहां तक सही है। मेहनतकश मजदूरों का श्रम जो बेशकीमती है, एक झटके में बर्बाद कर दिया जाता है। अगर इस बिल्डिंग को पब्लिक वेलफेयर के रूप में इस्तेमाल किया जाता तो आज इतना नुकसान नहीं होता।
भारत में जिनके सर के ऊपर टूटी-फूटी झोपड़ी भी नसीब नहीं, ऐसे लोग जो अपना जीवन सड़कों पर बिता देते हैं है, उनको तो बसाया जा सकता था। इसके अलावा भारत में हजारों नहीं लाखों अवैध निर्माण पर बिल्डिंगें बनाई गयी हैं और उनमें से हजारों मकान उन मानकों को पूरा नहीं करती हैं। उनमें से हजारों बिल्डिंगों का गिरने का खतरा भी है। उनका क्या? भारत में निजी तो छोड़ ही दीजिये कई सरकारी आवास के मकान इतनी जर्जर अवस्था में हैं जो कभी भी गिर सकती है। कई ऐसे प्राइमरी स्कूल और प्राथमिक अस्पताल हैं जो जर्जर कंडीशन में हैं, वो भी गिरने के कगार पर हीं हैं। कई आवास और कई स्कूल गिर भी चुके हैं और उनमें कई की मौत भी हो चुकी है और कई गंभीर रूप से घायल भी हुवे हैं। उन बिल्डिंगों को क्यूँ नहीं गिराया जाता?
आखिर यह तमाशा मुख्य धारा मीडिया के जरिये लाइव प्रसारण कर मेहनतकश जनता को क्यूँ दिखाया जा रहा है? आखिर यह दलाल मीडिया क्यूँ जस्टीफाई कर मेहनतकश जनता के दिमाग में बिठा रही है कि यह अवैध है इसलिए इसको गिराना सही है? और देश के इस सम्पति के नुकसान पर, बर्बादी पर, तालियाँ बजाता है। आखिर क्यूँ?
क्योंकि भारत का शासक वर्ग ऐसा चाहता है। वह जानता है वर्तमान समय देश की बहुसंख्यक जनता के लिये बहुत ही कष्टदायी समय है। जनता रोजगार, महंगाई, भ्रष्टाचार… से परेशान है और कहीं जनता इकठ्ठी होकर विद्रोह ना कर दे तो समय-समय पर किसी ना किसी मुद्दे के जरिये जनता का दिमाग को डायवर्ट कर देती है अपने इस पालतू मीडिया के जरिये और फिर कुछ समय के लिये एक नयी बहस और इसका सबसे बड़ा फायदा जनता का उनके न्यायालय और लोकतंत्र में विश्वास और गहरा होता जाता है कि इस लोकतंत्र में देर से ही सही न्याय जरूर मिलता है। कोई भी दोषी बख्शा नहीं जायेगा। इसके अलावा भ्रष्टाचार में लिप्त इनके नेता और अधिकारी भी बचा लिये जाते हैं। बहुत हल्ला हुआ तो एक-आध अधिकारी को बलि का बकरा बना भी दिया जाता है पर सिर्फ दिखावे के लिये। कुछ दिन बाद कहीं दूसरे डिपार्टपेंट में एडजस्ट कर दिया जाता है। पर यहां तो सभी साफ-साफ बच गये, बस उस बिल्डिंग को ढ़हा कर ही दलाल मीडिया के जरिये वाहवाही मिल जाती है।
कुछ लोग सोचते हैं कि बेचारे उस बिल्डर का कितना नुकसान हुआ। नुकसान तो बहुत दूर की बात हर तरफ से फायदा ही हुआ है। इस ट्विन टावर को निर्माण में तकरीबन 200 करोड़ की लागत आयी है और इस बिल्डिंग के निर्माण के लिये बिल्डर ने यूनियन बैंक से 432 करोड़ रुपये का कर्ज लिया है और अब कम्पनी दिवालिया घोषित हो चुकी है तो तकरीबन 200 करोड़ का शुद्ध मुनाफा। दिवालिया होने के बाद अब इस लोन को बैंक की भाषा में राइट आफ कर दिया जायेगा यानी अब बिल्डर को यह रकम जमा नहीं करनी पडे़गी। और अपने ग्राहकों से बुकिंग के लिये जो पैसे लिये उसका लंबे समय तक इस्तेमाल किया वह मुनाफा अलग से और जो अभी देना बाकी है वह अलग से।
इसी दलाल मीडिया के जरिये जनता को जाति, धर्म, लिंग, रंग, भाषा… में बांटकर अपने दलालों को मेहनतकश जनता के बीच में घुसेड़कर बलात्कारियों को महिलाओं से मालाएं पहनवाता है, क़ातिलों पर फूलों की बारिश करवाता है, दंगाइयों का स्वागत करवाता है… और जनता को आपस में बाँट देता है और जनता के ही नुकसान पर जनता से तालियां बजवा कर नचवाया जाता है।
इस आलेख के आखिर में साथी मनीष आज़ाद की ट्विन टावर के ढहाने पर यह कविता बहुत कुछ कह जाती है।
ट्विन टावर के गिरने पर
चीखती चिल्लाती, उन्माद में ताली पीटती भीड़ में
सूखे होठों और गहरी आँखों वाला एक व्यक्ति भी था.
लेकिन वह गुमसुम था
शायद थोड़ा दुःखी भी
वह उन हज़ारों मज़दूरों में से एक था
जिसने यह विशाल टावर अपने पसीने और श्रम से तैयार किया था।
हालांकि उसे तो कब की इसकी मज़दूरी भी मिल चुकी थी।
लेकिन बस उतनी ही कि
अगले दिन से
वह परिवार सहित किसी और टावर को उठाने में लग जाय।
फिर भी उसे टावर को मलबे में बदलते देख
बहुत दुःख हो रहा था।
टावर का एक बड़ा मलबा ठीक उसी जगह गिरा
जहाँ मां दो खंभों पर अपनी साड़ी बांधकर बच्ची को झुलाती थी,
और सर पर दर्जन भर ईंट उठाये
सावधान मुद्रा से बच्ची को निहारती ऊपर चढ़ती जाती थी।
और उसके साथ ही टावर भी आसमान की ओर बढ़ता जाता
मज़दूर को अचानक लगा सारा मलबा उसकी बच्ची पर आ गिरा है!
मलबे का कुछ हिस्सा ठीक उस जगह गिरा
जहाँ मज़दूर ईंट जोड़कर चूल्हा बनाते थे।
और अगले दिन टावर को आसमान की ओर और उठाने के लिए फिर से ताकत ग्रहण करते थे।
लेकिन चीखने चिल्लाने से अचानक उसकी तंद्रा टूट गयी।
उसे समझ नहीं आया कि इसमे चीखने और ताली बजाने का क्या मतलब है।
यह तो उसके जैसे हजारों मज़दूरों के श्रम की हत्या है।
इस श्रम की हत्या का उन्मादी जश्न क्यों मनाया जा रहा है?
उसे अब्दुल और आकाश भी याद आये
जो टावर को आसमान की ऊँचाई देते हुए
अचानक हवा में गोते लगाते पट से नीचे आ गिरे थे।
कम्पनी ने तो पल्ला झाड़ लिया था
खैर, ठेकेदार अपने गाँव का था
सो क्रियाकर्म हो गया।
उसे आज भी अब्दुल की बीबी की चीख याद है।
जो उस दिन टावर की ऊँचाई को भी पार कर गयी थी
चीख से आसमान भी थर्रा गया था।
उसे अब आश्चर्य हो रहा था कि टावर उसी दिन क्यों नहीं गिर गया!
जिन्होंने भ्रष्टाचार किया, वे अपने आलीशान बंगलों में
आज भी रह रहे हैं
फिर टावर को क्यों गिराया गया?
यह सोचते हुए उसे अचानक गुस्सा आने लगा
उसे लगा मानो उसका वजूद गिरा दिया गया हो
उसके वजूद को मलबे में तब्दील कर दिया गया हो।
उसने गुस्से में मुट्ठी भींचते चारों तरफ देखा
आकाश से बातें करती सभी अट्टालिकाएं
ईंट पत्थरों से नहीं उनके पसीने से बनी हैं!
इनकी नींव में कितने ही मज़दूरों की साँसें दफ़्न हैं!
और हम आज भी बेघर खुले आसमान के नीचे खड़े
अपने ही श्रम की हत्या का जश्न देखने को मजबूर हैं……
अजय असुर





