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भावना ! कोई बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

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चंद्रशेखर शर्मा

हमारा हिंदुस्तान बहुत भावनाप्रधान देश भी है ! अगर आपके भाव अच्छे हैं तो यह आपके आगे बिछ-बिछ जाता है। लोगों को हम अकसर यह कहते सुनते हैं कि हम तो भाव के भूखे हैं ! यह भी सुनते आए हैं कि भगवान सिर्फ भाव देखते हैं। यह नहीं कि किसने क्या चढ़ावा चढ़ाया ? गोया लोग भी खुद को भाव का भूखा बताकर खुद में भगवत तत्व तलाशते हैं और धन्यता का अनुभव करते हैं ! 

एक बात यह खास गौरतलब है कि इस देश को कई बार लूटा गया है। जाने किस-किसने इसे लूटा। मजेदार बात यह है कि भावनाप्रधान देश होने के साथ इस देश को धन्य होने या धन्यता का भाव महसूस करने की बहुत पुरानी बीमारी-सी भी है ! सैकड़ों बरस गुलाम रहने और अनेक बार लुटने के बाद भी हम यही सोचकर धन्य और खुश हो लेते हैं कि कोई बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ! आप देखिए कि हमने तो दरिद्रता में नारायण को पा लिया था और उसमें धन्यता ढूंढ ली। आगे इसी तरह हमने गुलामी और लुटने में भी धन्यता खोज निकाली ! बहुत लोग हैं, जो गुलामी में भी यह कहकर गुण और धन्यता खोज निकालते हैं कि अंग्रेज कैसे भी थे, पर उनका राज अच्छा था ! गोया एक किस्म का धन्य भाव हम हर बात में खोज निकालते हैं। चाहे फिर वो कोई फोटो या तस्वीर ही क्यों न हो। ध्यान रहे, घाघ लुटेरों और काइयां लोगों ने हमारी इस बीमारी या मानसिकता का हमेशा भरपूर लाभ उठाया है। 

बहरहाल अभी राहुल गांधी की एक तस्वीर बहुत वायरल है। अलबत्ता मैंने उसके साथ एक और तस्वीर यहां लगाई है, जो कि कुछ समय पुरानी है। इन पर कुछ कहने से पहले हमारा भावनाप्रधान देश इस बात को ठीक से समझ ले कि यह विज्ञापन का युग है। जी हां, यह दोनों तस्वीरें भी विज्ञापन का ही हिस्सा हैं। आप कहेंगे विज्ञापन तो किसी वस्तु को बेचने और लाभ कमाने की रणनीति से किया जाता है, इन तस्वीरों में ऐसा क्या है ? जवाब यह है कि आपको वही ऊपर उल्लेखित धन्यता बेचना है और बदले में आपके भाव की भूख को खरीदना या शांत करना है। यों एक तस्वीर में एक प्रधानमंत्री पुत्र अपनी बूढ़ी मां का पाद पूजन कर रहा है, जो कि पुरानी तस्वीर है। दूसरी तस्वीर में एक प्रधानमंत्रियों के खानदान का चिराग अपनी बेवा मां के जूते के तस्मे बांध रहा है, जो कि ताजा तस्वीर है और पक्का है कि पहली तस्वीर से आयडिया लेकर नकल मारी गयी है !  

जो हो। अपने लिए दोनों तस्वीरें नितांत विज्ञापन होने के बावजूद अत्यंत प्रशंसनीय हैं। सो इसलिए कि भावनाप्रधान होने के साथ भारत पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों में गहन आस्था रखने वाला देश भी है और दोनों तस्वीरें इस संदर्भ में बहुत उम्दा संदेश देने वाली हैं ! हां, हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हमने इसी देश को भी मां का दर्जा दिया हुआ है। उसे हम भारत माता या मां भारती पुकारते हैं। सो जब उसकी सेवा की बात आये तो भावना में बहने के बजाय उसका दायित्व हमें सच्चे सपूत को ही सौंपना है !

Ramswaroop Mantri

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